।। श्रीहरिः ।।

मनुष्यका

वास्तविक सम्बन्ध-३

(गत् ब्लॉगसे आगेका)
संसारके साथ हमारा सम्बन्ध केवल सेवा करनेके लिये ही है । सेवाके सिवाय संसारसे और कोई मतलब नहीं । माता- पिताकी सेवा करनी है, स्त्री-पुत्रका पालन-पोषण करना है । सेवा करनी है । उनके साथ सम्बन्ध माननेसे वास्तविक शान्ति नहीं मिलती । शान्ति तो उनकी सेवा करके सम्बन्ध-विच्छेद करनेसे मिलती है । संसारके साथ माना हुआ ऐसा कोई सम्बन्ध नहीं है, जिसके लिये मनुष्य नींद, भूख और प्यास भी छोड़ दे । परन्तु भगवान् के साथ सम्बन्ध जुड़नेपर नींद अच्छी नहीं लगती, खाना-पीना अच्छा नहीं लगता, यहाँतक कि शरीरका मोह भी नहीं रहता; क्योंकि भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध असली है ।

नारदजीके पूर्वजन्मके वर्णनमें आता है कि जब उनकी माताकी मृत्यु हो गयी, तब वे जंगलकी ओर चल दिये । उनको यह ख्याल ही नहीं आया कि जंगलमें क्या खायेंगे-पियेंगे ? कहाँ रहेंगे ? वहाँ एक वृक्षके नीचे बैठे । उनका मन भगवान् में लगा गया, समाधी लग गयी । उनको अपने हृदयमें भगवान् का रूप दीखने लगा । कुछ देर बाद सहसा समाधी खुल गयी तो वे बड़े व्याकुल हुए । तब आकाशवाणी हुई कि इस शरीर छूटनेके बाद जब ब्रह्माजीके पुत्ररूपसे तुम्हारा जन्म होगा, तब मेरे दर्शन होंगे । ऐसी आकाशवाणी सुनकर नारदजी प्रतीक्षा करने लगे कि कब यह शरीर छूटेगा, कब मैं मरूँगा ! दुनिया चाहती है कि हम सदा जीते ही रहें और वे चाहते है कि मैं मर जाऊँ !

संसारमें अपने शरीरके जीनेकी जितनी इच्छा होती है, उतनी कुटुम्बके जीनेकी इच्छा नहीं होती । गाय अपने बछड़ेपर बहुत स्नेह रखती है । वह बछड़ेको छोडकर जंगलमें चरनेको भी नहीं जाती । परन्तु जब उसको लाठी मारने लगते हैं, तब वह जंगलमें चली जाती है । जंगलमें चरते-चरते जब उसको बछड़ा याद आ जाता है, तब वह ‘हुम्’—ऐसे हुंकार करती है और मुहँसे घास गिर जाता है । शामके समय जब वह वापस लौटती है, तब वह सब गायोंसे आगे भागती है और हुंकार करती हुई बछड़ेके पास जाती है, उसको प्यार करती है, दूध पिलाती है । इस प्रकार उसका बछड़ेपर भी प्रेम है और घासपर भी प्रेम है, पर अपने शरीरपर सबसे ज्यादा प्रेम है । जब शरीरपर लाठी पड़ती है, तब वह बछड़ेको, घासको, सबको छोड़ देती है । जब शरीरपर आफत आती है, तब किसीकी परवाह नहीं करती । तात्पर्य है कि शरीरमें उसका एक नम्बरका प्रेम है, बछड़ेमें दो नम्बरका प्रेम है और घासमें तीन नम्बरका प्रेम है । अतः शरीरसे मोह तो पशुका भी होता है । परन्तु मनुष्य शरीरसे मोह छोडकर भगवान् से प्रेम कर सकता है ।

शरीर तो हरदम बदलता है; अतः यह तो हरदम रहता नहीं, पर भगवान् हरदम रहते हैं । हम तो भगवान् के ही हैं—यह जब पहचान हो जाती है, तब मनुष्य शरीरकी आसक्ति-कामना छोडकर भगवान् में ही लग जाता है । अतः भगवान् के साथ हमारा सम्बन्ध असली है और शरीर-संसारके साथ हमारा सम्बन्ध नकली है—इस वास्तविकताको जानकर सब प्रकारसे भगवान् में ही लग जाना चाहिये ।

—‘साधन-सुधा-सिन्धु’ पुस्तकसे

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