।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक शुक्ल अष्टमी, वि.सं.–२०७५, शुक्रवार
अक्षयनवमी
स्त्री-सम्बन्धी बातें



हमने ऐसे स्त्री-पुरुषोंको भी देखा है, जिन्होंने विवाहसे पहले ही यह प्रतिज्ञा कर ली कि हम स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध न रखकर केवल साधन-भजन ही करेंगे; और वे अपनी प्रतिज्ञा निभाते आये हैं । यद्यपि आजके जमानेमें ऐसे लड़के मिलने कठिन हैं, जो केवल साधन-भजनके लिये ही विवाह करें, तथापि उनका मिलना असम्भव नहीं है ।

मीराबाईकी तरह जो बचपनसे ही भजन-स्मरणमें लग जाय, उसकी तो बात ही अलग है; परन्तु यह विधान नहीं है, भाव है । इस भावमें भी कठिनता आती है । मीराबाईके जीवनमें बहुत कठिनता आयी थी, पर भगवान्‌के दृढ़ विश्वासके बलपर वह सब कठिनताओंको पार कर गयी । ऐसा दृढ़ विश्वास बहुत कम होता है ।

जिसमें ऐसा दृढ़ विश्वास हो, उसके लिये यह विधान नहीं है कि वह विवाह न करे अथवा वह विवाह करे । तात्पर्य है कि भगवान्‌पर दृढ़ श्रद्धा-विश्वास हो तो मनुष्य कहीं भी रहे, वह श्रेष्ठ हो ही जायगा ।

प्रश्न‒क्या स्त्रीको साधु-संन्यासी बनना उचित है ?

उत्तर‒पुरुषको तो यह अधिकार है कि उसको संसारसे वैराग्य हो जाय तो वह घर आदिका त्याग करके, विरक्त होकर भजन-स्मरण करे, पर स्त्रियोंके लिये ऐसी आज्ञा हमने कहीं देखी नहीं है । अतः स्त्रीको साधु-संन्यासी बनना उचित नहीं है । उसको तो घरमें ही रहकर अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये । वह घरमें ही त्यागपूर्वक, संयमपूर्वक रहे‒इसीमें उसकी महिमा है ।

वास्तवमें त्याग-वैराग्यमें जो तत्त्व है वह साधु-संन्यासी बननेमें नहीं है । जिसके भीतर पदार्थोंकी गुलामी नहीं है, वह घरमें रहते हुए ही साध्वी है, संन्यासिनी है ।

प्रश्न‒पतिव्रता, साध्वी और सती किसे कहते हैं ?

उत्तर‒यद्यपि शब्दकोशके अनुसार पतिव्रता, साध्वी और सती‒तीनों नाम एक ही अर्थमें हैं, तथापि तीनोंमें भेद किया जाय तो पतिके रहते हुए जो अपने नियममें दृढ रहती है, वह पतिव्रता’ है; पतिके न रहनेपर जो अपने नियममें, त्यागमें दृढ़ रहती है, वह साध्वी’ है; और जो सत्यका पालन करती है, जिसका पतिके साथ दृढ़ सम्बन्ध रहता है जो पतिके मरनेपर उसके साथ सती हो जाती है, वह सती’ है ।

प्रश्न‒सतीप्रथा उचित है या अनुचित ?


उत्तर‒सती होना प्रथा’ है ही नहीं । पतिके साथ जल जाना सती होना नहीं है । जिसके मनमें सत् आ जाता है, उत्साह आ जाता है, वह आगके बिना भी जल जाती है और उसको जलनेका कोई कष्ट भी नहीं होता । यह कोई प्रथा नहीं है कि वह ऐसा ही करे, प्रत्युत यह तो उसका सत्य है, धर्म है, शास्त्र-मर्यादापर विश्वास है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक शुक्ल अष्टमी, वि.सं.–२०७५, गुरुवार
गोपाष्टमी
स्त्री-सम्बन्धी बातें



प्रश्न‒क्या कन्या स्वयंवर कर सकती है ?

उत्तर‒शास्त्रोंमें स्वयंवरकी बात आती है, परन्तु जिन्होंने स्वयंवर किया है, उन्होंने कष्ट ही उठाया है । सीता, द्रौपदी, दमयन्ती आदिने स्वयंवर किया तो उन्होंने प्रायः दुःख ही पाया । आजकल जो कन्याएँ स्वयंवर करती हैं, खुद ही पतिको चुनती हैं, अपने मनसे विवाह करती हैं, वे कौन-सा सुख पाती हैं ? वे दुःख-ही-दुःख पाती हैं, भटकती ही रहती हैं ।

जो कन्या स्वयंवर करती है, उसकी जिम्मेवारी खुद उसीपर रहती है । पिता कन्याका हितैषी होता है और हितैषी होकर ही वह कन्याके लिये वर ढूँढता है, उसका सम्बन्ध करता है; अतः उस सम्बन्धकी जिम्मेवारी पितापर ही रहती है, कन्यापर नहीं । पिताके द्वारा सम्बन्ध करानेपर कन्यासे कहीं थोड़ी गलती भी हो जाय तो वह माफ हो जायगी; परन्तु स्वयंवर करनेवाली कन्याकी गलती माफ नहीं होगी । जैसे, पुत्र माता-पिताकी सेवा कम भी करे तो उतना दोष नहीं है; क्योंकि वह माता-पितासे उत्पन्न हुआ है, उसने जानकर सम्बन्ध नहीं जोड़ा है । परन्तु गोद जानेवाला पुत्र माता-पिताकी सेवा नहीं करता तो उसको विशेष दण्ड भोगना पड़ता है; क्योंकि उसने जानकर सम्बन्ध जोड़ा है । कोई किसीके यहाँ नौकरी करता है और नौकरीमें गलती करता है तो उसको माफी नहीं होती; क्योंकि उसने नौकरी स्वयं स्वीकार की है । हाँ, दयालु मालिक उसको माफ कर सकता है, पर वह माफीका अधिकारी नहीं होता । कोई किसीको अपना गुरु बनाता है तो गुरुकी आज्ञाका पालन करना उसकी विशेष जिम्मेवारी होती है । यदि वह गुरु-आज्ञाका पालन नहीं करता, गुरुका तिरस्कार करता है, निन्दा करता है तो उसको भयंकर दण्ड भोगना पडता है । उसको भगवान् भी माफ नहीं कर सकते । भगवान् कुपित हो जायँ तो गुरु माफ करा सकता है, पर गुरु कुपित हो जायँ तो भगवान् भी माफ नहीं करा सकते । अतः स्वयंवर करनेवाली कन्यापर विशेष जिम्मेवारी रहती है ।

प्रश्न‒कन्या विवाह न करके साधन-भजनमें ही जीवन बिताना चाहे तो क्या यह ठीक है ?


उत्तर‒कन्याके लिये विवाह न करना उचित नहीं है; क्योंकि वह स्वतन्त्र रहकर अपना जीवन-निर्वाह कर ले‒ऐसा बहुत कठिन है अर्थात् विवाह न करनेसे उसके जीवन-निर्वाहमें बहुत कठिनता आयेगी । जबतक माँ-बाप हैं, तबतक तो ठीक है, पर जब माँ-बाप नहीं रहते, तो फिर प्रायः भाईलोग (अपनी स्त्रियोंके वशीभूत होनेसे) बहनका आदर नहीं करते, प्रत्युत बहनका तिरस्कार करते हैं, उसको हीन दृष्टिसे देखते हैं । भौजाइयाँ भी उसको तिरस्कारकी दृष्टिसे देखती हैं । इससे कन्याके मनमें पराधीनताका अनुभव होता है । अतः विवाह कर लेना अच्छा है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
कार्तिक शुक्ल सप्तमी, वि.सं.–२०७५, बुधवार
कामनाजिज्ञासा और लालसा



मनुष्यशरीर मिल गया तो परमात्मप्राप्तिका, अपना कल्याण करनेका अधिकार मिल गया । कल्याणकी प्राप्तिमें केवल जिज्ञासा या लालसा मुख्य है । अपनी जिज्ञासा अथवा लालसा होगी तो कल्याणकी सब सामग्री मिल जायगी । सत्संग भी मिल जायगा, गुरु भी मिल जायगा, अच्छे सन्त-महात्मा भी मिल जायँगे, अच्छे ग्रन्थ भी मिल जायँगे । कहाँ मिलेंगे, कैसे मिलेंगे‒इसका पता नहीं, पर सच्ची जिज्ञासा या लालसा होगी तो जरूर मिलेंगे । आप कर्मयोग, ज्ञानयोग अथवा भक्तियोग, जिस योगमार्गपर चलना चाहते हैं, उस मार्गकी सामग्री देनेके लिये भगवान् तैयार हैं । परन्तु आप चलना ही नहीं चाहें तो भगवान् क्या करें ? आपके ऊपर कोई टैक्स नहीं, कोई जिम्मेवारी नहीं, केवल आपकी लालसा होनी चाहिये ।

कल्याणकी सच्ची लालसावाला साधक बिना कल्याण हुए कहीं टिक नहीं सकेगा । गुरु मिल गया, पर कल्याण नहीं हुआ तो वहाँ नहीं टिकेगा । साधु बनेगा तो वहाँ नहीं टिकेगा । गृहस्थ बनेगा तो वहाँ नहीं टिकेगा । किसी सम्प्रदायमें गया तो वहाँ नहीं टिकेगा । भूखे आदमीको जबतक अन्न नहीं मिलेगा, तबतक वह कैसे टिकेगा ? जिसमें कल्याणकी अभिलाषा है, वह कहीं भी ठहरेगा नहीं । ठहरना उसके हाथकी बात नहीं है । जहाँ उसकी लालसा पूरी होगी, वहीं ठहरेगा ।

सत्संग बड़े भाग्यसे मिलता है‒बड़े भाग पाइब सतसंगा’ (मानस, उत्तर ३३ । ४) । परन्तु जिस ग्रन्थमें भाग्यकी बात लिखी है, उसी ग्रन्थमें यह भी लिखा है‒जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू ॥ (मानस, बाल २५९ । ३) । सच्ची लालसावालेको सच्चा सत्संग अवश्य मिलेगा । जिसके भीतर कल्याणकी सच्ची लालसा है, उसको कल्याणका मौका मिलेगा‒इसमें कोई सन्देह नहीं है । इसमें भाग्यका काम है ही नहीं ।

सांसारिक धनकी प्राप्तिके लिये तीन बातोंका होना जरूरी है‒धनकी इच्छा हो, उसके लिये उद्योग किया जाय और भाग्य साथ दे । परन्तु परमात्मा इच्छामात्रसे मिलते हैं । कारण कि मनुष्यशरीर मिला ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये है । अगर परमात्मा नहीं मिले तो मनुष्यजन्म सार्थक ही क्या हुआ ? इसलिये सांसारिक कामनाओंका त्याग करके केवल स्वरूपकी जिज्ञासा अथवा परमात्माकी लालसा जाग्रत् करो । इसीमें मनुष्यजन्मकी सार्थकता है ।

जबतक कामना (भोग और संग्रहकी इच्छा) रहती है, तबतक जीव संसारी रहता है । कामना मिटनेपर जब जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है, तब जीवकी अपने अव्यक्त स्वरूपमें स्थिति हो जाती है । फिर वह स्वरूप जिसका अंश है, उसके प्रेमकी लालसा जाग्रत् होती है । स्वयं अव्यक्त होते हुए भी ज्ञानमें केवल अद्वैत रहता है और भक्तिमें कभी द्वैत होता है, कभी अद्वैत होता है । भक्तिमें भक्त अपनी तरफ देखता है तो द्वैत होता है और भगवान्‌की तरफ देखता है तो अद्वैत होता है अर्थात् अपनी तरफ देखनेसे मैं भगवान्‌का हूँ तथा भगवान् मेरे हैं’‒यह अनुभव होता है और भगवान्‌की तरफ देखनेसे सब कुछ केवल भगवान् ही हैं’‒यह अनुभव होता है । इस प्रकार द्वैत और अद्वैत‒दोनों होनेसे प्रेम प्रतिक्षण वर्धमान होता है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!


       ‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे

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