।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण नवमी, वि.सं. २०७६ शनिवार
          उदयव्यापिनी रोहिणी मतावलम्बी 
          वैष्णवोंका श्रीकृष्णजन्माष्टमी-व्रत
               अमृतबिन्दु

        

नाशवान्‌की चाहना छोड़नेसे अविनाशी तत्त्वकी प्राप्ति होती है ।
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ऐसा होना चाहिये, ऐसा नहीं होना चाहिये‒इसीमें सब दुःख भरे हुए हैं ।
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हमारा सम्मान हो‒इस चाहनाने ही हमारा अपमान किया है ।
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मनमें किसी वस्तुकी चाह रखना ही दरिद्रता है । लेनेकी इच्छावाला सदा दरिद्र ही रहता है ।
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नाशवान्‌की इच्छा ही अन्तःकरणकी अशुद्धि है ।
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मनुष्यको कर्मोंका त्याग नहीं करना है, प्रत्युत कामनाका त्याग करना है ।
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मनुष्यको वस्तु गुलाम नहीं बनाती, उसकी इच्छा गुलाम बनाती है ।
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यदि शान्ति चाहते हो तो कामनाका त्याग करो ।
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कुछ भी लेनेकी इच्छा भयंकर दुःख देनेवाली है ।
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जिसके भीतर इच्छा है, उसको किसी-न-किसीके पराधीन होना ही पड़ेगा ।
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अपने लिये सुख चाहना आसुरी, राक्षसी वृत्ति है ।
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जैसे बिना चाहे सांसारिक दुःख मिलता है, ऐसे ही बिना चाहे सुख भी मिलता है । अतः साधक सांसारिक सुखकी इच्छा कभी न करे ।
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भोग और संग्रहकी इच्छा सिवाय पाप करानेके और कुछ काम नहीं आती । अतः इस इच्छाका त्याग कर देना चाहिये ।
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अपने लिये भोग और संग्रहकी इच्छा करनेसे मनुष्य पशुओंसे भी नीचे गिर जाता है तथा इसकी इच्छाका त्याग करनेसे देवताओंसे भी ऊँचे उठ जाता है ।
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जो वस्तु हमारी है, वह हमें मिलेगी ही; उसको कोई दूसरा नहीं ले सकता । अतः कामना न करके अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये ।
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जैसा मैं कहूँ, वैसा हो जाय‒यह इच्छा जबतक रहेगी, तबतक शान्ति नहीं मिल सकती ।
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मनुष्य समझदार होकर भी उत्पत्ति-विनाशशील वस्तुओंको चाहता है‒यह आश्चर्यकी बात है !
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शरीरमें अपनी स्थिति माननेसे ही नाशवान्‌की इच्छा होती है और इच्छा होनेसे ही शरीरमें अपनी स्थिति दृढ़ होती है ।
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कुछ चाहनेसे कुछ मिलता है और कुछ नहीं मिलता; परन्तु कुछ न चाहनेसे सब कुछ मिलता है ।
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‒‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, वि.सं. २०७६ शुक्रवार
                 श्रीकृष्णजन्माष्टमी-व्रत, 
         उदयव्यापिनी रोहिणी मतावलम्बी 
               वैष्णवोंका व्रत कल है
               अमृतबिन्दु
        

गया हुआ धन पुनः प्राप्त हो सकता है, पर गया हुआ समय पुनः प्राप्त नहीं होता । धनकी तरह समयको तिजोरीमें बन्द करके भी नहीं रख सकते । अतः हर समय सावधान रहकर समयका सदुपयोग करना चाहिये ।
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पैसोंको तो तिजोरीमें बन्द करके रखा जा सकता है, पर समयको बन्द करके नहीं रखा जा सकता । अतः अपने अमूल्य समयको व्यर्थके कामोंमें खर्च नहीं करना चाहिये ।
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समयका सदुपयोग न करनेवाला व्यक्ति किसी भी क्षेत्रमें सफल नहीं हो सकता ।
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देखनेमें तो ऐसा दीखता है कि समय जा रहा है, पर वास्तवमें शरीर जा रहा है !
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विचार करें कि जो समय चला गया, उस समयके सदुपयोगसे हम परमात्मप्राप्तिके मार्गपर कितना आगे बढ़े हैं ?
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भगवान्‌से विमुख होनेपर ही मनुष्य करने, जानने और पानेकी कमीका अनुभव करता है ।
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परमात्मतत्त्वसे विमुख हुए बिना कोई सांसारिक भोग भोगा ही नहीं जा सकता और रागपूर्वक सांसारिक भोग भोगनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो ही जाता है ।
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भगवान्‌से विमुख होते ही जीव अनाथ हो जाता है ।
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जो जगत्‌को नहीं जानते, वही जगत्‌में फँसते हैं और जो परमात्माको नहीं जानते, वही परमात्मासे विमुख होते हैं ।
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संसारसे कुछ लेनेकी इच्छा करते ही हम भगवान्‌से विमुख हो जाते हैं ।
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‒ ‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
भाद्रपद कृष्ण सप्तमी, वि.सं. २०७६ गुरुवार
                  कामना
        

जबतक साधकमें अपने सुख, आराम, मान, बड़ाई आदिकी कामना है, तबतक उसका व्यक्तित्व नहीं मिटता और व्यक्तित्व मिटे बिना तत्त्वसे अभिन्नता नहीं होती ।
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जब हमारे अन्तःकरणमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहेगी, तब हमें भगवत्प्राप्तिकी भी इच्छा नहीं करनी पड़ेगी, प्रत्युत भगवान्‌ स्वयं प्राप्त हो जायँगे ।
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संसारकी कामना पशुताका और भगवान्‌की कामनासे मनुष्यताका आरम्भ होता है ।
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‘मेरे मनकी हो जाय’‒इसीको कामना कहते हैं । यह कामना ही दुःखका कारण है । इसका त्याग किये बिना कोई सुखी नहीं हो सकता ।
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मुझे सुख कैसे मिले‒केवल इसी चाहनाके कारण मनुष्य कर्तव्यच्युत और पतित हो जाता है ।
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कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे, अपने स्वरूपसे और अपने इष्ट (भगवान्‌)से विमुख हो जाता है और नाशवान्‌ संसारके सम्मुख हो जाता है ।
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साधकको न तो लौकिक इच्छाओंकी पूर्तिकी आशा रखनी चाहिये और न पारमार्थिक इच्छाकी पूर्तिसे निराश ही होना चाहिये ।
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कामनाओंके त्यागमें सब स्वतन्त्र, अधिकारी, योग्य और समर्थ हैं । परन्तु कामनाओंकी पूर्तिमें कोई भी स्वतन्त्र, अधिकारी, योग्य और समर्थ नहीं है ।
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ज्यों-ज्यों कामनाएँ नष्ट होती हैं, त्यों-त्यों साधुता आती है और ज्यों-ज्यों कामनाएँ बढ़ती हैं, त्यों-त्यों साधुता लिप्त होती है । कारण कि असाधुताका मूल हेतु कामना ही है ।
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कामनामात्रसे कोई पदार्थ नहीं मिलता, अगर मिलता भी है तो सदा साथ नहीं रहता‒ऐसी प्रत्यक्ष बात होनेपर भी पदार्थोंकी कामना रखना प्रमाद ही है ।
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जीवन तभी कष्टमय होता है, जब संयोगजन्य सुखकी इच्छा करतें हैं और मृत्यु तभी कष्टमय होती है, जब जीनेकी इच्छा करते हैं ।
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यदि वस्तुकी इच्छा पूरी होती हो ती उसे पूरी करनेका प्रयत्न करते और यदि जीनेकी इच्छा पूरी होती हो तो मृत्युसे बचनेका प्रयत्न करते । परन्तु इच्छाके अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्युसे बचाव ही होता है ।
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इच्छाका त्याग करनेमें सब स्वतन्त्र हैं, कोई पराधीन नहीं है और इच्छाकी पूर्ति करनेमें सब पराधीन हैं, कोई स्वतन्त्र नहीं है ।
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सुखकी इच्छा, आशा और भोग‒ये तीनों सम्पूर्ण दुःखोंके कारण हैं ।
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‒ ‘अमृत-बिन्दु’ पुस्तकसे

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