।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
 मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी, वि.सं.-२०७४,गुरुवार
                        श्रीराम-विवाह
                         प्रश्नोत्तर



प्रश्नोत्तर

(गत ब्लॉगसे आगेका)

श्रोता‒गृहस्थाश्रममें रहते हुए कल्याण हो सकता है क्या ?

स्वामीजी‒भूखेको भोजन मिलता है और भूखा ही भोजनका अधिकारी होता है । जो जिस चीजका जिज्ञासु होता है, उसको वह चीज मिलती है । विचार करें कि कल्याण किसका होता है ? कल्याण शरीरका नहीं होता, प्रत्युत जीवात्माका होता है । जीवात्मा न ब्रह्मचारी है, न गृहस्थ है, न वानप्रस्थ है, न संन्यासी है । वह न ब्राह्मण है, न क्षत्रिय है, न वैश्य है, न शूद्र है । वह न हिन्दू है, न मुसलमान है, न ईसाई है, न यहूदी है, न पारसी है । जीवात्मा तो परमात्माका अंश है ।
कल्याण उसका होता है, जो कल्याण चाहता है । भोजन उसको भाता है, जो भूखा होता है । आप सच्ची बातपर विचार करो कि क्या ब्राह्मणका कल्याण हो जायगा ? क्या साधुका कल्याण हो जायगा ? क्या किसी भाई या बहनका कल्याण हो जायगा ? कोई ऊँचे कुलमें उत्पन्न हुआ हो तो क्या उसका कल्याण हो जायगा ? किसीके पास पैसे ज्यादा हों तो क्या उसका कल्याण हो जायगा ? किसीका बल ज्यादा हो तो क्या उसका कल्याण हो जायगा ? मनमें कल्याणकी इच्छा हुए बिना कल्याण कैसे हो जायगा ? भूखके बिना भोजन भी नहीं कर सकते तो क्या लगनके बिना परमात्माकी प्राप्ति हो जायगी ? कोई किसी भी वर्ण, आश्रम, सम्प्रदाय, धर्म आदिका हो, जो हृदयसे परमात्माको चाहता है, उसको परमात्मा नहीं मिलेंगे तो किसको मिलेंगे ? चाहनेसे परमात्मा ही मिलते हैं, संसार नहीं मिलता । परमात्माकी प्राप्ति न ब्राह्मणको होती है, न साधुको होती है, न पुरुषको होती है,  स्त्रीको होती है, प्रत्युत ‘भक्त’ को होती है । वर्ण-आश्रमकी मर्यादा व्यवहारके लिये आवश्यक है । विवाह, भोजन आदिमें वर्ण, जातिका विचार करना चाहिये; क्योंकि उसमें शरीरका सम्बन्ध होता है । दूसरे वर्णमें विवाह होगा तो वर्णसंकर पैदा होगा ।

कल्याण स्वयंका होता है; क्योंकि स्वयं कल्याण चाहता है । मुमुक्षुकी मुक्ति होती है । जिज्ञासुको तत्त्वज्ञान होता है । इसी तरह जो पाप करता है, वह नरकोंमें जायगा, चाहे वह किसी वर्ण-आश्रमका हो । अगर ब्राह्मणका ही कल्याण होगा तो ‘मनुष्यशरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये मिला है’यह शास्त्रकी बात कट जायगी ! सब जीव परमात्माके अंश हैं । कोल, भील, किरात भी परमात्माके अंश हैं । साँप, बिच्छू भी परमात्माके अंश हैं । परमात्माके अंशको ही परमात्माकी प्राप्ति होती है । अपनी माँके पास जानेमें सबका अधिकार है ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘लक्ष्य अब दूर नहीं !’ पुस्तकसे
   
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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
 मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.-२०७४,बुधवार
                       प्रश्नोत्तर



प्रश्नोत्तर

प्रश्न‒जब भगवत्प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है तो फिर भगवत्प्राप्ति कठिन क्यों दीखती है ?

स्वामीजी‒भोगोंमें आसक्ति रहनेके कारण । भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं है, भोगोंकी आसक्तिका त्याग कठिन है ।

प्रश्न‒भगवत्प्राप्ति कठिन कहें अथवा भोगासक्तिका त्याग कठिन कहें, बात तो एक ही हुई ?

स्वामीजी‒नहीं, बहुत बड़ा अन्तर है । भगवत्प्राप्तिको कठिन माननेसे साधक श्रवण, मनन, जप, स्वाध्याय आदिमें ही तेजीसे लगेगा और भोगासक्तिके त्यागकी तरफ ध्यान नहीं देगा । वास्तवमें भगवान् तो प्राप्त ही हैं, केवल संसारके सम्बन्धका त्याग करना है ।

प्रश्न‒भगवत्प्राप्ति सुगम कैसे है ?

स्वामीजी‒भगवान् नित्यप्राप्त हैं । वे प्रत्येक देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, अवस्था, परिस्थिति और घटनामें परिपूर्ण हैं । उनकी प्राप्ति जड़ता (शरीर-संसार)-के द्वारा नहीं होती, प्रत्युत जड़ताके त्यागसे होती है । परन्तु नाशवान् संसारकी तरफ दृष्टि रहनेसे, नाशवान् सुखकी आसक्ति रहनेसे नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव नहीं होता । यह जानते हैं कि शरीर-संसार नाशवान् हैं, फिर भी इस जानकारीको आदर नहीं देते ! वास्तवमें ‘शरीर-संसार नाशवान् हैं’इसको सीख लिया है, जाना नहीं है । इसलिये नाशवान् जानते हुए भी सुख-लोलुपताके कारण उसमें फँसे रहते हैं । वास्तवमें नित्यनिवृत्तकी निवृति करनी है और नित्यप्राप्तकी प्राप्ति करनी है ।

प्रश्न‒नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति और नित्यप्राप्तकी प्राप्ति करना क्या है ?

स्वामीजी‒नित्यनिवृत्तकी निवृत्ति करनेका तात्पर्य है‒जो नित्यनिवृत्त है, उस शरीर-संसारको रखनेकी भावना छोड़ना अर्थात् वह बना रहे‒इस इच्छाका त्याग करना । नित्यप्राप्तकी प्राप्ति करनेका तात्पर्य है‒जो नित्यप्राप्त है, उस परमात्मतत्त्वको श्रद्धा-विश्वासपूर्वक स्वीकार करना ।

जो कभी भी अलग होगा, वह अब भी अलग है और जो कभी भी मिलेगा, वह अब भी मिला हुआ है । शरीर, वस्तु, योग्यता और सामर्थ्य ‘नित्यनिवृत्त’ अर्थात् सदा ही हमसे अलग हैं और परमात्मा ‘नित्यप्राप्त’ अर्थात् सदा ही हमें प्राप्त हैं । जो तत्त्व सब जगह ठोस रूपसे विद्यमान है, वह हमसे दूर हो सकता ही नहीं । परमात्मा कभी हमसे अलग हुए नहीं, हैं नहीं, होंगे नहीं और हो सकते नहीं; क्योंकि उसीकी सत्तासे हम सत्तावान् हैं ।

प्रश्न‒परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम है तो फिर उसमें बाधा क्या लग रही है ?

स्वामीजी‒अनेक बाधाएँ हैं; जैसे‒

(१)  भोग भोगने और संग्रह करनेमें आसक्ति है ।

(२)  परमात्मप्राप्तिकी जोरदार जिज्ञासा (भूख) नहीं है ।


(३)  अपनी वर्तमान स्थितिमें सन्तोष कर रखा है ।

(४) परमात्मप्राप्तिको सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिकी तरह मान रखा है । इस मान्यताके कारण क्रिया करनेको अधिक महत्त्व देते हैं, विवेक और भावको महत्व नहीं देते ।

(४)  तत्त्वको ठीक तरहसे जाननेवाले महात्मा नहीं मिले ।

(५)  थोड़ी-सी बातें जानकर, थोड़ा-सा साधन करके अभिमान कर लेते हैं ।


(७) कुछ करनेसे प्राप्ति होगी, गुरु नहीं मिला, समय ऐसा ही है, प्रारब्ध ऐसा ही है, हम योग्य नहीं हैं, हम अधिकारी नहीं हैं‒ऐसे जो संस्कार भीतर बैठे हैं, वे बाधा देते हैं ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)

‒‘लक्ष्य अब दूर नहीं !’ पुस्तकसे
  
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।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
 मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया, वि.सं.-२०७४,मंगलवार
             भगवत्प्राप्ति सुगम कैसे ?



भगवत्प्राप्ति सुगम कैसे ?

(गत ब्लॉगसे आगेका)

(८)

आपने परमात्माकी प्राप्तिको कठिन मान रखा है, पर वास्तवमें यह कठिन नहीं है । परमात्मप्राप्ति कठिन है‒आपकी इस मान्यताके कारण परमात्मप्राप्ति कठिन है, और इस मान्यताको छुड़ाना कठिन है ! परमात्मा तो अपने हैं । अपनी माँकी गोदीमें जानेमें क्या कठिनता है ? इसमें क्या अपनी किसी योग्यता, विद्या, बुद्धि, बल, धन, आदिकी जरूरत पड़ती है ? केवल अपनेपनकी जरूरत है । संसारमें तिल-जितनी चीज भी अपनी नहीं है । संसारकी चीजको अपनी मानकर भगवान्‌को कठिन मान लिया ! अपने केवल भगवान् हैं, जो सदा हमारे साथमें रहते हैं । आप स्वर्ग, नरक, चौरासी लाख योनियाँ आदि कहीं जाओ, भगवान् सदा साथमें रहते हैं‒‘सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः’ (गीता १५ । १५) ‘मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित हूँ’; ‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः’ ‘मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें स्थित आत्मा हूँ’ परमात्माके सिवाय और कोई चीज आपके साथ रहती ही नहीं, और भगवान् आपका पिण्ड छोड़ते नहीं ! ऐसा कोई समय नहीं है, जिस समय भगवान् आपके साथ न हों । परन्तु उस तरफ आपकी दृष्टि नहीं रहती । भगवान् सबके साथ हर समय रहते हैं और बड़ी कृपा करके रहते हैं ।

(९)

पण्ढरपुरमें चातुर्मास हुआ था । उसमें मैंने एक दिन कह दिया कि तत्त्वकी प्राप्ति तो बड़ी सरल बात है ! इसको सुनकर कुछ लोग कहने लगे कि तुकारामजी महाराजने ऐसा-ऐसा कहा है, तत्त्वप्राप्तिमें तो कठिनता है । तब मैंने एक बात कही कि मैं मराठी जानता नहीं, महाराष्ट्रके सन्तोंकी वाणी मैंने पढ़ी नहीं; परन्तु मेरी एक धारणा है कि ज्ञानेश्वरजी, तुकारामजी आदि सन्तोंको भगवत्प्राप्ति हुई थी, वे तत्त्वज्ञ पुरुष थे । तत्त्वज्ञ पुरुषके भीतर यह भाव रह सकता ही नहीं कि तत्त्वप्राप्ति कठिन है । अतः उनकी वाणीमें ‘तत्त्वकी प्राप्ति सुगमतासे होती है’यह बात नहीं आये, ऐसा हो ही नहीं सकता ! इतनेमें एक आदमी बोल गया वाणी कि ऐसे सुगम लिखा है उसमें ! लिखे बिना रह सकते नहीं । जो वास्तविक बात है, उसको वे कैसे छोड़ देंगे ? तत्त्वको बनाना थोड़े ही है, वह तो ज्यों-का-त्यों विद्यमान है । फिर उसकी प्राप्तिमें कठिनता किस बातकी ?

(१०)

परमात्मतत्त्व सब देशमें है, सब कालमें है, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें है, सम्पूर्ण वस्तुओंमें है, सम्पूर्ण घटनाओंमें है, सम्पूर्ण परिस्थितियोंमें है, सम्पूर्ण क्रियाओंमें है । वह सबमें एक रूपसे, समान रीतिसे ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है । अब उसको प्राप्त करना कठिन है तो सुगम क्या होगा ? जहाँ चाहो, वहीं प्राप्त कर लो !

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘लक्ष्य अब दूर नहीं !’ पुस्तकसे
  
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