।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
     पौष कृष्ण प्रतिपदा, वि.सं.-२०७९, शुक्रवार

गीतामें आये समान चरणोंका तात्पर्य



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(६) ‘तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता’ (२ । ५७, ६१)‒ये पद दूसरे अध्यायके सत्तावनवें श्‍लोकमें सिद्ध कर्मयोगीके लिये और इकसठवें श्‍लोकमें कर्मयोगी साधकके लिये आये हैं । साधककी भी प्रज्ञा (बुद्धि) स्थिर हो जाती है । प्रज्ञा स्थिर होनेपर साधकको भी सिद्धके समान ही समझना चाहिये । गीतामें सिद्धोंको भी महात्मा कहा गया हैं (७ । १९) और साधकोंको भी महात्मा कहा गया है (९ । १३) ।

(७) इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता’ (२ । ५८, ६८)‒दूसरे अध्यायके अट्ठावनवें श्‍लोकमें तो एकान्तमें बैठकर वृत्तियोंका संयम करनेका वर्णन है; अतः वहाँ संहरते’ क्रियाका प्रयोग हुआ है; और अड़सठवें श्‍लोकमें व्यवहारमें अर्थात् सांसारिक कार्य करते हुए भी इन्द्रियोंके वशमें रहनेकी बात आयी है; अतः वहाँ निगृहीतानि पद आया है । तात्पर्य है कि एकान्त स्थानमें अथवा व्यवहारकालमें भी साधकका अपनी इन्द्रियोंपर आधिपत्य रहना चाहिये । एकान्तमें तो मानसिक वृत्ति भी नहीं रहनी चाहिये और व्यवहारमें इन्द्रियोंके वशीभूत नहीं होना चाहिये, भोगोंमें आसक्ति नहीं रहनी चाहिये, तभी साधककी एक निश्‍चयात्मिका बुद्धि स्थिर, दृढ़ होगी[*]

(८) युक्त आसीत मत्परः’ (२ । ६१; ६ । १४)‒इन पदोंके द्वारा एक बार तो कर्मयोगमें भगवत्परायण होनेकी बात कही गयी है (२ । ६१) और एक बार ध्यानयोगमें भगवत्परायण होनकी बात कही गयी है (६ । १४) । कर्मयोगमें भी भगवत्परायण होना आवश्यक है; क्योंकि भगवत्परायणता होनेसे कर्मयोगकी जल्दी विशेष सिद्धि होती है । ऐसे ही ध्यानयोगमें भी भगवान्‌के परायण होना आवश्यक है; क्योंकि ध्यानयोगमें भगवत्परायणता न होनेसे सकामभावके कारण सिद्धियाँ तो प्रकट हो सकती हैं, पर मुक्ति नहीं हो सकती ।

(९) निर्ममो निरहङ्कारः’ (२ । ७१; १२ । १३)‒ये पद एक बार तो कर्मयोगीके लिये आये हैं (२ । ७१) और एक बार भक्तियोगीके लिये आये हैं (१२ । १३) कर्मयोगी केवल अपना कर्तव्य समझकर कामना-आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है; अतः वह अहंता-ममतासे रहित हो जाता है । भक्तियोगी सर्वथा भगवान्‌के समर्पित हो जाता है; अतः उसमें अहंता-ममता नहीं रहती । तात्पर्य है कि कामना-आसक्ति न रखनेसे भी वही स्थिति होती है और भगवान्‌के समर्पित होनेसे भी वही स्थिति होती है अर्थात् दोनों ही अहंता-ममतासे रहित हो जाते हैं ।

(१०) मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः’ (३ । २३; ४ । ११)‒मैं कर्म नहीं करूँगा तो सभी लोग मेरे मार्गका ही अनुसरण करेंगे अर्थात् वे भी कर्म नहीं करेंगे, अपने कर्तव्यसे च्युत हो जायँगे (३ । २३)‒ऐसा कहकर भगवान्‌ने कर्मयोगकी बात कही; और जो जैसे मेरी शरण होते है, मैं उनके साथ वैसा ही प्रेमका बर्ताव करता हूँ; अतः मेरा यह बर्ताव देखकर मनुष्य भी दूसरोंके साथ वैसा ही यथायोग्य प्रेमका बर्ताव करेंगे‒ऐसा कहकर भगवान्‌ने भक्तियोगकी बात कही । तात्पर्य है कि भगवान्‌ कर्मयोग और भक्तियोग‒इन दोनोंमें आदर्श है ।



[*] चौथे अध्यायके छब्बीसवें श्‍लोकमें एकान्तमें इन्द्रियोंके संयमको ही श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्‍निषु जुह्वति पदोंद्वारा संयमरूप यज्ञ’ बताया है और व्यवहारमें इन्द्रियोंके संयमको ही शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्‍निषु जुह्वति पदोंद्वारा विषयहवनरूप यज्ञ’ बताया है अर्थात् व्यवहारमें विषयोंका सेवन करते हुए भी विषयोंमें भोग-बुद्धि (राग-द्वेष) न हो ।


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
       मार्गशीर्ष पूर्णिमा, वि.सं.-२०७९, गुरुवार

गीतामें आये समान चरणोंका तात्पर्य



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समानाः श्‍लोकपादा हि गीतायां सन्ति यत्र च ।

तात्पर्यं    कथ्यते     तेषां       पूर्वापरप्रसङ्गतः

‘सेनयोरुभयोर्मध्ये (१ । २१, २४; २ । १०)‒एक बार तो अर्जुनने भगवान्‌से अपना रथ दोनों सेनाओंके मध्यभागमें खड़ा करनेके लिये कहा (१ । २१), एक बार भगवान्‌ने दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा कर दिया । (१ । २४) और एक बार वहीं (दोनों सेनाके बीचमें) अर्जुनको उपदेश दिया (२ । १०) । इस प्रकार तीन तरहकी परिस्थितियाँ हुईं । रथ खड़ा करो‒ऐसा कहते समय अर्जुनका भाव और ही था अर्थात् वे अपनेको रथी और भगवान्‌को सारथि मानते थे; दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खडा करके भगवान्‌ने कहा कि इन कुरुवंशियोंको देखो तो अर्जुनका भाव और ही हुआ अर्थात् उनमें कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हो गया; और भगवान्‌ने उपदेश दिया तो अर्जुनका भाव और ही हुआ अर्थात् वे शिष्यभावसे उपदेश सुनने लगे ।

(२) कुलक्षयकृतं दोषम्’ (१ । ३८, ३९)‒ये पद कुलका नाश करनेसे होनेवाले दोषको न देखने और देखनेके अर्थमें आये हैं । जिन मनुष्योंपर लोभ सवार हो जाता है और लोभके कारण जिनका कर्तव्य-अकर्तव्यका विवेक ढक जाता है, वे अपने व्यवहारमें होनेवाले दोषोंको नहीं जानते । परन्तु जो लोभके वशीभूत नहीं है और जिनमें कर्तव्य-अकर्तव्यका, धर्म-अधर्मका विवेक है, वे अपने व्यवहारमें होनेवाले दोषोंको अच्छी तरह जानते हैं । दुर्योधन आदिपर राज्यका लोभ छाया हुआ होनेसे वे कुलके नाशसे होनेवाले दोषोंको नहीं देख रहे थे; परन्तु पाण्डवोंपर राज्यका लोभ नहीं छाया हुआ होनेसे वे कुलके नाशसे होनेवाले दोषोंको स्पष्ट देख रहे थे । तात्पर्य है कि मनुष्यको कभी लोभके वशीभूत नहीं होना चाहिये ।

(३) येन सर्वमिदं ततम्’ (२ । १७; ८ । २२; १८ । ४६)‒एक बार तो शरीरी (जीवात्मा)-की व्यापकता बतायी (२ । १७) और दो बार परमात्माकी व्यापकता बतायी (८ । २२; १८ । ४६) । तात्पर्य है कि साधकको अपने स्वरूपको भी सर्वत्र व्यापक मानना चाहिये और परमात्माको भी सब देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदिमें व्यापक मानना चाहिये । इससे बहुत जल्दी साधनकी सिद्धि होती है ।

(४) न त्वं शोचितुमर्हसि’ (२ । २७, ३०)‒दोनों सेनाओंमें अपने स्वजनोंको देखकर अर्जुनको शोक हो रहा था; अतः भगवान्‌ उनको बार-बार चेताते हैं । अगर लौकिक दृष्टिसे देखा जाय तो जिसका जन्म होता है, उसकी मृत्यु अवश्य होगी और जिसकी मृत्यु होगी, उसका जन्म अवश्य होगा‒इस निश्‍चित नियमको लेकर भी शोक नहीं हो सकता (२ । २७) । यदि चेतन तत्त्वको लेकर देखा जाय तो उसका कभी नाश होता ही नहीं; अतः उसके लिये भी शोक करना बनता नहीं (२ । ३०) । तात्पर्य है कि शरीर और शरीरी‒दोनोंको लेकर शोक नहीं करना चाहिये ।

(५) व्यवसायात्मिका बुद्धिः’ (२ । ४१, ४४)‒जिसके अन्तःकरणमें संसारका महत्त्व नहीं होता, उसकी तो व्यवसायात्मिका (एक निश्‍चयवाली) बुद्धि होती है (२ । ४१) और जिसके भीतर संसारका, भोगोंका महत्त्व होता है, उसकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती (२ । ४४) । तात्पर्य है कि निष्काम मनुष्यकी तो एक बुद्धि होती है पर सकाम मनुष्यकी एक बुद्धि नहीं होती, प्रत्युत अनन्त बुद्धियाँ होती हैं ।


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
 मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७९, बुधवार

गीतामें आये परस्पर-विरोधी

पदोंका तात्पर्य



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(२९) संसार-वृक्ष ऊपरकी ओर मूलवाला है‒‘ऊर्ध्वमूलम्’ (१५ । १) और संसार-वृक्षके मूल नीचे हैं‒अधश्‍च मूलानि’ (१५ । २) तो एक ही संसार-वृक्षके ऊर्ध्वमूल और अधोमूल कैसे ?

ऊर्ध्वमूल परमात्माका वाचक है, जो कि संसार-वृक्षका आधार है और अधोमूल तादात्म्य, ममता और कामनाके वाचक हैं, जिनसे ऊर्ध्व, मध्य और अधोगतिरूप शाखाएँ निकलती हैं । तात्पर्य है कि मनुष्यको इन तादात्म्य, ममता और कामनारूप मूलोंका तो छेदन करना है और ऊर्ध्वमूल परमात्माकी शरण लेना है ।

(३०) वह सम्पूर्ण प्राणियोंको मार करके भी न मारता है और न बँधता है (१८ । १७) अर्थात् वह क्रिया करके भी क्रिया नहीं करता और उसके फलका भी भागी नहीं होता‒यह कैसे ?

अहंकृतभाव अर्थात् मैं कर्म करता हूँ’‒ऐसा भाव होनेसे ही मनुष्य कर्मोंका कर्ता बनता है और फलकी इच्छासे उसको फलका भागी होना पड़ता है । परन्तु जिसके भीतर अहंकृत भाव नहीं है और फलकी इच्छा भी नहीं है, वह सब कुछ करता हुआ भी वास्तवमें कुछ नहीं करता और किसी भी कर्मके फलका भागी नहीं होता (१३ । ३१) ।

(३१) सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह है और परिणाममें अमृतकी तरह है (१८ । ३७); राजस सुख आरम्भमें अमृतकी तरह है और परिणाममें विषकी तरह है ( १८ । ३८)‒यह कैसे ?

वास्तवमें सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह नहीं है । जब मनुष्य सात्त्विक सुखकी तरफ चलता है, तब उसकी भोग, सुख-आराम, मान-बड़ाई आदि राजस सुखका और निद्रा, आलस्य, प्रमाद, खेल-तमाशा आदि तामस सुखका त्याग करना विषकी तरह मालूम देता है । परन्तु सात्त्विक सुखमें प्रवेश होनेपर परमात्मविषयक बुद्धिसे पैदा हुआ वह सुख अमृतकी तरह दीखता है । अतः सात्त्विक सुख आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह है ।

भोगोंको भोगनेमें, विषयोंका सेवन करनेमें पहले एक सुख मालूम देता है, एक रस आता है; अतः राजस सुख पहले अमृतकी तरह दीखता है । परन्तु भोगोंके, विषय-सेवनके परिणाममें शरीरकी, इन्द्रियोंकी शक्‍तिका ह्रास होता है, बल-बुद्धिका ह्रास होता है, शरीरमें रोग होते हैं, थकावट आती है । अतः राजस सुख परिणाममें विषकी तरह है ।

तात्पर्य है कि बुद्धिमान् मनुष्य परिणामकी तरफ देखते हैं और अज्ञानी मनुष्य परिणामकी तरफ नहीं देखते । अतः साधकको चाहिये कि वह परिणामकी तरफ ही ध्यान दे ।

(३२) सब कर्मोंका त्याग करके संयमपूर्वक एकान्तमें रहकर ध्यान करनेसे जिस तत्त्व (पद)-की प्राप्‍ति होती है (१८ । ५१‒५४), उसी तत्त्वकी प्राप्‍ति सब कर्मोंको मशीनकी तरह सदा करते हुए होती है (१८ । ५६)‒यह कैसे ?

पहली बात (१८ । ५१‒५४ में) सांख्ययोगकी है और उसमें अभ्यासकी मुख्यता है; अतः तत्परतापूर्वक अभ्यास करनेसे सांख्ययोगीको तत्त्वकी प्राप्‍ति हो जाती है । दूसरी बात (१८ । ५६ में) भक्तियोगकी है और उसमें भगवान्‌के आश्रयकी मुख्यता है; अतः भगवान्‌का आश्रय लेनेसे भक्तको भगवत्कृपासे शाश्‍वत अविनाशी पदकी प्राप्‍ति हो जाती है ।

नारायण ! नारायण ! नारायण ! नारायण !


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।। श्रीहरिः ।।



  आजकी शुभ तिथि–
 मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी, वि.सं.-२०७९, मंगलवार

गीतामें आये परस्पर-विरोधी

पदोंका तात्पर्य



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(२४) वह परमात्मा गुणोंसे रहित है और वह गुणोंका भोक्ता है (१३ । १४)‒यह कैसे ?

वह परमात्मा सत्त्व, रज और तम‒इन तीनों गुणोंको काममें लाता है अर्थात् तीनों गुणोंको लेकर सृष्टि-रचना आदि सब कार्य करता है । अतः उसको गुणोंका भोक्ता कहा गया है । परन्तु उस परमात्माकी किसी भी गुणके साथ किंचिन्मात्र भी लिप्‍तता नहीं होती, इसलिये उसको गुणोंसे रहित कहा गया है ।

(२५) वह परमात्मा दूर-से-दूर भी है और वह नजदीक-से-नजदीक भी है (१३ । १५)‒यह कैसे ?

नाशवान् पदार्थोंके संग्रह और सुखभोगकी इच्छा करनेवाले तथा परमात्मासे विमुख मनुष्योंके लिये तो परमात्मा दूर-से-दूर हैं, पर जो केवल परमात्माके ही सम्मुख है, जो सब जगह परमात्माको ही देखता है, जिसके ज्ञानमें एक परमात्माके सिवाय दूसरोंकी और अपने-आपकी भी कोई अलग सत्ता नहीं है, उसके लिये परमात्मा नजदीक-से-नजदीक हैं ।

(२६) वह परमात्मा स्वयं विभागरहित होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंमें विभक्तकी तरह स्थित है (१३ । १६)‒यह कैसे ?

जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंके नाम, आकृति, माप, तौल और मूल्य अलग-अलग होते हुए भी धातुरूपसे सबमें एक सोना ही है, ऐसे ही परमात्मतत्त्व वस्तु, व्यक्ति आदिके अनेक रूपोंमें होता हुआ भी तत्त्वसे एक ही है । जैसे मनोराज्यमें स्थावर-जंगम, जड़-चेतन आदि जो कुछ दीखता है, वह सब एक मन ही होता है, ऐसे ही एक परमात्मतत्त्व सृष्टिके अनेक रूपोंमें दीखता है, पर अनेक होते हुए भी वह तत्त्वतः एक ही है ।

(२७) प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही भोक्ता बनता है (१३ । २१); शरीरमें स्थित होता हुआ भी पुरुष भोक्ता नहीं बनता (१३ । ३१)‒यह कैसे ?

तेरहवें अध्यायके इक्‍कीसवें श्‍लोकमें तो जो प्रकृतिमें स्थित[*] है अर्थात् जिसने प्रकृति (शरीर)-के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लिया है, वही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है; और इकतीसवें श्‍लोकमें जो शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद करके अपने स्वरूपमें स्थित हो गया है, वह शरीरमें रहता हुआ भी भोक्ता नहीं बनता । तात्पर्य है कि इक्‍कीसवें श्‍लोकमें तो प्रकृति (शरीर)-के साथ सम्बन्ध जोड़े हुए पुरुषका वर्णन है और इकतीसवें श्‍लोकमें शरीरके साथ सम्बन्ध तोड़े हुए पुरुषका वर्णन है ।

(२८) प्रकृतिमें स्थित (प्रकृतिस्थः) पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है (१३ । २१), धीर पुरुष सुख-दुःखमें सम तथा स्वरूपमें स्थित (स्वस्थ:) रहता है (१४ । २४), तो जो प्रकृतिमें स्थित है, वह स्वरूपमें स्थित कैसे ? और जो स्वरूपमें स्थित है, वह प्रकृतिमें स्थित कैसे ?

वास्तवमें यह पुरुष प्रकृतिमें स्थित है ही नहीं, प्रत्युत स्वतः अपने स्वरूपमें ही स्थित है । परन्तु जब यह अपनी स्थिति प्रकृतिमें अर्थात् एक शरीरमें मान लेता है अर्थात् शरीरमें अहंता-ममता कर लेता है, तब यह कर्ता-भोक्ता बन जाता है, सुखी-दुःखी हो जाता है, इसपर शुभ-अशुभ कर्म लागू हो जाते हैं, यह जन्म-मरणमें पड़ जाता है । परन्तु जब यह अपनी स्थिति प्रकृतिमें नहीं मानता, तब इसकी स्थिति स्वरूपमें ही होती है और यह कर्ता-भोक्ता नहीं बनता, सुखी-दुःखी नहीं होता, इसपर शुभ-अशुभ कर्म लागू नहीं होते, यह जन्म-मरणसे मुक्‍त हो जाता है ।



[*] यहाँ व्यष्टि शरीरमें स्थित रहनेको ही प्रकृतिमें स्थितकहा गया है; क्योंकि प्रकृति अर्थात् समष्टि शरीरमें स्थित होकर कोई भोक्ता बनता ही नहीं ।


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