।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
पौष शुक्ल द्वादशी, वि.सं. २०७५ शुक्रवार
संयोगमें वियोगका अनुभव


एक विशेष लाभकी और बहुत सीधी-सरल बात है । जीनेकी इच्छा, करनेकी इच्छा और पानेकी इच्छाये तीन इच्छाएँ हैं । ये तीन इच्छाएँ जितनी प्रबल होंगी, उतनी ही संसारमें अधिक फँसावट होंगी और वास्तविक तत्त्वको समझनेमें बड़ी भारी बाधा लगेगी । यदि इच्छाएँ मिट जायँ, तो बहुत-ही सीधा काम है ।

कल जो बात कही थी, उसे यह जीनेकी इच्छा ही समझने नहीं देती । इस इच्छासे मिलता कुछ नहीं, फायदा कुछ नहीं । सिवाय नुकसानके कोई फायदा नहीं । यह जो बात है कि जितनी उम्र बीत गयी, उतने हम मर गये, तो जीनेकी इच्छा प्रबल होनेसे ही यह बात समझमें नहीं आती । अब पावभर उम्र चली गयी तो पावभर मर गये, आधी उम्र चली गयी तो आधे मर गये और पूरी उम्र चली गयी तो पूरे मर गये । अब इसमें शंका क्या है ? जैसे सरोवरमें जल आ जाय, तो पानी समाप्त होनेपर कहते हैं ‘पानी खूट गया’ (समाप्त हो गया) ऐसे ही आदमी मर जाय तो कहते हैं ‘खूट गया’ । पानी जिस दिन भरा, उसी दिन नहीं खूटा । वह खूटते-खूटते खूट गया । पानी तो निरन्तर खूटता है और एक दिन पूरा खूट गया । ऐसे ही मनुष्य निरन्तर खूटता है । अब इसमें नयी बात कौन-सी ? तो यह सब-का-सब संसार खूट रहा है, खत्म हो रहा है ।

महाभारतके वनपर्वमें यक्ष और महाराज युधिष्ठिरका संवाद आता है । वहाँ यक्षने प्रश्न किया कि आश्चर्यकी बात क्या है ? इसका उत्तर महाराज युधिष्ठिर देते हैं ।

अहन्यहनि  भूतानि   गच्छन्तीह  यमालयम् ।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
                                      (महावन ३१३/११६)


‘संसारमें प्रतिदिन ही जीव यमलोकको जा रहे हैं, फिर भी बचे हुए लोग यहाँ सदा जीते रहनेकी इच्छा करते हैं । इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा ?’ ‘अहन्यहनि’ अर्थात् प्रत्येक दिन ही प्राणी यमलोकमें जा रहे हैं । प्रत्येक दिन कैसे ? जिस दिन जन्मा है, उसी दिनसे यमलोक नजदीक आ रहा है । तो जितने दिन बीत गये, उतनी उम्र तो कम हो ही गयी, उतनी मौत नजदीक आ ही गयी । इसमें संदेह नहीं है । दर्शन प्रतिक्षण अदर्शनमें जा रहा है । एक दिन नष्ट हो जायगा तो दीखेगा नहीं । संसार प्रतिक्षण ‘नहीं’ में जा रहा है । यदि वर्तमानमें ही सब-का-सब नहींमें मान लें तो वर्तमानमें ही तत्व-साक्षात्कार, ब्रह्मज्ञान, तत्त्वज्ञान, मुक्ति, आत्म-साक्षात्कार हो जाय ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
पौष शुक्ल एकादशी, वि.सं. २०७५ गुरुवार
पुत्रदा एकादशी-व्रत (सबका)
धर्मका सार



इस कथासे सिद्ध होता है, सुख या दुःखको देनेवाला कोई दूसरा नहीं है; कोई दूसरा सुख-दुःख देता हैयह समझना कुबुद्धि है‘सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददातीति कुबुद्धिरेषा’ (अध्यात्म २/६/६) । दुःख तो हमारे प्रारब्धसे मिलता है, पर उसमें कोई निमित्त बन जाता है तो उसपर दया आनी चाहिये कि बेचारा मुफ्तमें ही पापका भागी बन गया ! रामायणमें आता है कि वनवासके लिये जाते समय रात्रिको रामजी निषादराज गुहके यहाँ ठहरे । निषादराजने कहा‘कैकयीनंदिनी मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह । जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह ॥’ (मानस २/९१) तब लक्ष्मणजीने कहा‘काहु न कोई सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥’ (मानस २/९२/२) अतः दूसरा मेरेको दुःख देता है, मेरा अपमान करता है, मेरी निन्दा करता हैऐसा जो विचार आता है, यह कुबुद्धि है, नीची बुद्धि है । वास्तवमें दोष उसका नहीं है, दोष है हमारे पापोंका, हमारे कर्मोंका । इसलिये परमात्माके राज्यमें कोई हमारेको दुःख दे ही नहीं सकता । हमारेको जो दुःख मिलता है, वह हमारे पापोंका ही फल है । पापका फल भोगनेसे पाप कट जायगा और हम शुद्ध हो जायँगे । अतः कोई हमारा नुकसान करता है, अपमान करता है, निन्दा करता है, तिरस्कार करता है, वह हमारे पापोंका नाश कर रहा हैऐसा समझकर उसका उपकार मानना चाहिये, प्रसन्न होना चाहिये ।

किसीके द्वारा हमारेको दुःख हुआ तो वह हमारे प्रारब्धका फल है; परन्तु अगर हम उस आदमीको खराब समझेंगे, गैर समझेंगे, उसकी निन्दा करेंगे, तिरस्कार करेंगे, दुःख देंगे, दुःख देनेकी भावना करेंगे, तो अपना अन्तःकरण मैला हो जायगा, हमारा नुकसान हो जायगा ! इसलिये सन्तोंका यह स्वभाव होता है कि दूसरा उनकी बुराई करता है, तो भी वे उसकी भलाई करते हैं‘उमा संत कइ इहइ बड़ाई । मंद करत जो करइ भलाई ॥’ (मानस ५/४१/४) ऐसा सन्त-स्वभाव हमें बनाना चाहिये । अतः कोई दुःख देता है तो उसके प्रति सद्भावना रखो, उसको सुख कैसे मिलेयह भाव रखो । उसमें दुर्भावना करके मनको मैला कर लेना मनुष्यता नहीं है । इसलिये तनसे, मनसे, वचनसे सबका हित करो, किसीको दुःख न दो । जो तन-मन-वचनसे किसीको दुःख नहीं देता, वह इतना शुद्ध हो जाता है कि उसका दर्शन करनेसे पाप नष्ट होते हैं !

तन कर मन कर वचन कर, देत न काहू दुक्ख ।
तुलसी पातक हरत  है,  देखत  उसको  मुक्ख ॥

नारायण !   नारायण !!   नारायण !!!


‘साधन-सुध-सिन्धु’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
पौष शुक्ल दशमी, वि.सं. २०७५ बुधवार
एकादशी-व्रत कल है
धर्मका सार


एक दिनकी बात है । जिन्होंने जयदेवके हाथ काटे थे, वे चारों डाकू साधुके वेशमें कहीं जा रहे थे । उनको राजाने भी देखा और जयदेवने भी । जयदेवने उनको पहचान लिया कि ये वही डाकू हैं । उन्होंने राजासे कहा कि कि देखो राजन् ! तुम धन लेनेके लिये बहुत आग्रह किया करते हो । अगर धन देना हो तो वे जो चारों जा रहे हैं, वे मेरे मित्र हैं, उनको धन दे दो । मेरेको धन दो या मेरे मित्रोंको दो, एक ही बात है । राजाको आश्चर्य हुआ कि पण्डितजीने कभी उम्रभरमें किसीके प्रति ‘आप दे दो’ ऐसा नहीं कहा, पर आज इन्होंने कह दिया है ! राजाने उन चारोंको बुलवाया । वे आये और उन्होंने देखा कि हाथ कटे हुए पण्डितजी वहाँ बैठे हैं, तो उनके प्राण सूखने लगे कि अब कोई आफत आयेगी ! अब ये हमें मरवा देंगे । राजाने उनके साथ बड़े आदरका बर्ताव किया और उनको खजानेमें ले गया । उनको सोना, चाँदी, मुहरें आदि खूब दिये । लेनेमें तो उन्होंने खूब धन ले लिया, पर पासमें बोझ ज्यादा हो गया । अब क्या करें ? कैसे ले जायँ ? तो राजाने अपने आदमियोंसे कहा कि इनको पहुँचा दो । धनको सवारीमें रखवाया और सिपाहियोंको साथमें भेज दिया । वे जा रहे थे । रास्तेमें उन सिपाहियोंमें जो बड़ा अफसर था, उसके मनमें आया कि पण्डितजी किसीको भी देनेके लिये कहते ही नहीं और आज देनेके लिये कह दिया, तो क्या बात है ! उसने उनसे पूछा कि महाराज, आप बताओ कि आपने पण्डितजीका क्या उपकार किया है ? पण्डितजीके साथ आपका क्या सम्बन्ध है ? आज हमने पण्डितजीके स्वभाव विरुद्ध बात देखी है । बहुत वर्षोंसे देखता हूँ कि पण्डितजी किसीको ऐसा नहीं कहते तुम इसको दे दो, पर आपके लिये ऐसा कहा, तो बात क्या है ? वे चारों आपसमें एक-दूसरेको देखने लगे, फिर बोले कि ‘ये एक दिन मौतके मुँहमें जा रहे थे तो हमने इनको मौतसे बचाया ।  इनके हाथ ही कटे, नहीं तो गला कट जाता ! उस दिनका ये बदला चुका रहे हैं ।’ उनकी इतनी बात पृथ्वी सह नहीं सकी । पृथ्वी फट गयी और वे चारों पृथ्वीमें समा गये ! अब वे वहाँसे लौट पड़े और आकर सब बात बतायी । उनकी बात सुनकर पण्डितजी जोर-जोरसे रोने लग गये ! रोते-रोते आँसू पोंछने लगे तो उनके हाथ साबुत हो गये । यह देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि यह क्या तमाशा है ! हाथ कैसे आ गये ? राजाने सोचा कि वे इनके कोई धनिष्ठ-मित्र थे, इसलिये उनके मरनेसे पण्डितजी रोते हैं । उनसे पूछा कि महाराज, बताओ तो सही, बात क्या है ? हमारेको तो आप उपदेश देते हैं कि शोक नहीं करना चाहिये, चिन्ता नहीं करनी चाहिये, फिर मित्रोंका नाश होनेसे आप क्यों रोते हैं ? शोक क्यों करते हैं ? तो वे बोले कि ये जो चार आदमी थे, इन्होंने ही मेरेसे धन छीन लिया और हाथ काट दिये । राजाने बड़ा आश्चर्य किया और कहा कि महाराज, हाथ काटनेवालोंको आपने मित्र कैसे कहा ? जयदेव बोले कि देखो राजन् ! एक जबानसे उपदेश देता है और एक क्रियासे उपदेश देता है । क्रियासे उपदेश देनेवाला ऊँचा होता है । मैंने जिन हाथोंसे आपसे धन लिया, रत्न लिये, वे हाथ काट देने चाहिये । यह काम उन्होंने कर दिया और धन भी ले गये । अतः उन्होंने मेरा उपकार किया, मेरेपर कृपा की, जिससे मेरा पाप काट गया । इसलिये वे मेरे मित्र हुए । रोया मैं इस बातके लिये कि लोग मेरेको सन्त कहते हैं, अच्छा पुरुष कहते हैं, पण्डित कहते हैं, धर्मात्मा कहते हैं और मेरे कारणसे उन बेचारोंके प्राण चले गये ! अतः मैंने भगवान्‌को रो करके प्रार्थना की कि हे नाथ ! मेरेको लोग अच्छा आदमी कहते हैं तो बड़ी गलती करते हैं ! मेरे कारणसे आज  चार आदमी मर गये, तो मैं अच्छा कैसे हुआ ? मैं बड़ा दुष्ट हूँ । हे नाथ ! मेरा कसूर माफ करो । अब मैं क्या करूँ ? मेरे हाथकी बात कुछ रही नहीं; अतः प्रार्थनाके सिवा और मैं क्या कर सकता हूँ । राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ और बोला कि महाराज, आप अपनेको अपराधी मानते हो कि चार आदमी मेरे कारण मर गये, तो फिर आपके हाथ कैसे आ गये ? वे बोले कि भगवान्‌ अपने जनके अपराधोंको, पापोंको, अवगुणोंको देखते ही नहीं ! उन्होंने कृपा की तो हाथ आ गये ! राजाने कहा कि महाराज, उन्होंने आपको इतना दुःख दिया तो आपने उनको धन क्यों दिलवाया ? वे बोले कि देखो राजन् ! उनको धनका लोभ था और लोभ होनेसे वे और किसीके हाथ काटेंगे; अतः विचार किया कि आप धन देना चाहते ही हैं तो उनको इतना धन दे दिया जाय कि जिससे बेचारोंको कभी किसी निर्दोषकी हत्या न करनी पड़े । मैं तो सदोष था, इसलिये मुझे दुःख दे दिया । परन्तु वे किसी निर्दोषको दुःख न दे दें, इसलिये मैंने उनको भरपेट धन दिलवा दिया । राजाको बड़ा आश्चर्य आया ! उसने कहा कि आपने मेरेको पहले क्यों नहीं बताया ? वे बोले कि महाराज ! अगर पहले बताता तो आप उनको दण्ड देते । मैं उनको दण्ड नहीं दिलाना चाहता था । मैं तो उनकी सहायता करना चाहता था; क्योंकि उन्होंने मेरे पापोंका नाश किया, मेरेको क्रियात्मक उपदेश दिया । मैंने तो अपने पापोंका फल भोगा, इसलिये मेरे हाथ कट गये । नहीं तो भगवान्‌के दरबारमें, भगवान्‌के रहते हुए कोई किसीको अनुचित दण्ड दे सकता है ? कोई नहीं दे सकता । यह तो उनका उपकार है कि मेरे पापोंका फल भुगताकर मेरेको शुद्ध कर दिया ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
पौष शुक्ल नवमी, वि.सं. २०७५ मंगलवार
प्रातःकालसे मकर-संक्रान्तिजन्य पुण्यकाल, खिचड़ी
धर्मका सार



सब-के-सब हमारे अनुकूल कैसे बनें ? कि हम किसीके भी प्रतिकूल न बनें, किसीके भी विरुद्ध काम न करें । अपने स्वार्थ और अभिमानमें आकर दूसरेका निरादर कर दें, तिरस्कार कर दें, अपमान कर दें और दूसरेको बुरा समझें कि यह आदमी बुरा है, तो फिर दूसरा हमारा आदर-सम्मान करे, हमें अच्छा समझे इसके लायक हम नहीं हैं । जबतक हम किसीको बुरा आदमी समझते हैं, तबतक हमें कोई कोई बुरा आदमी न समझेइस बातके हम हकदार नहीं होते । इसके हकदार हम तभी होते हैं, जब हम किसीको बुरा न समझें । अब कहते हैं कि बुरा कैसे न समझें ? उसने हमारा बिगाड़ किया है, हमारे धनका नुकसान किया है, हमारा अपमान किया है, हमारी निन्दा की है ! तो इसपर आप थोड़ी गंभीरतासे विचार करें । उसने हमारा जो नुकसान किया है, वह हमारा नुकसान होनेवाला था । हमारा नुकसान न होनेवाला हो और दूसरा हमारा नुकसान कर देयह हो ही नहीं सकता । परमात्माके राज्यमें हमारा जो नुकसान होनेवाला नहीं था, उस परमात्माके रहते हुए दूसरा हमारा वह नुकसान कैसे कर देगा ? हमारा तो वही नुकसान हुआ, जो अवश्यम्भावी था । दूसरा उसमें निमित्त बनकर पापका भागी बन गया; अतः उसपर दया आनी चाहिये । अगर वह निमित्त न बनता, तो भी हमारा नुकसान होता, हमारा अपमान होता । वह खुद हमारा नुकसान करके, हमारा अपमान करके पापका भागी बन गया, तो वह भूला हुआ है । भूले हुएको रास्ता दिखाना हमारा काम है या धक्का देना ? अतः उस बेचारेको बचाओ कि उसने मेरा नुकसान किया ही, वैसे किसी औरका नुकसान कर दे । ऐसा भाव जिसके भीतर होता है, वह धर्मात्मा है, महात्मा होता है, श्रेष्ठ पुरुष होता है ।


         ‘गीत-गोविन्द’ की रचना करनेवाले पण्डित जयदेव एक बड़े अच्छे सन्त हुए हैं । एक राजा उनपर बहुत भक्ति रखता था और उनका सब प्रबन्ध अपनी तरफसे ही किया करता था । वे ब्राह्मण देवता (जयदेव) त्यागी थे और गृहस्थ होते हुए भी ‘मेरेको कुछ मिल जाय, कोई धन दे दे’ऐसा चाहते नहीं थे । उनकी स्त्री भी बड़ी विलक्षण पतिव्रता थी; क्योंकि उनका विवाह भगवान्‌ने करवाया था, वे विवाह करना नहीं चाहते थे । एक दिनकी बात है, राजाने उनको बहुत-सा धन दिया, लाखों रुपयोंके रत्न दिये । उनको लेकर वे वहाँसे रवाना हुए और घरकी तरफ चले । रास्तेमें जंगल था । डाकुओंको इस बातका पता लग गया । उन्होंने जंगलमें जयदेवको घेर लिया और उनके पास जो धन था, वह सब छीन लिया । डाकुओंके मनमें आया कि यह राजाका गुरु है, कहीं  जीता रह जायगा तो हमारेको पकड़वा देगा । अतः उन्होंने जयदेवके दोनों हाथ काट लिये और उनको एक सूखे कुएँमें गिरा दिया । जयदेव कुएँके भीतर पड़े रहे । एक-दो दिनमें राजा जंगलमें आया । उसके आदमियोंने पानी लेनेके लिये कुएँमें लोटा डाला तो वे कुएँमेंसे बोले कि ‘भाई, ध्यान रखना, मेरेको लग न जाय । इसमें जल नहीं है, क्या करते हो !’ उन लोगोंने आवाज सुनी तो बोले कि यह आवाज तो पण्डितजीकी है ! पण्डितजी यहाँ कैसे आये ! उन्होंने राजाको कहा कि महाराज ! पण्डितजी तो कुएँमेंसे बोल रहे हैं । राजा वहाँ गया । रस्सा डालकर उनको कुएँमेंसे निकाला, तो देखा कि उनके दोनों हाथ कटे हुए हैं । उनसे पूछा गया कि कैसे हुआ ? तो वे बोले कि भाई देखो, जैसा हमारा प्रारब्ध था, वैसा हो गया । उनसे बहुत कहा गया कि बताओ तो सही, कौन है, कैसा है । परन्तु उन्होंने कुछ नहीं बताया, यही कहा कि हमारे कर्मोंका फल है । राजा उनको घरपर ले गये । उनकी मलहम-पट्टी की, इलाज किया और खिलाने-पिलाने आदि सब तरहसे उनकी सेवा की ।  

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