।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   कार्तिक कृष्ण द्वादशी, वि.सं.-२०७४, सोमवार
गौवत्स-द्वादशी
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



(गत ब्लॉगसे आगेका)

 मनुष्यमात्रके भीतर बीजरूपसे एक तो मुक्ति (अखण्ड आनन्द)-की माँग रहती है, दूसरी दुःखनिवृतिकी माँग रहती है और तीसरी परमप्रेमकी माँग रहती है । मुक्तिकी माँग (स्वयंकी भूख) ज्ञानयोगसे, दुःखनिवृत्तिकी माँग कर्मयोगसे और परमप्रेमकी माँग भक्तियोगसे पूरी होती है । अगर साधकमें अपने साधनका आग्रह, पक्षपात न हो तो एक माँगकी पूर्तिसे तीनों माँगें पूर्ण हो जाती हैं ।
                                      ज्ञानयोगका मार्ग

  मनुष्यमात्रको ‘मैं हूँ’‒इस रूपमें अपनी एक सत्ताका अनुभव होता है । इस सत्तामें अहम्‌ (‘मैं’) मिला हुआ होनेसे ही ‘हूँ’ के रूपमें अपनी एकदेशीय सत्ता अनुभवमें आती है । यदि अहम्‌ न रहे तो ‘है’ के रूपमें सर्वदेशीय सत्ता ही अनुभवमें आयेगी । वह सर्वदेशीय सत्ता ही मनुष्यका वास्तविक स्वरूप है । उस सत्तामें अहम्‌ (जड़ता) नहीं है । जब मनुष्य अहम्‌को स्वीकार करता है, तब वह बँध जाता है और जब सत्ता (‘है’) को स्वीकार करता है, तब वह मुक्त हो जाता है ।

 संसारका स्वरूप है‒क्रिया और पदार्थ । क्रिया और पदार्थ‒दोनों ही आदि-अन्तवाले (अनित्य) हैं । प्रत्येक क्रियाका आरम्भ और अन्त होता है । प्रत्येक पदार्थकी उत्पत्ति और विनाश होता है । मात्र जड़ वस्तु मिली है और प्रतिक्षण बिछुड़ रही है । जो मिली है और बिछुड़ जायगी, उसका उपयोग केवल संसारकी सेवामें ही हो सकता है । अपने लिये उसका कोई उपयोग नहीं है । कारण कि मिली हुई और बिछुड़नेवाली वस्तु अपनी नहीं होती‒यह सिद्धान्त है । जो वस्तु अपनी नहीं होती, वह अपने लिये भी नहीं होती । अपनी वस्तु वह होती है, जिसपर हमारा पूरा अधिकार हो और अपने लिये वस्तु वह होती है, जिसको पानेके बाद फिर कुछ भी पाना शेष नहीं रहे । परन्तु यह हम सबका अनुभव है कि शरीरादि मिली हुई वस्तुओंपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं चलता । हम अपनी इच्छाके अनुसार उनको प्राप्त नहीं कर सकते, उनको बना नहीं सकते, उनमें परिवर्तन नहीं कर सकते । उनकी प्राप्तिके बाद भी ‘और मिले, और मिले’ यह कामना बनी रहती है अर्थात्‌ अभाव बना रहता है । इस अभावकी कभी पूर्ति नहीं होती । इसलिये साधकको चाहिये कि वह इस सत्यको स्वीकार करे कि मिली हुई और बिछुड़नेवाली वस्तु मेरी और मेरे लिये नहीं है ।


  मिली हुई और बिछुड़नेवाली वस्तुको अपनी और अपने लिये न माननेसे मनुष्य निर्मम हो जाता है । निर्मम होते ही उसके द्वारा मिली ही वस्तुओंका सदुपयोग सुगमतासे होने लगता है । कारण कि निर्मम हुए बिना प्राप्त वस्तुओंका सदुपयोग नहीं हो सकता । ममतावाले मनुष्यके द्वारा प्राप्त वस्तुओंका दुरुपयोग ही होता है । भोग और संग्रह करना ही वस्तुओंका दुरुपयोग है और उनको दूसरोंकी सेवामें लगाना ही उनका सदुपयोग है । प्राप्त वस्तुओंके दुरुपयोगसे समाजमें संघर्ष पैदा होता है और सदुपयोगसे समाजमें शान्तिकी स्थापना होती है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्ग’ पुस्तकसे

|
।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   कार्तिक कृष्ण एकादशी, वि.सं.-२०७४, रविवार
रम्भा एकादशी-व्रत (सबका)
कल्याणके तीन सुगम मार्ग



श्रीभगवान्‌ कहते हैं

योगास्त्रयो  मया  प्रोक्ता   नृणां  श्रेयोविधित्सया ।
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित् ॥
                                             (श्रीमद्भा ११/२०/६)

अपना कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंके लिये मैंने तीन योग बताये हैंज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग । इन तीनोंके सिवाय दूसरा कोई कल्याणका मार्ग नहीं है ।

प्रत्येक मनुष्य वास्तवमें साधक है । कारण कि चौरासी लाख योनियोंमें भटकते हुए जीवको यह मनुष्यशरीर केवल अपना कल्याण करनेके लिये ही मिला है । किसी आकृतिविशेषका नाम मनुष्य नहीं है, प्रत्युत मनुष्य वह है, जिसमें सत्‌ और असत्‌ तथा कर्तव्य और अकर्तव्यका विवेक हो । यह विवेक अनादि और भगवत्प्राप्त है । इस विवेकको महत्त्व देकर मनुष्य ज्ञानयोगी, कर्मयोगी अथवा भक्तियोगी बन सकता है और सुगमतापूर्वक अपना कल्याण कर सकता है । मिले हुए और बिछुड़नेवाले शरीरका नाम मनुष्य नहीं है । शरीर तो केवल कर्म-सामग्री है, जिसका उपयोग केवल दूसरोंकी सेवा करनेमें ही है । परन्तु जब मनुष्य मिले हुए और बिछुड़नेवाले शरीर, वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदिको अपना और अपने लिये मान लेता है, तब वह कोई-सा भी योगी नहीं होता, प्रत्युत भोगी होता है । भोगी व्यक्ति स्वयं भी दुःख पाता है और दूसरोंको भी दुःख देता है; क्योंकि दुःखी व्यक्ति ही दूसरोंको दुःख देता हैयह सिद्धान्त है ।

मनुष्यशरीर अपना कल्याण करनेके लिये ही मिला है, इसलिये किसी भी मनुष्यको अपने कल्याणसे निराश नहीं होना चाहिये । मनुष्यमात्रको परमात्मप्राप्तिका जन्मसिद्ध अधिकार है । साधक होनेके नाते मनुष्यमात्र अपने साध्यको प्राप्त करनेमें स्वतन्त्र एवं समर्थ है । सबसे पहले इस बातकी आवश्यकता है कि मनुष्य अपने उद्देश्यको पहचानकर यह स्वीकार करे कि मैं संसारी नहीं हूँ, प्रत्युत साधक हूँ । मैं स्त्री हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं वैश्य हूँ, मैं शूद्र हूँ, मैं अन्त्यज हूँ, मैं ब्रह्मचारी हूँ, मैं गृहस्थ हूँ, मैं वानप्रस्थ हूँ, मैं संन्यासी हूँ आदि मान्यताएँ सांसारिक व्यवहार (मर्यादा)-के लिये तो ठीक हैं, पर परमात्मप्राप्तिमें ये बाधक हैं । ये मान्यताएँ शरीरको लेकर हैं । परमात्मप्राप्ति शरीरको नहीं होती, प्रत्युत साधकको होती है । साधक अशरीरी होता है । जब मनुष्य अपनेको साधक स्वीकार कर लेता है, तब उसके द्वारा असाधनका त्याग स्वतः होने लगता है । मिले हुए और बिछुड़नेवाले शरीर, वस्तु, योग्यता, सामर्थ्य आदिको अपना और अपने लिये मानना ही असाधन है । इस असाधनको मिटाना प्रत्येक साधकके लिये आवश्यक है ।

जगत्‌, जीव और परमात्मा इन तीनोंके सिवाय अन्य कोई नहीं है । गीतामें इन तीनोंका विभिन्न नामोंसे वर्णन हुआ है; जैसेपरा, अपरा और भगवान्‌; क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम आदि । इन तीनोंमें जगत्‌ और जीवये दोनों विचारके विषय होनेसे लौकिक[1] हैं  । परन्तु परमात्मा विचारका विषय न होनेसे अलौकिक[2] हैं  । इन तीनोंमें जीवको लेकर ज्ञानयोग, जगत्‌को लेकर कर्मयोग और परमात्माको लेकर भक्तियोग चलता है । इसलिये ज्ञानयोग तथा कर्मयोगये दोनों लौकिक साधन[3] हैं  और भक्तियोग अलौकिक साधनहै । लौकिक साधनसे मुक्ति होती है और अलौकिक साधनसे परमप्रेमकी प्राप्ति होती है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘कल्याणके तीन सुगम मार्गपुस्तकसे




[1] द्वाविमौ पुरुषौ लोके   क्षरश्चाक्षर एव च ।
      क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ (गीता १५/१६)

[2] उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः  परमात्मेत्युदाहृतः ।
      यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ (गीता १५/१७)

[3] लोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ ।
      ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां    कर्मयोगेन योगिनाम् ॥ (गीता ३/३)

|
।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   कार्तिक कृष्ण दशमी, वि.सं.-२०७४, शनिवार
एकादशी-व्रत कल है
सत्यकी स्वीकृतिसे कल्याण



(गत ब्लॉगसे आगेका)


 आप केवल इतनी बात याद कर लें कि जड़ चीजोंके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है; क्योंकि वे प्रकृतिकी अंश हैं और हम परमात्माके अंश हैं । उत्पन्न और नष्ट होनेवाली चीजोंका असर हमारेपर कैसे पड़ सकता है ? आपतक वह असर पहुँचता ही नहीं । आप असंग हैं । स्थिरता और समाधि भी आपकी नहीं है, प्रत्युत कारणशरीरकी है । आप कारणशरीरसे अलग हैं । समाधिमें दो अवस्थाएँ होती हैं–समाधि और व्युत्थान । आपमें दो अवस्थाएँ नहीं होतीं । आपकी सहजावस्था है, जो स्वतः-स्वाभाविक है । आपका स्वरूप सत्तामात्र है ।

  सार बात है कि जड़ और चेतन कभी मिलते नहीं, मिल सकते नहीं । जड़-चेतनका सम्बन्ध झूठा है । जैसे अमावस्याकी रातका सूर्यके साथ विवाह नहीं हो सकता, ऐसे ही जड़का चेतनके साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता ।

  प्रश्न–जड़-चेतनका सम्बन्ध झूठा है तो उसको छोड़नेमें कठिनता क्यों है ?

  उत्तर–जड़-चेतनका सम्बन्ध झूठा होनेपर भी उसको छोड़नेमें कठिनता इसलिये होती है कि आपने जड़-चेतनके सम्बन्धको महत्त्व दे दिया । अतः आज ही अपने विवेकको महत्त्व देकर सच्चे हृदयसे इस सत्यको स्वीकार कर लें कि जड़ (शरीर-संसार) के साथ हमारा बिलकुल सम्बन्ध नहीं है । हमारा सम्बन्ध परमात्माके साथ है ।

  मनुष्यमें शरीरको लेकर भोगोंकी इच्छा (कामना) होती है, स्वरूपको लेकर तत्त्वकी इच्छा (जिज्ञासा) होती है और परमात्माको लेकर प्रेमकी इच्छा (अभिलाषा) होती है । शरीर अपना नहीं है, इसलिये भोगकी इच्छा भी अपनी नहीं है, प्रत्युत भूलसे उत्पन्न होनेवाली है । परन्तु तत्त्वकी और प्रेमकी इच्छा अपनी है, भूलसे होनेवाली नहीं है । इसलिये शरीरको निष्कामभावपूर्वक दूसरोंकी सेवामें लगानेसे अथवा तत्त्वकी जिज्ञासा तेज होनेसे भूल मिट जाती है । भूल मिटनेसे भोगकी कामना मिट जाती है और तत्त्वकी जिज्ञासा पूर्ण हो जाती है अर्थात् मनुष्यको तत्त्वज्ञान हो जाता है, जीवन्मुक्ति हो जाती है । फिर स्वरूप जिसका अंश है, उस परमात्माके प्रेमकी अभिलाषा जाग्रत् होती है । सम्पूर्ण जीव परमात्माके अंश हैं, इसलिये प्रेमकी इच्छा सम्पूर्ण जीवोंकी अन्तिम तथा सार्वभौम इच्छा है । मुक्ति तो साधन है, पर प्रेम साध्य है । जैसे समुद्रसे सूर्य-किरणोंके द्वारा जल उठता है तो उसकी यात्रा तबतक पूरी नहीं होती, जबतक वह समुद्रमें मिल नहीं जाता, ऐसे ही परमात्माका अंश जीवात्मा जबतक परम प्रेमकी प्राप्ति नहीं कर लेता, तबतक उसकी यात्रा पूरी नहीं होती । परम प्रेमका उदय होनेपर मनुष्यजीवन पूर्ण हो जाता है, फिर कुछ बाकी नहीं रहता ।

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!


‒ ‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

|
।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   कार्तिक कृष्ण अष्टमी, वि.सं.-२०७४, शुक्रवार
सत्यकी स्वीकृतिसे कल्याण



(गत ब्लॉगसे आगेका)


  मन-बुद्धि चाहे आपके हों, चाहे कुत्तेके हों, उनसे आपका कोई सम्बन्ध नहीं है । कुत्तेके मन-बुद्धिपर असर पड़ता है तो क्या आप सुखी-दुःखी होते हो ? जैसे कुत्तेके मन-बुद्धि आपके नहीं हैं, ऐसे ही आपके मन-बुद्धि भी वास्तवमें आपके नहीं हैं । मन-बुद्धिको अपना मानना ही मूल गलती है । इनको अपना मानकर आप मुफ्तमें ही दुःख पाते हो !

   एक मार्मिक बात है कि हमारे और परमात्माके बीचमें जड़ता (शरीर-संसार) का परदा नहीं है, प्रत्युत जड़ताके सम्बन्धका परदा है । यह बात पढ़ाईकी पुस्तकोंमें, वेदान्तके ग्रन्थोंमें मेरेको नहीं मिली । केवल एक जगह सन्तोंसे मिली है । इसलिये शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिसे हमारा बिलकुल सम्बन्ध नहीं है–ऐसा स्वीकार कर लो तो आप निहाल हो जाओगे ।

    प्रश्न–जड़ताका सम्बन्ध छोड़नेके लिये क्या अभ्यास करना पड़ेगा ?

   उत्तर–जड़ताका सम्बन्ध अभ्याससे नहीं छूटता, प्रत्युत विवेक-विचारसे छूटता है । यह अभ्याससे होनेवाली बात है ही नहीं । विवेकको आदर करो तो आज ही यह सम्बन्ध छूट सकता है । आप दो बातोंको स्वीकार कर लें–जानना और मानना । जड़के साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है–यह ‘जानना’ है और हमारा सम्बन्ध भगवान्‌के साथ है–यह ‘मानना’ है । अनन्त ब्रह्माण्डोंमें केश-जितनी चीज भी हमारी नहीं है–यह जाननेपर जड़ताका असर नहीं पड़ेगा । इसमें अभ्यास काम नहीं करता, पर विवेकसे तत्काल काम होता है । आपपर असर नहीं पड़ता, आप वैसे-के-वैसे ही रहते हो । वास्तवमें मुक्ति स्वतः-स्वाभाविक है । मुक्ति होती नहीं है, प्रत्युत मुक्ति है । जो होती है, वह मिट जाती है और जो है, वह कभी मिटती नहीं–

‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’
                                     (गीता २।१६)

    ‘असत्‌की सत्ता विद्यमान नहीं है और सत्‌का अभाव विद्यमान नहीं है ।’

  आपने असरको सच्चा मान लिया, जो कि असत् है, झूठा है । मन-बुद्धिके साथ आपका सम्बन्ध है ही नहीं । श्रीशरणानंदजी महाराजसे किसीने पूछा कि कुण्डलिनी क्या होती है ? उन्होंने उत्तर दिया कि कुण्डलिनी क्या होती है–यह तो हम जानते नहीं, पर इतना जरूर जानते हैं कि कुण्डलिनीके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है । कुण्डलिनी सोती रहे अथवा जाग जाय, हमारा उससे क्या मतलब ? ऐसे ही शरीर-संसारके साथ हमारा सम्बन्ध ही नहीं है । अतः उसके असरका आदर मत करो । यह अभ्याससे नहीं होगा । अभ्याससे कुछ लाभ नहीं होगा । अभ्याससे तत्त्वज्ञान कभी हुआ नहीं, कभी होगा नहीं, कभी हो सकता नहीं । विवेकका आदर करो तो आज ही, अभी निहाल हो जाओगे ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

|
।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि–
   कार्तिक कृष्ण सप्तमी, वि.सं.-२०७४, गुरुवार
अहोई-व्रत
सत्यकी स्वीकृतिसे कल्याण



(गत ब्लॉगसे आगेका)


  अगर संसारका असर पड़ जाय तो परवाह मत करो, उसको स्वीकार मत करो, फिर वह मिट जायगा । असरको महत्त्व देकर आप बड़े भारी लाभसे वंचित हो रहे हो । इसलिये असर पड़ता है तो पड़ने दो, पर मनमें समझो कि यह सच्ची बात नहीं है । झूठी चीजका असर भी झूठा ही होगा, सच्चा कैसे होगा ? आपसे कोई पैसा ठगता है तो आपको उसकी बात ठीक दीखती है, आप उससे मोहित हो जाते हो, तभी तो ठगाईमें आते हो । ऐसे ही संसारका असर पड़ना बिलकुल ठगाई है, मूर्खता है ।

  एक मार्मिक बात है कि असर शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिपर पड़ता है, आपपर नहीं । जिस जातिकी वस्तु है, उसी जातिपर उसका असर पड़ता है, आपपर नहीं पड़ता, क्योंकि आपकी जाती अलग है । शरीर-संसार जड़ हैं, आप चेतन हो । जड़का असर चेतनपर कैसे पड़ेगा ? जड़का असर तो जड़ (शरीर) पर ही पड़ेगा । यह सच्ची बात है । इसको अभी मान लो तो अभी काम हो गया ! आँखोंके कारण देखनेका असर पड़ता है । कानोंके कारण सुननेका असर पड़ता है । तात्पर्य है कि असर सजातीय वस्तुपर पड़ता है । अतः कितना ही असर पड़े, उसको आप सच्चा मत मानो । आपके स्वरूपपर असर नहीं पड़ता । स्वरूप बिलकुल निर्लेप है–‘असंगो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदारण्यक ४।३।१५) । मन-बुद्धि़पर असर पड़ता है तो पड़ता रहे । मन-बुद्धि हमारे नहीं हैं । ये उसी धातुके हैं, जिस धातुकी वस्तुका असर पड़ता है ।

 प्रश्न–फिर सुखी दुःखी स्वयं क्यों होता है ?

उत्तर–मन-बुद्धिको अपना माननेसे ही स्वयं सुखी-दुःखी होता है । मन-बुद्धि अपने नहीं हैं, प्रत्युत प्रकृतिके अंश हैं । आप परमात्माके अंश हो । मन-बुद्धिपर असर पड़नेसे आप सुखी-दुःखी हो जाते हो तो यह गलतीकी बात है । वास्तवमें आप सुखी-दुःखी नहीं होते, प्रत्युत ज्यों-के-त्यों रहते हो । विचार करें, अगर आपके ऊपर सुख-दुःखका असर पड़ जाय तो आप अपरिवर्तनशील और एकरस नहीं रहेंगे । आपपर असर पड़ता नहीं है, प्रत्युत आप अपनेपर असर मान लेते हैं । कारण कि आपने मन-बुद्धिको अपने मान रखा है, जो आपके कभी नहीं हैं, कभी नहीं हैं । मन-बुद्धि प्रकृतिके हैं और प्रकृतिका असर प्रकृतिपर ही पड़ेगा ।

  प्रश्न–असर पड़नेपर वैसा कर्म हो जाय तो ?

  उत्तर–कर्म भी हो जाय तो भी आपमें क्या फर्क पड़ा ? आप विचार करके देखो तो आपपर असर नहीं पड़ा । परन्तु मुश्किल यह है कि आप उसके साथ मिल जाते हो । आप मन-बुद्धिको अपना स्वरूप मानकर ही कहते हो कि हमारेपर असर पड़ा । मन-बुद्धि आपके नहीं हैं, प्रत्युत प्रकृतिके हैं– ‘मनःषष्ठानीनिन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति’ (गीता १५।७)  और आप मन-बुद्धिके नहीं हो, प्रत्युत परमात्माके हो– ‘ममैवांशो जीवलोके’ (गीता १५।७) । इसलिये असर मन-बुद्धिपर पड़ता है, आपपर नहीं । आप तो वैसे-के-वैसे ही रहते हो–‘समदुखः स्वस्थः’ (गीता १४।२४) । प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही सुख-दुःखका भोक्ता बनता है– ‘पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्’ (गीता १३।२१) । मन-बुद्धि़पर असर पड़ता है तो पड़ता रहे, अपनेको क्या मतलब है ! असरको महत्त्व मत दो । इसको अपनेमें स्वीकार मत करो । आप ‘स्व’ में स्थित हैं– ‘स्वस्थः ।’ असर ‘स्व’ में पहुँचता ही नहीं । असत् वस्तु सत्‌में  कैसे पहुँचेगी ? और सत् वस्तु असत्‌में कैसे पहुँचेगी ? सत् तो निर्लेप रहता है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘सत्यकी खोज’ पुस्तकसे

|