।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आश्विन शुक्ल दशमी, वि.सं.–२०७५, शुक्रवार
विजयादशमी
        करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन
और करणरहित साध्य



क्रियमाण कर्म अनेक प्रकारके कहे गये हैं । जैसे, व्याकरणकी दृष्टिसे कर्म चार प्रकारके हैं‒उत्पाद्य, विकार्य, संस्कार्य (मलापकर्ष तथा गुणाधान) और आप्य [ कहीं-कहीं निर्वर्त्य, विकार्य और प्राप्य‒ये तीन प्रकार कहे गये हैं ] । न्यायकी दृष्टिसे कर्म पाँच प्रकारके हैं‒उत्थेपण, अवक्षेपण, आकुञ्चन, प्रसारण और गमन । धर्मकी दृष्टिसे भी कर्म पाँच प्रकारके हैं‒नित्य, नैमित्तिक, काम्य, प्रायश्चित्त और आवश्यक कर्तव्य-कर्म । ये सभी प्रकारके कर्म प्रकृतिके सम्बन्धसे होनेवाले हैं । प्रकृतिके सम्बन्धसे रहित स्वयं (स्वरूप) कभी किंचिन्मात्र भी किसी कर्मका कर्ता नहीं है । भगवान्‌ने स्वरूपको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की है कि उसकी बुद्धि शुद्ध अर्थात् विवेकवती नहीं है, वह दुर्मति है[1] । परन्तु जो अहम्‌को अपना स्वरूप नहीं मानता, ऐसा तत्त्वज्ञ महापुरुष स्वयंको कर्ता अनुभव नहीं करता‘नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ (गीता ५ । ८) । तात्पर्य है कि अहम्‌को अपना स्वरूप माननेसे जो ‘अहङ्कारविमूढात्मा’ हो गया था, वही अपनेको अहम्‌से अलग अनुभव करनेपर ‘तत्त्ववित्’ हो जाता है ।

अहंकारसे मोहित होकर स्वयंने भूलसे अपनेको कर्ता मान लिया तो वह कर्म तथा उनके फलोंसे बँध गया और चौरासी लाख योनियोंमें चला गया । अब यदि वह अपनेको अहम्‌से अलग माने और अपनेको कर्ता न माने अर्थात् स्वयं वास्तवमें जैसा है, वैसा ही अनुभव कर ले तो उसके तत्त्ववित् (मुक्त) होनेमें आश्चर्य ही क्या है ? तात्पर्य है कि जो असत्य है, वह भी जब सत्य मान लेनेसे सत्य दीखने लग गया तो फिर जो वास्तवमें सत्य है, उसको मान लेनेपर वह वैसा ही दीखने लग जाय तो इसमें क्या आश्चर्य है ?

वास्तवमें स्वयं जिस समय अपनेको कर्ता-भोक्ता मानता है, उस समय भी वह कर्ता-भोक्ता नहीं है‒‘शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते’ (गीता १३ । ३१) । कारण कि अपना स्वरूप सत्तामात्र है । सत्तामें अहम् नहीं है और अहम्‌की सत्ता नहीं है । अतः ‘मैं कर्ता हूँ’यह मान्यता कितनी ही दृढ़ हो, है तो भूल ही ! भूलको भूल मानते ही भूल मिट जाती है‒यह नियम है । किसी गुफामें सैकड़ों वर्षोंसे अन्धकार हो तो प्रकाश करते ही वह तत्काल मिट जाता है, उसके मिटनेमें अनेक वर्ष-महीने नहीं लगते । इसलिये साधक दृढ़तासे यह मान ले कि ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’[2] । फिर यह मान्यता मान्यतारूपसे नहीं रहेगी, प्रत्युत अनुभवमें परिणत हो जायगी ।



[1] तत्रैव सति  कर्तारमात्मान  केवलं  तु यः ।
   पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥
                                           (गीता १८ । १६)

[2] जड-चेतनकी ग्रन्थि होनेसे ‘मैं’ का प्रयोग जड (तादात्म्यरूप अहम्) के लिये भी होता है और चेतन (स्वरूप) के लिये भी होता है । जैसे, ‘मैं कर्ता हूँ’इसमें जडकी तरफ दृष्टि है और ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’इसमें (जडका निषेध होनेसे) चेतनकी तरफ दृष्टि है । जिसकी दृष्टि जडकी तरफ है अर्थात् जो अहम्‌को अपना स्वरूप मानता है, वह ‘अहङ्कारविमूढात्मा’ है और जिसकी दृष्टि चेतन (अहंरहित स्वरूप) की तरफ है, वह ‘तत्त्ववित्’ है ।

|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आश्विन शुक्ल नवमी, वि.सं.–२०७५, गुरुवार
        करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन
और करणरहित साध्य



भगवान्‌ने ज्ञानेन्द्रियोंको भी कर्मेन्द्रियाँ ही माना है । इसलिये गीतामें ज्ञानेन्द्रियोंका वर्णन तो आया है, पर ‘ज्ञानेन्द्रिय’ शब्द कहीं नहीं आया है । देखना, सुनना, स्पर्श करना आदि ज्ञानेन्द्रियोंकी क्रियाओंको भी गीतामें कर्मेन्द्रियोंकी क्रियाओंके साथ ही सम्मिलित किया गया है[1] तीसरे अध्यायके छठे-सातवें श्लोकोंमें भी ज्ञानेन्द्रियोंको कर्मेन्द्रियोंके अन्तर्गत ही माना गया है; क्योंकि ज्ञानेन्द्रियोंके बिना मिथ्याचार भी सिद्ध नहीं होगा और कर्मयोगका अनुष्ठान भी नहीं होगा[2] । जहाँ कर्मोंके तीन (सात्त्विक, राजस, तामस) भेद बताये गये हैं, वहाँ भी ‘ज्ञानेन्द्रिय’ शब्द नहीं आया है (गीता १० । २३‒२५) । ज्ञानेन्द्रियोंके विषयोंके लिये भी ‘पञ्च चेन्द्रियगोचराः’ (गीता १३ । ५) पद दिया गया है ।

कर्म तीन प्रकारके होते हैं‒क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध । मनुष्य वर्तमानमें जो कर्म करता है, वे ‘क्रियमाण’ कर्म हैं । भूतकालमें (इस जन्ममें अथवा पहलेके अनेक मनुष्य-जन्मोंमें) किये हुए जो कर्म अन्तःकरणमें संगृहीत हैं, वे ‘संचित’ कर्म हैं । संचितमेंसे जो कर्म फल देनेके लिये उन्मुख हो गये हैं अर्थात् जन्म, आयु और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें परिणत होनेके लिये सामने आ गये हैं, वे ‘प्रारब्ध’ कर्म हैं ।



      [1] नैव किञ्चित्करोमीति   युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि           ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु   वर्तन्त   इति  धारयन् ॥
                                                (गीता ५ । ८-९)

‘तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, त्याग करता, सोता, खास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं‒ऐसा समझकर ‘मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ’ऐसा माने ।’

यहाँ देखना, सुनना, स्पर्श करना, सूँघना और खाना‒यें पाँच क्रियाएँ ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं । चलना, ग्रहण करना, बोलना और मल-मूत्रका त्याग करना‒ये चार क्रियाएँ कर्मेन्द्रियोंकी हैं । सोना‒यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है । श्वास लेना‒यह एक क्रिया प्राणकी है । आँखे खोलना तथा मूँदना‒ये दो क्रियाएँ उपप्राणकी हैं । तात्पर्य है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरमें होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिमें ही होती हैं, स्वयंमें नहीं । अतः स्वयंका किसी भी क्रियासे किंचिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है ।

    [2] कर्मेन्द्रियाणि संयम्य  य आस्ते मनसा स्मरन् ।
         इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥
         यस्त्विन्द्रियाणि मनसा     नियम्यारभतेऽर्जुन ।
         कर्मेन्द्रियैः    कर्मयोगमसक्तः   स  विशिष्यते ॥
                                                    (गीता ३ । ६-७)

|
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आश्विन शुक्ल अष्टमी, वि.सं.–२०७५, बुधवार
            श्रीदुर्गाष्टमीव्रत, श्रीदुर्गानवमीव्रत
        करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन
और करणरहित साध्य



६. कर्तापन-भोक्तापनका निषेध

मात्र क्रियाएँ प्रकृतिमें ही होती हैं । प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है । वह किसी भी अवस्था (सर्ग-प्रलय, महासर्ग-महाप्रलय) में क्षणमात्र भी अक्रिय नहीं रहती । प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाको भगवान्‌ने गीतामें अनेक प्रकारसे बताया है; जैसे‒सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं (१३ । २९); सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंके द्वारा होती हैं; अतः गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (३ । २७-२८, १४ । २३); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं (१४ । १९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं (५ । ९); स्वभाव ही बरत रहा है (५ । १४); सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु हैं‒अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (१८ । १३-१४) । इस प्रकार क्रियाओंको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें, चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंसे होनेवाली कहें, चाहे इन्द्रियोंसे होनेवाली कहें, वास्तवमें एक ही बात है । एक ही बातको अलग-अलग प्रकारसे कहनेका तात्पर्य यह है कि स्वयं (चेतन) किसी भी क्रियाका किंचिन्मात्र भी कर्ता नहीं है । जैसे प्रकृति कभी अक्रिय रहती ही नहीं, ऐसे ही स्वयंमें कभी क्रिया होती ही नहीं । परन्तु जब स्वयं प्रकृतिके अंश अहम्‌के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् अहम्‌को अपना स्वरूप मान लेता है, तब वह स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मानने लगता है‒‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३ । २७) । जैसे कोई मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीमें बैठा है, चल नहीं रहा है तो भी रेलगाड़ीके सम्बन्धसे वह अपनेको चलनेवाला मान लेता है और कहता है कि ‘मैं जा रहा हूँ ।’ ऐसे ही स्वयं जब क्रियाशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानने लगता है, तब वह कर्ता न होते हुए भी अपनेको कर्ता मान लेता है । अपनेको कर्ता माननेसे वह प्रकृतिकी जिस क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है, वह क्रिया उसके लिये फलजनक ‘कर्म’ बन जाती है । कर्मसे बन्धन होता है‒‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ (संन्यासोपनिषद् २ । ९८, महा शान्ति २४१ । ७) ।


कर्म करना और कर्म न करना‒ये दोनों ही प्रकृतिके राज्यमें हैं । अतः प्रकृतिका सम्बन्ध होनेपर चलने, बोलने, देखने, सुनने आदिकी तरह बैठना, खड़ा होना, मौन होना, सोना, मूर्छित होना, श्रवण-मनन-निदिध्यासन करना, ध्यान करना, समाधि लगाना आदि क्रियाएँ भी ‘कर्म’ ही हैं । इसलिये भगवान्‌ने शरीर, वाणी और मनसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंको ‘कर्म’ माना है‒‘शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।’ (गीता १८ । १५) तथा शरीर, वाणी और मनकी शुद्धिके लिये शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया है (१७ । १४‒१६) । इसी तरह गीतामें चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन यज्ञोंका वर्णन आया है तथा वेदोंमें जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उन सबको कर्मजन्य माना गया है‒‘कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्’ (४ । ३२)

|