।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.२०७३, शुक्रवार
महाशिवरात्रि
दिनचर्या और आयुश्चर्या


(गत ब्लॉगसे आगेका)

पहली पूँजी ‘धन-धान्य’ पर विचार किया जाय तो उपार्जन अधिक करना तो चल जायगा, पर उपार्जनकी अपेक्षा अधिक खर्चा करनेसे काम नहीं चलेगा । इसलिये आहार-विहारमें छः घण्टे न लगाकर चार घण्टेसे ही काम चला ले और खेती, व्यापार आदिमें आठ घण्टे लगा दे । तात्पर्य है कि आहार-विहारका समय कम करके जीविका-सम्बन्धी कार्योंमें अधिक समय लगा दे ।

दूसरी पूँजी ‘आयु’ पर विचार किया जाय तो सोनेमें आयु व्यर्थ खर्च होती है । अतः सोनेमें छः घण्टे न लगाकर चार घण्टेसे ही काम चला ले और भजन-ध्यान आदिमें आठ घण्टे लगा दे । तात्पर्य है कि जितना कम सोनेसे काम चल जाय, उतना चला ले और नींदका बचा हुआ समय भगवान्‌के भजन-ध्यान आदिमें लगा दे । इस उपार्जन (साधन-भजन)-की मात्रा तो दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही रहनी चाहिये; क्योंकि हम यहाँ सांसारिक धन-वैभव आदि कमानेके लिये नहीं आये हैं, प्रत्युत परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये ही आये हैं । इसलिये दूसरे समयमेंसे जितना समय निकाल सकें, उतना समय निकालकर अधिक-से-अधिक भजन- ध्यान करना चाहिये ।

दूसरी बात, जीविका-सम्बन्धी कर्म करते समय भी भगवान्‌को याद रखे और सोते समय भी भगवान्‌को याद रखे । सोते समय यह समझे कि अबतक चलते-फिरते, बैठकर भजन किया है, अब लेटकर भजन करना है । लेटकर भजन करते-करते नींद आ जाय तो आ जाय, पर नींदके लिये नींद नहीं लेनी है । इस प्रकार लेटकर भगवत्स्मरण करनेका समय पूरा हो जाय तो फिर उठकर भजन-ध्यान, सत्संग-स्वाध्याय करे और भगवत्स्मरण करते हुए ही काम-धंधेमें लग जाय, तो सब-का-सब काम-धंधा भजन हो जायगा ।


यह मनुष्यजन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है । इसमें जो कुछ है, वह सब साधन-सामग्री है । अतः मनुष्य जो कुछ करे, वह सब उपार्जन-ही-उपार्जन होना चाहिये । परमात्मप्राप्तिका लक्ष्य रखकर कार्य करनेसे, परमात्माकी प्रसन्नताके लिये ही लौकिक-पारलौकिक कार्य करनेसे हमारा उद्धार तो होता ही है, भगवान्‌की कमीकी भी पूर्ति होती है ! जैसे, कैकेयी जबतक जीती रही, तबतक भरतजीने उसको ‘माँ’ नहीं कहा । कारण कि भरतजीके मनमें यह बात रही कि जिसने अपने प्यारे पुत्रको वनवासमें भेज दिया, वह माँ कैसे ? कैकेयीके मनमें यह बात रही कि भरतलाल मुझे माँ कह दे । यह कमी (घाटा) कैकेयीकी ही रही । ऐसे ही किसी वक्ताके श्रोता दूसरी जगह सुनने चले जायँ तो यह कमी उस  वक्ताकी ही रही । इसी तरह हम किसी वस्तु-व्यक्तिपर श्रद्धा-विश्वास करते हैं तो उतने श्रद्धा-विश्वास भगवान्‌के प्रति ही कम हुए । यदि हम संसारपर श्रद्धा-विश्वास नहीं करते तो वह श्रद्धा-विश्वास भगवान्‌पर ही होता । इसलिये भगवान्‌की कमीकी पूर्तिके लिये ही हमें भगवान्‌पर श्रद्धा-विश्वास करने चाहिये ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सन्त-समागम’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
फाल्गुन कृष्ण द्वादशी, वि.सं.२०७३, गुरुवार
दिनचर्या और आयुश्चर्या


दिनचर्या
ध्यानयोग, हठयोग, कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, अष्टांगयोग, लययोग आदि सभी योगोंकी सिद्धिके लिये दिनचर्याकी बात भगवान्‌ने गीतामें बहुत बढ़िया कही है‒

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति  न चैकान्तमनश्नत ।
न चाति स्वणशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
युक्ताहारविहारस्य    युक्तचेष्टस्य     कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य   योगो भवति दुःखहा ॥
                                             (गीता ६ । १६-१७)

‘हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है ।’

‘दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है ।’

भोजन इतनी मात्रामें करे, जिससे पेट याद न आये । पेट दो कारणोंसे याद आता है‒ज्यादा खानेसे और भूखा रहनेसे । अतः जितनी भूख हो, उससे आधा पेट भोजन करे । पेटका पाव हिस्सा जल पीनेके लिये और पाव हिस्सा श्वास ठीक तरहसे आनेके लिये खाली रखे । अगर मनुष्य भूखसे ज्यादा खा लेगा तो योग-साधन होना दूर रहा, घरका काम-धंधा भी नहीं होगा । पेट भारी होनेसे वह आलस्यमें, नींदमें पड़ा रहेगा । अतः नियमित भोजन करना बहुत आवश्यक है । घूमना-फिरना, आसन-व्यायाम आदि भी यथायोग्य हो, जिससे स्वास्थ्य-निर्माण ठीक तरहसे हो, मनुष्य जीविका-संबंधी जो काम-धंधा करता है, वह भी यथायोग्य हो तथा नींद लेना और जगना भी नियमित हो ।

हमारे पास चौबीस घण्टे हैं और हमारे सामने चार काम हैं । चौबीस घण्टोंको चारका भाग देनेसे प्रत्येक कामके लिये छः-छः घण्टे मिल जाते हैं; जैसे‒(१) आहार-विहार अर्थात् भोजन करना और घूमना-फिरना‒इन शारीरिक आवश्यक कार्योंके लिये छः घण्टे, (२) कर्म अर्थात् खेती, व्यापार, नौकरी आदि जीविका-सम्बन्धी कार्योंके लिये छः घण्टे, (३) सोनेके लिये छः घण्टे और (४) जागने अर्थात् भगवत्प्राप्तिके लिये जप, ध्यान, साधन-भजन, कथा-कीर्तन आदिके लिये छः घण्टे ।

इन चार बातोंके भी दो-दो बातोंके दो विभाग हैं‒एक विभाग ‘उपार्जन’ अर्थात् कमानेका है और दूसरा विभाग ‘व्यय’ अर्थात् खर्चेका है । यथायोग्य कर्म और यथायोग्य जगना‒ये दो बातें उपार्जनकी हैं । यथायोग्य आहार-विहार और यथायोग्य सोना‒ये दो बातें व्ययकी हैं । उपार्जन और व्यय‒इन दो विभागोंके लिये हमारे पास दो प्रकारकी पूँजी है‒(१) सांसारिक धन-धान्य और (२) आयु ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सन्त-समागम’ पुस्तकसे

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
फाल्गुन कृष्ण एकादशी, वि.सं.२०७३, बुधवार
वरूथिनी एकादशी-व्रत
सर्वश्रेष्ठ हिन्दूधर्म और उसके ह्रासका कारण


(गत ब्लॉगसे आगेका)

गीतामें आसुरी मनुष्योंके लिये आया है‒

कामोपभोगपरमा एतावदितिनिश्चिताः ॥ (१६ । ११)

‘आसुरी सम्पदावाले मनुष्य पदार्थोंका संग्रह और उनका भोग करनेमें ही लगे रहते हैं और ‘जो कुछ है, वह इतना ही है’ऐसा निश्चय करनेवाले होते हैं ।’

आजकल ऐसे ही आसुरी लोगोंकी प्रधानता हो रही है ! उनका यह भाव रहता है कि देशका चाहे नाश हो जाय, पर हम सुख भोग लें और संग्रह कर लें । वे लोग अपने सुखके लिये अपनी सन्तानका भी नाश कर देते हैं । उनकी केवल वर्तमानके सुखपर ही दृष्टि है, भविष्यमें भले ही दुःख पाना पड़े ! परलोकमें कितना भयंकर दुःख पाना पड़ेगा, इसका तो कहना ही क्या है, इस लोकमें कितना दुःख भोगना पड़ेगा, इसकी भी परवाह नहीं है । जिसका मरना निश्चित है, उसके भरोसे सन्तति-निरोध करा लेते हैं, कितनी बेसमझीकी बात है ! अभी एक-दो सन्तान है, वह अगर मर जाय तो क्या दशा होगी‒इस तरफ खयाल ही नहीं है ।

परिवार-नियोजन-कार्यक्रमसे लोगोंका चरित्र भ्रष्ट हो रहा है । सन्तति-निरोधके कृत्रिम उपायोंका प्रचार होनेसे समाजमें व्यभिचारकी वृद्धि हो रही है । कुँआरी लड़कियों और विधवाओंको भी गर्भ रोकने अथवा गिरानेका उपाय मिलनेसे उनका भी पतन हो रहा है । अगर सरकार परिवार-नियोजन करवाना ही चाहती है तो उसे लोगोंको भोगासक्तिके लिये प्रोत्साहित न करके संयम रखने, ब्रह्मचर्यका पालन करनेके लिये प्रोत्साहित करना चाहिये । लोगोंमें पहलेसे ही भोगासक्तिकी आग लगी हुई है, फिर नसबन्दी, निरोध आदि कृत्रिम उपायोंके प्रचारसे उस आगमें और घी डालना कहाँतक उचित है ? अगर संयम, ब्रह्मचर्य आदिका प्रचार किया जाय तो लोगोंका स्वास्थ्य भी सुधरेगा, वे भोगी, प्रमादी, चरित्रहीन, अकर्मण्य न बनकर सच्चरित्र और परिश्रमी बनेंगे, जिससे देश भीतरसे खोखला न होकर मजबूत बनेगा । विचार करें, चरित्र मूल्यवान् है या पैसा ? अनेक लोगोंने धर्मकी रक्षाके लिये प्राणोंका भी त्याग कर दिया तो धर्म मूल्यवान् हुआ या शरीर ?[*]  अँग्रेजीकी एक प्रसिद्ध कहावत है‒‘धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया, चरित्र गया तो सब कुछ गया ।’ चरित्र-नाशसे बढ़कर देशका और पतन क्या होगा ?

नारायण !     नारायण !!     नारायण !!!

‒‘आवश्यक चेतावनी’ पुस्तकसे



[*]  न जातु कामान्न भयान्न  लोभाद्‌धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ।
     नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः ॥
                                                (महाभारत, स्वर्गा ५ । ६३)

‘कामनासे, धनसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी अपने धर्मका त्याग न करे; क्योंकि धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य हैं । इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु (राग) अनित्य है ।’

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
फाल्गुन कृष्ण दशमी, वि.सं.२०७३, मंगलवार
एकादशी-व्रत कल है
सर्वश्रेष्ठ हिन्दूधर्म और उसके ह्रासका कारण


(गत ब्लॉगसे आगेका)

कृत्रिम सन्तति-निरोधसे हानि

सब दृष्टियोंसे प्राणी-पदार्थोंके उत्पादन, वृद्धि और संरक्षणमें लाभ-ही-लाभ है और उनके ह्रास अथवा नाशमें हानि-ही-हानि है । किसी भी प्राणी और पदार्थका ह्रास अथवा नाश समष्टि शक्ति (ईश्वर अथवा प्रकृति) के अधीन है, व्यष्टि मनुष्यके अधीन नहीं है । ईश्वर अथवा प्रकृतिके विधानमें हस्तक्षेप करना मनुष्यकी अनधिकार चेष्टा है, जिसका परिणाम भयंकर विनाशकारी होगा ।

पालतू पशुओंमें कुत्ता, बिल्ली, घोड़ा, गधा, ऊँट और जंगली पशुओंमें सियार, लोमड़ी आदि असंख्य जातिके पशु हैं, जो परिवार-नियोजन नहीं करते । कुत्ते, बिल्ली, सूअर आदिके एक-एक बारमें अनेक बच्चे होते हैं । परन्तु  परिवार-नियोजन न करनेसे क्या उनकी संख्या बढ़ गयी ? क्या उन्होंने बहुत-सी जगह रोक ली ? फिर उनकी संख्याका नियन्त्रण कौन करता है ? जो उनकी संख्याका नियन्त्रण करता है, वही मनुष्योंकी संख्याका भी नियन्त्रण करता है ।

भोग-भोगनेसे और ऑपरेशनसे, कृत्रिम गर्भपातसे शरीर स्वाभाविक कमजोर होता है तथा आयुका ह्रास है । अतः जल्दी मरनेके दो रामबाण उपाय हैं‒भोग-भोगना और ऑपरेशन (नसबंदी आदि), गर्भपात करवाना । आश्चर्यकी बात है कि मरना तो चाहते नहीं, पर उद्योग मरनेका ही कर रहे हैं ! घरमें आग लगाकर हर्षित होते हैं कि अहा ! कितना बढ़िया प्रकाश रहा है कि हाथकी एक-एक रेखा साफ दीख रही ! जब परिणाम सामने आयेगा, तब होश होगा !

मनुष्यको अपना शरीर और रुपये‒दोनों बहुत प्यारे हैं और इनको वह बहुत महत्त्व देता है । गर्भपात करवानेसे शरीर भले ही कमजोर हो जाय और रुपये भले ही खर्च हो जाये फिर भी गर्भपातरूपी महान् करते हैं‒यह कितने पतनका चिह्न है ! मनुष्य रुपये पैदा करता है, रुपये मनुष्यको पैदा नहीं करते । उन रुपयोंको खर्च करके उनके उत्पादक (मनुष्य) का नाश कर देना कितनी बेसमझी है !

गर्भ-स्थापन कर सकनेके सिवाय कोई पुरुषत्व नहीं है और गर्भ-धारण कर सकनेके सिवाय कोई स्त्रीत्व तहीं है । पुरुषत्वके बिना पुरुष और स्त्रीत्वके बिना स्त्री निस्तत्त्व, निःसार है । पुरुष और स्त्रीमें जो तत्त्व, सार है, उसीको वर्तमानमें नष्ट कर रहे हैं ! अगर पुरुषमें (पुरुषत्व न रहे और स्त्रीमें स्त्रीत्व न रहे तो वे मात्र भोगी ही रहे, मनुष्य रहे ही नहीं । पुरुष भोगी बनकर लम्पट हो गया और स्त्री भोग्या बनकर वेश्या हो गयी ! पुरुष पिता न बनकर लम्पट बन जाय और स्त्री माता न बनकर वेश्या बन जाय‒इससे अधिक पतन और क्या हो सकता है ? मनुष्य यदि मनुष्यको पैदा न कर सके तो वह मनुष्य क्या रहा, एक नाटकीय जीव हो गया । उससे तो पशु अच्छे हैं, जो पशुओंको पैदा तो कर सकते हैं !
  
  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘आवश्यक चेतावनी’ पुस्तकसे

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