।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी, मंगलवार
  मोक्षदा एकादशी-व्रत (सबका), श्रीगीता-जयन्ती
नाम-महिमा



हमने एक सन्तकी बात सुनी है । इससे पहले जमानेमें सेकेंड क्लासका रिजर्व होता था । एक सन्तको कहीं जाना था तो गृहस्थ भाइयोंने उनको सेकेंड क्लासमें बैठा दिया । एक सीटपर वे बैठ गये । उनके सामने एक मुसलमान बैठा हुआ था । उसका जब नमाजका समय हुआ तो वह अपना अँगोछा बिछाकर नमाज पढ़ने लगा तो सामने सीटपर बैठे हुए सन्त उठकर खड़े हो गये । जबतक वह नमाज पड़ता रहा, तबतक बाबाजी खड़े रहे और जब वह मुसलमान बैठ गया, तब बाबाजी भी बैठ गये । मुसलमानने पूछा ‒‘महाराज ! आप खड़े क्यों हुए ? तो बाबाजीने मुसलमानसे पूछा‒‘तुम खड़े क्यों हुए ? मुसलमानने कहा‒‘मैं परवरदिगारकी बन्दगीमें था ।’ तो सन्तने कहा‒‘मैं तुम्हारी बन्दगीमें था ।’ जिस वक्त कोई प्रभुको याद करता है, उस समय उस मनुष्यको मामूली नहीं समझना चाहिये; क्योंकि वह उस समय भगवान्‌के साथ है ! तुम उस प्रभुको याद कर रहे थे तो मैं तुम्हारी हाजिरीमें खड़ा था ।

कोई जब भगवान्‌से प्रार्थना करता है, भगवान्‌का भजन करता है तो मनुष्य चाहे किसी भाषामें प्रार्थना करे; क्योंकि अपनी-अपनी भाषामें अपने-अपने इष्टका नाम अलग-अलग है । परमात्मा तो एक ही है । उसके साथ जिसका सम्बन्ध जुड़ा है तो क्या वह साधारण मनुष्य है ? जैसे, दूसरे मनुष्य होते हैं, वैसे ही वह रहा ? नहीं ।

जैसे, लोगोंमें यह देखा जाता है कि राजकीय कोई बड़ा अधिकारी होता है तो लोगोंपर उसका असर पड़ता है कि ये बड़े अफसर आ गये, ये बड़े मिनिस्टर आ गये । ऐसे ही जो भगवान्‌में लगे हैं, वे बड़े राजाके हैं, जिससे बड़ा कोई है ही नहीं‒‘न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥’ (गीता ११ । ४३) वह उस भगवान्‌का प्यारा है जिसके लिये स्वयं भगवान् कहते हैं‒‘भगत मेरे मुकुटमणि ।’ भगवान् स्वयं जिनके लिये इतना आदर देते हैं, उस सन्तके अगर हमको दर्शन हो जायँ तो कितना अहोभाग्य है हमारा ! परन्तु मनुष्य उसको पहचानता नहीं । सन्तोंका पता नहीं लगता । सच्ची बात है । सन्तोंका क्या पता लगे ?

महाराज, क्या बतावें ? विचित्र, विलक्षण-विलक्षण सन्त होते हैं और साधारण व्यक्ति-जैसे पड़े रहते हैं । पता ही नहीं लगता उनका कि ये क्या हैं; क्योंकि बाहरसे तो वे मामूली दीखते हैं‒

सन्तोंकी गत रामदास जगसे लखी न जाय ।
बाहर तो संसार-सा   भीतर  उलटा  थाय ॥


‘ऐसे निराले सेठको वैसा ही बिरला जानता’ वह इतना मालदार है, उसको तो वैसा ही कोई बिरला जानता है, हर एक नहीं जानता । हर एकको उनकी पहचान नहीं होती । इस प्रकार सज्जनो ! जो नाम हम सबके लिये सुलभ हैं, ‘सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू । लोक लाहु परलोक निबाहू ॥’ सुमिरन करनेमें सबको सुलभ है, चाहे वह किसी वर्णका हो, किसी जातिका हो, किसी आश्रमका हो, किसी देशका हो, किसी वेशमें हो, कोई भी क्यों न हो । वह भी अगर भगवान्‌के नाममें लग जाय तो नाम सभीको सुख देनेवाला है‒‘सुखद सब काहू’ ‘लोक लाहु परलोक निबाहू’ लोक-परलोकमें लाभ देनेवाला है, सब तरहसे निर्वाह करानेवाला है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी, वि.सं.–२०७५, सोमवार
                    एकादशी-व्रत कल है
नाम-महिमा



अतः यह बाई वहाँ चली जाये तो कुछ सत्संग हो जाय । बेचारी फूली बाईका ऊँचा-ऊँचा तो वह घाघरिया, अपना वह ग्रामीण वेश था । वह वैसे ही रनिवासमें चली गयी । उसको देखकर सब रानियाँ हँस पड़ी कि क्या तमाशा आयी है । तो फूली बाई अपनी सीधी-सादी भाषामें बोली‒

ए गहणो गांठो तन की शोभा, काया काचो भांडो ।
फूली  कहे  थे  बैठी  कँई   राम   भजो   ए   रांडो ॥

ये सुन्दर गहने पहन करके थे (तुम) बैठी हो, ‘राम-राम ' क्यों नहीं करो । क्या करोगी ? ‘काया काचो भांडो’, न जाने कब फूट जाय । ऐसेमें बैठकर थे भजन नहीं करो तो थे क्या करो राँडो, बैठी ‘राम-राम’ करो न ? फूली बाईको यह संकोच नहीं है कि मैं कैसे बोलती हूँ ? क्या कहती हूँ ? उसकी तो यह सीधी-सादी वाणी है । वह भगवान्‌के भजनमें रात-दिन लगी हुई है तो उसको याद करनेसे शान्ति मिलती है । महाराज ! हृदयका पाप दूर हो जाय याद करनेसे ।

कारण क्या है ? भगवान्‌का नाम लिया है । भगवान्‌के चरणोंकी शरण हो गयी है ।

बड़ सेयां बड़ होत है ज्यूं बामन भुज दण्ड ।
तुलसी बड़े प्रताप ते  दण्ड गयउ ब्रह्माण्ड ॥


वामनभगवान् छोटे-से बनकर बलिसे पृथ्वी माँगने गये और कहे‒‘मैं तो मेरे पैरोंसे तीन कदम पृथ्वी लूँगा ।’ बलि कहता है‒‘अरे ब्राह्मण ! मेरे पास आ करके थोड़ा क्या लेता है ? और ले ले ।’ वामनभगवान्‌ने कहा‒ ‘ना, मैं तीन कदम ही लूँगा ।’ अब वे तीन कदम नापने लगे महाराज ! तो सबसे बड़ा लम्बा अवतार हुआ यह ! ब्रह्मचारीके हाथमें दण्ड होता है पलाशका । वामन भगवान् जितने ऊँचे थे, तो उनका दण्ड भी उतना ही ऊँचा था । बड़ी-से-बड़ी लाठी कानतक होती है । अब वह इतनी छोटी लाठी हाथमें हो और स्वयं इतने बड़े हो गये कि वह दण्ड तो वामनभगवान्‌के दाँत कुचरनेमें भी काम नहीं आता । इतने छोटे घोचेका क्या करेंगे ? तो कहते हैं ‘सन्तदास लकड़ी बढ़ी  बिन कूंपल बिन पात ।’ न कोंपल निकली, न पत्ता निकला और लकड़ी बढ़ गयी । क्यों बढ़ गयी । ‘बड़ सेयां बड़ होत है’ वह थी सूखी लकड़ी ही, पर हाथमें किसके थी ? ऐसे ही सज्जनो ! आप और हम हैं साधारण; परन्तु भगवान्‌के चरणोंमें लग जायँ, नाममें लग जायँ भगवान्‌के चिन्तनमें लग जायँ तो गुजराती भाषामें एक पद आता है‒‘छोटा सहुथी, सहुथी मोटा थाय, थाय छे हरि भजन करे ।’ (છોટા સહુથી, સહુથી મોટા થાય, થાય છે હરિ ભજન કરે.) भगवान्‌का भजन करनेवाला ‘छोटा सहुथी’ सबसे छोटा ‘सहुथी मोटा थाय छे’, सबसे बड़ा हो जाता है; क्यों हो जाता है ? उसने भगवान्‌का सहारा ले लिया है । भगवान्‌का नाम ले लिया है । भगवान्‌में लग गया है । इस वास्ते वह छोटा नहीं है, साधारण नहीं है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी, वि.सं.–२०७५, रविवार
नाम-महिमा



भागवतके एकादश स्कन्धमें नव योगेश्वरोंके प्रसंगमें आता है कि कोई भक्तसे कहे कि आधे क्षणके लिये भी तू भगवान्‌की स्मृति छोड़ दे तो तेरेको त्रिलोकीका राज्य दे देंगे तो वह कहता है‒तेरे किसी वैभवके लिये भी आधे क्षणके लिये मैं भगवान्‌को छोड़ नहीं सकता । उसके सामने वैभव कुछ नहीं है । यह है क्या चीज ? यह तो क्षणभंगुर है और भगवान् हैं निरन्तर रहनेवाले । इस वास्ते किसी लोभमें आकर भी वह भगवान्‌के नामको कैसे छोड़ सकता है । अगर नाम छूट जाता है तो नामकी कीमत नहीं समझी है । नामका महत्त्व उसके ध्यानमें नहीं आया । तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्‌की भूल होती नहीं । भूल कैसे हो ? ‘भूले नाय बने दयानिधि भूले नाय बने ।’ भूले बनता नहीं । कैसे भूल जाय, भूल सकता नहीं ।

जिसको यह रस लग गया तो लग ही गया । जैसे, मक्खी हर एक जगह बैठ जाती है और उड़ जाती है । मक्खी पहले तो अंगारपर बैठती ही नहीं और कभी बैठ जाय तो फिर उठती नहीं कभी । फिर धुआँ ही उठेगा, वह नहीं उठेगी । ऐसे ही यह मन जबतक भगवान्‌में, भगवान्‌के नाममें नहीं लगा है, तबतक यह जगह-जगह भटकता रहता है, परन्तु जब यह भगवान्‌में लग जायगा तो फिर जय रामजीकी....! फिर तो बस, खतम ! फिर उठ नहीं सकता । जबतक मन उठता है, तबतक मन नहीं लगा है, भजन नहीं हुआ है । लोग कहते हैं‒‘हमने बहुत भजन किया, नाम-जप किया ।’ बहुत किया क्या ? अभी नाम शुरू ही नहीं हुआ । असली भजन शुरू नहीं हुआ है । शुरू होनेपर छूट जाय, यह आपके हाथकी बात नहीं । आप विचार करो, मरनेके बाद हड्डियोंमें भगवान्‌का नाम आता है तो नाम कैसे छूट सकता है ।

मारवाड़में एक फूली बाई जाटणी हुई है । वह भगवान्‌का नाम लेती थी । उसका काम था थेपड़ी थापनेका । वह गोबरकी थेपड़ी थापती थी । किसीने उसकी थेपड़ी ले ली तो वह उसके यहाँ गयी और कही‒तूने मेरी थेपड़ी ले ली । उसने कहा‒मैंने नहीं ली । अगर मैंने ली है तो उसकी क्या पहचान है तेरे पास ? फूली बाईने कहा‒थेपड़ी लगाओ कानसे । उसने कानसे लगाया तो उसमें ‘राम-राम-राम’ की ध्वनि निकल रही थी । थेपड़ीमें नाम-जप हो रहा था । उसने आश्रर्यसे कहा‒इसमें तो ‘राम-राम-राम’ हो रहा है । फूली बाईने कहा‒यही तो है हमारी पहचान ! ऐसी थी फूली बाई ! तो जो सच्चे हृदयसे नाम ले, उसकी कितनी महिमा है ।


‘यह डोकरी (बुढ़िया) भगवान्‌की भक्ता है’ऐसा सुन करके एक बार जोधपुर दरबार वहाँ चले गये, जहाँ फूली बाई रहती थी । वहाँ जाकर देखा तो अपने प्रत्येक फौजीके सामने फूली बाई खड़ी है और फौजीको वही बाजरेका सोगरा, गँवार फलियोंका साग भोजन करा रही है । यह देखकर राजा बड़े खुश हुए और उसको बुलाकर रनिवासमें इस वास्ते भेजा कि रानियोंको सत्संग नहीं मिलता ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
मार्गशीर्ष शुक्ल अष्टमी, वि.सं.–२०७५, शनिवार
नाम-महिमा



तुलसी पूरब पाप तें हरि चर्चा न सुहाय ।
कै ऊँघे कै उठ चले  कै  दे  बात  चलाय ॥

सत्संगमें जायगा तो नींद आ जायगी, दूसरी बात कहना शुरू कर देगा अथवा बैठकर चल देगा; परन्तु यदि वह कुछ दिन सत्संगमें ठहर जाय तो उसके भी सत्संग लग जायगा । वह भी भजन करने लग जायगा । फिर वह सत्संग छोड़ेगा नहीं ।

एक बात मैंने सुनी है । एक आदमी यों ही हँसी-दिल्लगी उड़ानेवाला था । वह दिल्लगीमें ही कहता है कि ये देखो ये साधु ! ‘राम, राम, राम, राम, राम’ करते हैं तो दूसरे लोग कहते हैं‒हाँ भाई ! कैसे करते हैं ? तो वह फिर कहता है‒‘राम-राम-राम’ ऐसे करते हैं । वह उठकर कहीं भी जाता तो लोग कहते हैं‒हाँ बताओ, कैसे करते हैं ? तो वह फिर कहता ‘राम-राम-राम’ ऐसे करते हैं । ऐसे कहते-कहते महाराज, उसकी लौ लग गयी । वह नाम जपने लगा । इस वास्ते‒‘भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥’ किसी तरहसे आप नाम ले तो लो । फिर देखो, इसकी विलक्षणता, अलौकिकता । परन्तु सज्जनो ! बिना लिये इसका पता नहीं लगता । जैसे मिठाई जबतक मुखसे बाहर रहे, तबतक उसके मिठासको नहीं जान सकते । मिठाई खानेवाला ही मिठाईके रसको जानता है ।

शास्त्रोंसे, सन्तोंसे नाम-महिमा सुन करके हम नाममें यत्किंचित् कर सकते हैं । परन्तु उसका असली रस तब आयेगा, जब आप स्वयं लग जाओगे, और लग जाओगे भीतरसे, हृदयसे; दिखावटीपनसे नहीं अर्थात् लोगोंको दिखानेके लिये नहीं । लोगोंको दिखानेके लिये भजन करता है, वह तो लोगोंका भक्त है, भगवान्‌का नहीं । लोग मेरेको भजनानन्दी समझें, इस वास्ते दिखाता है तो वह भगवान्‌का भक्त कहाँ ? भगवान्‌का भक्त होगा तो वह भीतरसे कैसे नाम छोड़ सकेगा । एकान्तमें अथवा जन-समुदायमें, वह नामको कैसे छोड़ सकता है ? असली लोभको वह कैसे छोड़ सकता है ? आपके सामने पैसे आ जायँ रुपये आ जायँ अथवा आपके सामने पड़े हों तो छोड़ सकते हो क्या ? कैसे छोड़ सकते हैं ? ले लोगे ! कूड़े-करकटमें पड़े हुएको भी चट उठा लोगे तो जो नामका प्रेमी है, वह नाम छोड़ देगा, यह कैसे हो सकता है ? वह एक क्षणभर भी नामका वियोग कैसे सह सकता है ?


नारदजी महाराजने भक्ति-सूत्रमें लिखा है‒‘तदर्पिताखिलाचारिता तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति ।’ अपना सब कुछ भगवान्‌के अर्पण तो कर देता है, पर भगवान्‌की, उनके नामकी थोड़ी-सी भूल हो जाय तो वह व्याकुल हो जाता है । जैसे, मछलीको जलसे दूर करनेपर वह छटपटाने लगती है और कुछ देर रखो, तो वह मर जाय, वह आरामसे नहीं रह सकती । ऐसे ही ‘तद्विस्मरणे परमव्याकुलतेति’ नामकी‒भगवान्‌की विस्मृति होनेपर परम व्याकुलता हो जायगी । उसको छोड़ नहीं सकते । भगवान्‌की स्मृतिका त्याग नहीं कर सकते ।

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