।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आश्विन शुक्ल अष्टमी, वि.सं.–२०७५, बुधवार
            श्रीदुर्गाष्टमीव्रत, श्रीदुर्गानवमीव्रत
        करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन
और करणरहित साध्य



६. कर्तापन-भोक्तापनका निषेध

मात्र क्रियाएँ प्रकृतिमें ही होती हैं । प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है । वह किसी भी अवस्था (सर्ग-प्रलय, महासर्ग-महाप्रलय) में क्षणमात्र भी अक्रिय नहीं रहती । प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाको भगवान्‌ने गीतामें अनेक प्रकारसे बताया है; जैसे‒सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं (१३ । २९); सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंके द्वारा होती हैं; अतः गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं (३ । २७-२८, १४ । २३); गुणोंके सिवाय अन्य कोई कर्ता है ही नहीं (१४ । १९); इन्द्रियाँ ही इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं (५ । ९); स्वभाव ही बरत रहा है (५ । १४); सम्पूर्ण कर्मोंकी सिद्धिमें पाँच हेतु हैं‒अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव (१८ । १३-१४) । इस प्रकार क्रियाओंको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें, चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंसे होनेवाली कहें, चाहे इन्द्रियोंसे होनेवाली कहें, वास्तवमें एक ही बात है । एक ही बातको अलग-अलग प्रकारसे कहनेका तात्पर्य यह है कि स्वयं (चेतन) किसी भी क्रियाका किंचिन्मात्र भी कर्ता नहीं है । जैसे प्रकृति कभी अक्रिय रहती ही नहीं, ऐसे ही स्वयंमें कभी क्रिया होती ही नहीं । परन्तु जब स्वयं प्रकृतिके अंश अहम्‌के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् अहम्‌को अपना स्वरूप मान लेता है, तब वह स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीरमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मानने लगता है‒‘अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते’ (गीता ३ । २७) । जैसे कोई मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीमें बैठा है, चल नहीं रहा है तो भी रेलगाड़ीके सम्बन्धसे वह अपनेको चलनेवाला मान लेता है और कहता है कि ‘मैं जा रहा हूँ ।’ ऐसे ही स्वयं जब क्रियाशील प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानने लगता है, तब वह कर्ता न होते हुए भी अपनेको कर्ता मान लेता है । अपनेको कर्ता माननेसे वह प्रकृतिकी जिस क्रियासे सम्बन्ध जोड़ता है, वह क्रिया उसके लिये फलजनक ‘कर्म’ बन जाती है । कर्मसे बन्धन होता है‒‘कर्मणा बध्यते जन्तुः’ (संन्यासोपनिषद् २ । ९८, महा शान्ति २४१ । ७) ।


कर्म करना और कर्म न करना‒ये दोनों ही प्रकृतिके राज्यमें हैं । अतः प्रकृतिका सम्बन्ध होनेपर चलने, बोलने, देखने, सुनने आदिकी तरह बैठना, खड़ा होना, मौन होना, सोना, मूर्छित होना, श्रवण-मनन-निदिध्यासन करना, ध्यान करना, समाधि लगाना आदि क्रियाएँ भी ‘कर्म’ ही हैं । इसलिये भगवान्‌ने शरीर, वाणी और मनसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंको ‘कर्म’ माना है‒‘शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।’ (गीता १८ । १५) तथा शरीर, वाणी और मनकी शुद्धिके लिये शारीरिक, वाचिक और मानसिक तपका वर्णन किया है (१७ । १४‒१६) । इसी तरह गीतामें चौथे अध्यायके चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन यज्ञोंका वर्णन आया है तथा वेदोंमें जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है, उन सबको कर्मजन्य माना गया है‒‘कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्’ (४ । ३२)

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आश्विन शुक्ल सप्तमी, वि.सं.–२०७५, मंगलवार
        करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन
और करणरहित साध्य



अतः गीताने अहम्‌को इदंतासे कहा है; जैसे‒‘एतद्यो वेत्ति’ (१३ । १) । ‘इदम्’ (यह) कभी ‘अहम्‌’ (मैं) नहीं होता; अतः अहम्‌को इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि यह अपना स्वरूप नहीं है । परन्तु जब चेतन (जीव) इस अहम्‌के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है, तब वह बँध जाता है ।

अहम्‌के सम्बन्धसे परिच्छिन्नता पैदा होती है और परिच्छिन्नतासे सम्पूर्ण भेद पैदा होते हैं । भेदोंमें मैं-मेरेका भेद मुख्य है, जिसको अहंता और ममता नामसे कहा गया है । मैं-मेरेका भेद आठ प्रकारका है‒मैं और मेरा, तू और तेरा, यह और इसका, वह और उसका । मैं, तू, यह, वह‒ये चारों अहंताके रूप हैं और मेरा, तेरा, इसका, उसका‒ये चारों ममताके रूप हैं ।

मैं, तू, यह और वह‒ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें चारों बन सकते हैं । जैसे‒राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल‒ये चार व्यक्ति हैं । राम और श्याम एक-दूसरेके सामने हैं, गोविन्द उनके पास है और गोपाल उनसे दूर है । राम अपनेको ‘मैं’ कहता है, अपने सामनेवाले श्यामको ‘तू’ कहता है, पासवाले गोविन्दको ‘यह’ कहता है और दूरवाले गोपालको ‘वह’ कहता है । अगर श्याम अपनेको ‘मैं’ कहे तो वह रामको ‘तू’ कहेगा, गोविन्दको ‘यह’ कहेगा और गोपालको ‘वह’ कहेगा । अगर गोविन्द अपनेको ‘मैं’ कहे तो वह श्यामको ‘यह’ कहेगा और रामको ‘तू’ कहेगा अथवा श्यामको ‘तू’ और रामको ‘यह’ कहेगा तथा गोपालको ‘वह’ कहेगा । अगर गोपाल अपनेको ‘मैं’ कहे तो वह राम, श्याम और गोविन्द‒तीनोंको ‘वह’ कहेगा । इस प्रकार राम, श्याम, गोविन्द और गोपाल‒ये चारों ही एक-दूसरेकी दृष्टिमें मैं, तू, यह और वह बन सकते हैं । इन चारोंमें ‘मैं’ सबसे कमजोर है । कारण कि एक व्यक्तिको हजारों-लाखों आदमी तू, यह और वह कह सकते हैं, पर ‘मैं’ अकेला वही एक व्यक्ति कह सकता है !

मैं-मेरा ही माया है, जिसके त्यागपर सबने विशेष जोर दिया है[1] । परन्तु स्वरूप मायारहित है । स्वरूपमें ‘मैं’ और ‘मेरा’‒दोनों ही नहीं हैं । वह ‘मैं’ और ‘मेरा’‒दोनोंका प्रकाशक है, आश्रय है, आधार है, अधिष्ठान है । अतः स्वतःसिद्ध विवेकके द्वारा मैं और मेराको छोड़कर उसके प्रकाशक आश्रय, आधार, अधिष्ठानमें स्थित होना (जो कि पहलेसे ही है) करणनिरपेक्ष साधन है ।



      [1] १. मैं  अरु  मोर   तोर   तैं  माया ।
                    जेहि बस कीन्हे जीव निकाया ॥
                                        (मानस ३ । १५ । २)

               २. मैं  मेरे  की  जेवरी,   गल  बँध्यो  संसार ।
                    दास कबीरा क्यों बँधे, जाके राम अधार ॥

गीतामें भी भगवान्‌ने तीनों योगोंमें अहंता-ममताका त्याग बताया है; जैसे‒कर्मयोगमें ‘निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति’ (२ । ७१), ज्ञानयोगमें ‘अहङ्कारं......विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते’ (१८ । ५३) और भक्तियोगमें ‘निर्ममो निरहङ्कार.....यो मद्भक्तः स मे प्रियः’ (१२ । १३-१४) । कर्मयोगमें निर्मम-निरहंकार होनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है, ज्ञानयोगमें निर्मम-निरहंकार होनेसे ब्रह्ममें स्थिति हो जाती है और भक्तियोगमें निर्मम-निरहंकार होनेसे परमप्रेमकी प्राप्ति हो जाती है ।

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
आश्विन शुक्ल षष्ठी, वि.सं.–२०७५, सोमवार
        करणसापेक्ष-करणनिरपेक्ष साधन
और करणरहित साध्य



दोष तो करनेसे ही आता है । हम कुछ नहीं करेंगे तो दोष कैसे आयेगा ? क्योंकि कुछ न करनेसे प्रकृतिका सम्बन्ध नहीं रहता तथा स्वतःसिद्ध निर्दोष स्वरूपमें स्वतःस्थिति हो जाती है । इसलिये भलाई करनेकी अपेक्षा बुराई न करना श्रेष्ठ है ।

तन कर मन कर वचन कर, देत न काहू दुःख ।
तुलसी पातक झरत है,  देखत   उनका   मुख ॥

मूलमें हमें असत्‌का ही त्याग करना है, सत्‌को प्राप्त नहीं करना है; क्योंकि सत् स्वतःसिद्ध प्राप्त है । असत्‌का त्याग होनेपर सत् ही शेष रहता है, असत् शेष नहीं रहता । अतः हम असत्‌का त्याग करेंगे तो सत्कर्म, सच्चर्चा, सच्चिन्तन और सत्संग स्वतः होंगे, करने नहीं पड़ेंगे ।

सत्‌से अलग कोई हो ही नहीं सकता और असत्‌के साथ कोई रह ही नहीं सकता । परन्तु जब हम सत्‌को प्राप्त करनेका उद्योग करते हैं, तब असत् (इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि) का सहारा लेना ही पड़ता है । कारण कि असत्‌की सहायताके बिना उद्योग हो ही नहीं सकता । असत्‌का सहारा रहनेपर सीमित साधन होता है । जैसे हाथसे दीवारको नहीं पकड़ सकते, ऐसे ही सीमित साधनसे असीम तत्त्वको नहीं पकड़ सकते । असत्‌का त्याग (अस्वीकृति) करनेपर सत्‌की प्राप्ति स्वत हो जाती है; क्योंकि वह स्वतःप्राप्त है । त्याग उसीका होता है, जो सदासे ही त्यक्त है और प्राप्ति उसीकी होती है, जो सदासे ही प्राप्त है‒‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः’ (गीता २ । १६)साधकका काम केवल इतना है कि वह विवेकपूर्वक असत्‌का संग न करे, असत्‌को स्वीकार न करे ।

५. अहंता-ममताका निषेध

करणनिरपेक्ष साधनमें सत्-असत्‌के विवेककी मुख्यता होनेसे अहम्‌का नाश जल्दी और सुगमतासे हो जाता है; क्योंकि अहम् भी असत् (जड) ही है । गीताने पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्‒इन आठोंको अपरा (जड) प्रकृति कहा है[1] । ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे पृथ्वी जड और जाननेमें आनेवाली है, ऐसे ही अहम् भी जड और जाननेमें आनेवाला है ।



[1] भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
    अहङ्कार इतीयं मे   भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
                                                                    (गीता ७ । ४)

पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहम्‒इन आठोंमें जातीय एकता तो है, पर स्वरूपकी एकता नहीं है अर्थात् जाति एक होनेपर भी इनका स्वरूप अलग-अलग है [ एक अनेकमें अनुगत हो तो उसको जाति कहते हैं ] । परन्तु सत्तामें स्वरूपकी एकता है । अतः सत्ता तो एक है, पर करण एक नहीं है । सत्तामें भेद सम्भव नहीं है और करणोंमें एकता सम्भव नहीं है । कुछ दार्शनिक सत्तामें (जीव तथा ईश्वरका) भेद मानते हैं और कुछ नहीं मानते । जैसे, जबतक सायुज्य मुक्ति न हो, तबतक वैष्णव दार्शनिक सत्तामें भेद मानते हैं । दार्शनिकोंमें यह मतभेद भी तभीतक है, जबतक सूक्ष्म अहम् है । अहम् न रहनेसे सब दार्शनिक एक हो जाते हैं अर्थात् अहम्‌का नाश होनेपर दार्शनिक नहीं रहते, प्रत्युत दर्शन (तत्त्व) रहता है ।

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