।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.२०७३, गुरुवार
बिन्दुमें सिन्धु



(गत ब्लॉगसे आगेका)

हमें दो बातोंपर विचार करना है‒हमें क्या चाहिये ? और हमें क्या करना है ? हमारी चार तरहकी चाहना है‒धनकी चाहना, धर्मकी चाहना, सुखभोगकी चाहना और कल्याणकी चाहना । इन चार चाहनाओंकी पूर्तिके लिये हमारे पास दो ही साधन हैं‒प्रारब्ध और पुरुषार्थ । इन दोनोंमें एक-एक साधनके द्वारा दो-दो चाहनाओंकी पूर्ति होती है । धर्म और मुक्ति‒इन दोनोंकी पूर्ति पुरुषार्थ’ से होती है, तथा धन और भोग‒इन दोनोंकी पूर्ति प्रारब्ध’ से होती है । इस विषयको ठीक तरहसे न जाननेके कारण लोग दुःख पा रहे हैं । तात्पर्य है कि धन और भोगकी प्राप्तिमें प्रारब्ध (भाग्य) मुख्य है, पुरुषार्थ (उद्योग) गौण है; और धर्मका अनुष्ठान करनेमें तथा परमात्माकी प्राप्ति करनेमें पुरुषार्थ मुख्य है, प्रारब्ध गौण है । इसलिये आप यह नियम तो लेते हैं कि रोजाना अमुक संख्यामें नामजप, पाठ आदि करके फिर भोजन करेंगे, पर यह नियम कोई नहीं लेता कि रोजाना अमुक संख्यामें रुपये कमाकर ही हम भोजन करेंगे । इससे सिद्ध हुआ कि पैसा कमानेमें उद्योग मुख्य नहीं है । इसी तरह हम तो रोजाना भोग भोगेंगे, रोजाना हलवा-पूड़ी खायेंगे, भले ही बीमार पड़ जायँ‒ऐसा नियम कोई नहीं लेता । यह अनुभवसिद्ध बात है । पैसा कमाने और भोग भोगनेमें आप स्वतन्त्र नहीं हो, पर भजन-ध्यान-सत्संग करनेमें आप स्वतन्त्र हो; क्योंकि यह नया काम है ।

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अपनेको जो वस्तु योग्यता, बल आदि मिले हैं, ये वास्तवमें हमारे नहीं हैं, और हमारे पास रहेंगे भी नहीं । ये संसारके हैं और सबकी सेवाके लिये हैं । तात्पर्य है कि हमारे पास जो वस्तु, योग्यता, बल, विद्या, अधिकार आदि हैं, वे सब दूसरोंकी सेवाके लिये हैं, हमारे लिये नहीं हैं । हमारे लिये वास्तवमें वह है, जिसके हम अंश हैं‒ईस्वर अंस जीव अबिनासी’ (मानस, उत्तर ११७ । १) । आप ये दो विभाग कर लें कि शरीर, वस्तु योग्यता आदि सब संसारके लिये हैं और भगवान् मेरे लिये हैं ।

एक बहुत मार्मिक बात है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारणशरीर परमात्मप्राप्तिमें न साधक हैं, न बाधक हैं । ये तटस्थ हैं । एक परमात्माके सिवाय संसारमें कोई चीज हमारी नहीं है । एक बड़ी पक्की, सच्ची, सिद्धान्तकी बात है कि जो चीज हमें मिलती है और बिछुड़ जाती है, सदा हमारे साथ नहीं रहती, वह हमारी नहीं होती । वह केवल सेवाके लिये है । इस बातको आप याद रखो । मेरेसे पूछो तो बहुत वर्षोंके बाद यह मार्मिक बात मुझे मिली है !


मनुष्योंमें एक धारणा बैठी हुई है कि हम तो संसारी आदमी हैं, परमात्मासे बहुत दूर हैं, और परमात्मा बहुत उद्योग करनेसे तथा समय लगानेसे मिलेंगे । वास्तवमें यह बात नहीं है । हम परमात्माके साक्षात् अंश हैं । परमात्मा हमारे हैं और हम परमात्माके हैं । वे परमात्मा पहलेसे ही सभीको मिले हुए हैं और कभी बिछुड़ेंगे नहीं । उन परमात्माको अपना मान लें । परमात्मा हमारे भीतर हैं, वे बाहर दौड़नेसे नहीं मिलते । पापी-से-पापीके हृदयमें भी परमात्मा हैं और सन्त-महात्मा, तत्वज्ञ, जीवन्मुक्त, भगवत्प्रेमी भक्तके हृदयमें भी परमात्मा हैं; और वे परमात्मा अपने हैं । वे कभी हमें छोड़ेंगे नहीं । आप कृपा करके उन्हें अपना मान लो तो निहाल हो जाओगे !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे            

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख अमावस्या, वि.सं.२०७३, बुधवार
अमावस्या
बिन्दुमें सिन्धु



(गत ब्लॉगसे आगेका)

जो गायको मारते हैं, मछलियोंको मारते हैं, अण्डा खाते हैं, मांस खाते हैं, ऐसे लोग सत्संगमें नहीं आते । सत्संग उनको सुहाता नहीं । सत्संग उनके विरुद्ध पड़ता है । अगर वे सत्संगमें आयेंगे तो उनको नींद आ जायगी ! वे सुनेंगे ही नहीं, सुन सकते ही नहीं ! एक मेरे परिचित सज्जन थे । वे मांस खाते थे । उन्होंने मेरेसे कहा कि आप हमारे यहाँ आते नहीं ! मैंने कहा कि तुम्हारे हृदयमें मरे हुए मुर्देका जितना आदर है, उतना आदर हमारा नहीं है, फिर हम क्यों आयें ? मुर्देको हाथ भी लग जाय तो कपड़ोंसहित स्नान करना चाहिये । तुम्हारी तो थालीमें मसान (श्मशान) है ! जब उनका अन्त समय आया, तब (मरते समय) उनको भगवान्‌का नाम सुनाया तो उनको गुस्सा आ गया, वे चिढ़ गये ! तात्पर्य है कि जो पाप करते हैं, उनको भगवान्‌का नाम सुहाता नहीं, वे सत्संग करते नहीं । उनका अन्तःकरण मैला हो जाता है । मैले अन्तःकरणवालेको मैली बात ही अच्छी लगती है । बांकुड़ाकी बात है । एक बंगाली नदीके किनारे बैठा मछलियाँ पकड़ रहा था । बद्रीदासजीने उससे पूछा कि इससे कितना पैसा पैदा होता है ? उसने लगभग चार आना बताया । बद्रीदासजीने उससे कहा कि उतना पैसा हम तुझे दे देंगे, तुम हमारे यहाँ बैठकर राम-राम करो । वह राम-राम नहीं कर सका और होरे-होरे’ (हरि-हरि) करने लगा । वह दो दिन आया, तीसरे दिन आया ही नहीं ! जाकर देखा तो वह पुनः मछलियाँ पकड़ रहा था ! उससे पूछा कि तू नामजप करने आया नहीं ? वह बोला कि ना बाबा, यह काम हमसे नहीं होता !

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गायको हम माता मानते हैं । अतः उसका दूध पीनेमें दोष नहीं है । गायका दूध पीयेंगे, तभी गायकी रक्षा होगी ! परन्तु उसके बछड़ा-बछड़ीको दूध न पिलाकर खुद दूध पी लेना ठीक नहीं है । यह अन्याय है ! अगर बछड़ीको गायका पर्याप्त दूध पिलाया जाय तो गाय बननेपर उसका दूध भी ज्यादा होगा । बछड़ीको कम दूध दोगे तो आगे उसका दूध ज्यादा नहीं होगा । अतः बछड़ा-बछड़ीको दूध पिलाकर ही खुद दूध पीना चाहिये । दूसरी बात, दूध दुहनेसे गायका दूध बढ़ता है । यदि दूध न दुहें, केवल बछड़ा-बछड़ी ही दूध पियें तो गायका दूध स्वतः ही कम होगा । यदि गायको ठीक खिलाया जाय और तीन समय दूध दुहा जाय तो दूध ज्यादा होगा ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे            

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख कृष्ण चतुर्दशी, वि.सं.२०७३, मंगलवार
बिन्दुमें सिन्धु



(गत ब्लॉगसे आगेका)

श्रोता‒भगवान्‌के प्रेमके अलावा भी उनकी प्राप्तिका कोई उपाय है क्या ?

स्वामीजी‒हाँ, कर्मयोग और ज्ञानयोग उपाय है । भगवान्‌में प्रेम होना भक्तियोग है ।

श्रोता‒संसारके सम्बन्धका जो प्रभाव है, वही मन है और परमात्माके सम्बन्धका जो प्रभाव है, वही साधन है‒इसे समझना चाहते हैं ।

स्वामीजी‒मन कोई तत्त्व नहीं है । प्रभाव पड़नेसे ही मन अच्छा या मन्दा होता है । प्रभाव पड़े बिना मन क्या करे ? मन न भजन करता है, न संसारका काम करता है । इसपर प्रभाव पड़ता है, तभी काम करता है । इसपर संसारका प्रभाव पड़ता है तो यह संसारकी तरफ जाता है, भगवान्‌का प्रभाव पड़ता है तो भगवान्‌की तरफ जाता है ।

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श्रोता‒यहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्यामें गोहत्या हो रही है ! आपसे प्रार्थना है कि गोरक्षाके लिये प्रेरणा करें ।

स्वामीजी‒वास्तवमें किसी भी जीवको कष्ट देना शास्त्र-निषिद्ध है । आपको कोई मारे तो आपको अच्छा लगता है क्या ? अच्छा नहीं लगता तो किसीको भी मत मारो । आपको जो बुरा लगे, वह दूसरोंके प्रति मत करो‒यह धर्मका सार है । किसी भी जीवका नाश मत करो । किसीकी भी हिंसा करना पाप है, अन्याय है । जैसे आपको प्राण प्यारे हैं, ऐसे सबको प्राण प्यारे हैं । जीवोंकी हत्या करनेसे अन्तमें दुःख पाना पड़ेगा । यहाँ बच जाओ तो यमराजके यहाँ दुःख पाना पड़ेगा ।


सब पशुओंमें गायके द्वारा दूसरोंका बहुत ज्यादा हित होता है, इसलिये उसकी हत्याका बहुत ज्यादा पाप है । गायकी तो हवा लगनेसे मनुष्य पवित्र हो जाता है ! जो बड़े-बड़े रोगी हैं, वे रोजाना जाकर सुबह और शाम दोनों समय गायको सहलायें, प्यार करें, पैर दबायें तो उनका रोग मिट जायगा, आप करके देख लो ! गायकी रक्षा करनेसे बहुत लाभ होता है । मनुष्य गायकी रक्षा करे तो वह भी मनुष्यकी रक्षा करती है । ऐसी अनेक घटनाएँ हुई हैं । इसलिये गायकों मारना बहुत बड़ा पाप है । हिंसाका परिणाम बहुत खराब होता है । आप गायोंको बचानेका उद्योग करो, नहीं तो देशकी बड़ी दुर्दशा होगी ! बड़ा भारी उपद्रव होगा ! आप गायोंकी रक्षा करो तो आपका देश सुरक्षित होगा ।

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे            

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।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
वैशाख कृष्ण त्रयोदशी, वि.सं.२०७३, सोमवार
बिन्दुमें सिन्धु



(गत ब्लॉगसे आगेका)

हरदम भगवान्‌से प्रार्थना करते रहो कि हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’ । भगवान्‌के दर्शनके बिना हरदम बेचैनी रहे, कहीं भी मन नहीं लगे, कोई बात सुहाये नहीं । भगवान्‌के सिवाय और कोई बात याद ही नहीं आये । वास्तवमें भगवान् हमारे भीतर हैं । उनको बार-बार हे मेरे नाथ ! हे मेरे प्रभो पुकारो और समझो कि भगवान् मेरे भीतर हैं; उनसे मैं कह रहा हूँ और वे सुन रहे हैं, मुझे देख रहे हैं । एक जन्मकी माँ भी पुकारनेसे आ जाती है, फिर भगवान् तो सदाकी माँ हैं ! वे जरूर आयेंगे !

भगवान्‌को प्रकट करनेके लिये, उनका प्रेम प्राप्त करनेके लिये भगवान्‌को अपना मानना बहुत जरूरी है । जैसे बालक कहता है कि माँ मेरी है, ऐसे भगवान् मेरे हैं । भगवान्‌में मेरापन प्रेमका मन्त्र है, जिससे भगवान् प्रकट हो जाते हैं । आपके भीतर यह भाव आना चाहिये कि मेरी माँ मेरेको गोदमें क्यों नहीं लेती ?

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श्रोता‒भगवान् सभीके हृदयमें विराजमान हैं, फिर भी मनुष्यके द्वारा गलत काम क्यों होता है ?

स्वामीजी‒क्या आपने भगवान्‌से प्रार्थना की है कि महाराज, मेरे द्वारा गलत काम न हो ? भगवान्‌का जबर्दस्ती करनेका स्वभाव बिल्कुल नहीं है । अच्छे सन्त-महात्मा भी बात कह देते हैं, पर जबर्दस्ती नहीं करते । हरेकको बात कहनेमें भी वे संकोच करते हैं । विशेष कृपा होती है, तब कहते हैं । भगवान्‌ने अठारह अक्षौहिणी सेनामें केवल अर्जुनको ही उपदेश दिया, दूसरोंको क्यों नहीं दिया ? चोर-डाकू जबर्दस्ती करते हैं । आपके घर साधु आयेगा तो भिक्षाके लिये आवाज दे देगा, आप नहीं बोलो तो चल देगा । परन्तु डाकूको नहीं बोलो तो क्या वह चल देगा ?


भगवान् सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहते हैं । उनके बिना कोई प्राणी-पदार्थ है ही नहीं । वे स्वतः-स्वाभाविक सबमें परिपूर्ण हैं । पर वे विधि-निषेध करनेके लिये सबमें परिपूर्ण नहीं हैं । जैसे गायके भीतर रहनेवाला घी गायके काम नहीं आता, ऐसे ही भगवान् सबमें व्यापक रहते हुए भी काम नहीं आते । प्रार्थना करनेपर वे काम आते हैं । अगर भगवान् विधि-निषेध करें तो सब शास्त्र निरर्थक हो जायँगे, गुरु निरर्थक हो जायगा, शिक्षा निरर्थक हो जायगी !

    (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे            

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