Sep
29
(गत ब्लॉगसे
आगेका)
स्वाँगके
अनुसार खेलनेके
लिये एक पुस्तक
होती है, पुस्तकोंसे यह
सिखाया जाता है
कि इतने शब्द आप
बोलें, इतने वे बोलें
। वैसे ही हमारी
पुस्तकोंमें
लिखा है कि गृहस्थको
यह करना चाहिये, पुरुषको ऐसा करना
चाहिये, स्त्रीको ऐसा
करना चाहिये, पुत्रको ऐसा करना
चाहिये । और यह
सब स्वाँग करना
है केवल जनताकी
प्रसन्नताके
लिये । सब लोग कहें‒‘गृहस्थाश्रम
बड़ा उपयोगी है
। वाह, वाह, वाह’,‒इस
प्रकार ठीक तरहसे
उसे करना है, पर वाह-वाह लेनेकी
भावनासे नहीं
करना है । केवल
अपनी आसक्ति मिटानेके
लिये, स्वाँगके
अनुसार प्रभुकी
आज्ञाका पालन
करनेके लिये; किंतु इसे
सच्चा न माने ।
इसका नाम कर्मयोग
है ।
इस तरहसे किया
जाय तो स्वत: आसक्ति
मिटती है और स्वाभाविक
ही राग मिटता है
। इसीलिये कहा
गया है‒‘धर्म ते बिरति’ धर्मका अनुष्ठान
करनेसे वैराग्य
होता ही है । धर्मको
छोड़कर आसक्तिसे
विषयोंका सेवन
करेंगे तो विषय-सेवनसे
कभी वैराग्य हो
सकता ही नहीं, सम्भव ही नहीं
। अत: उद्देश्य
वैराग्यका हो
और नियम भी वही
रहे । स्वाँगके
अनुसार कार्य
बढ़िया-से-बढ़िया
करना है, पर मानना है उसे
स्वाँग । स्वाँगमें
कमी आ जाय तो गड़बड़ी
और स्वाँगको सच्चा
माने तो
गड़बड़ी । इसलिये
पालन करनेमें
कमी आवे नहीं और
और सच्चा माने
नहीं । इससे क्या
होगा ? जैसे
स्वाँग पहनकर
पैसे कमाये जायँगे, वे भी जायँगे आपके
घरमें और स्वाँगरहित
हो आप काम करेंगे
वे पैसे भी जायँगे
आपके घरमें । ये
दोनों पैसे ही
आपके घरमें जायँगे
। वैसे ही आप एकान्तमें
बैठकर भजन-ध्यान
कर रहे हैं तो अब
स्वाँग नहीं, अब तो अपने भगवान्की
उपासना कर रहे
हैं और गृहस्थ
बनकर काम कर रहे
हैं तो यह संसारमें
स्वाँग खेल रहे
हैं । पर दोनोंका
मतलब भजनसे होगा
। इससे भगवान्के
यहाँ ही दोनोंकी
भर्ती होगी और
भजन अखण्ड होगा
। यदि भजन-ध्यान, कीर्तन-सत्संग
तो हुआ भगवान्का
भजन, उधर
और व्यवहार‒-व्यापार
हुआ हमारा काम
इधर तो यह अखण्ड
भजन नहीं होगा
। सब काम भगवान्का
हो ।
तदर्थ कर्म
कौन्तेय...............॥ (गीता
३ । १ )
मदर्थमपि
कर्माणि कुर्वन्
सिद्धिमवापस्यसि
॥
(गीता १२/१०)
भगवान्के
लिये कर्म करते
हैं, प्रभुका ही
काम करते हैं तो
भजन होगा सभी ओर
तथा जहाँ काम छूटेगा, भगवान्में
मन लगेगा । जैसे रुपयोंके
लिये व्यापार
करता है तो जहा
दूकान बंद किया
कि चट रुपयोंका
चिन्तन होता है, रुपयोंका विचार
होता है, रुपयोंकी गिनती
होती है । दूकान
बंद हो जाती है, बाजार बंद हो जाता
है, फिर भी दीपक
जलाकर बैठे हैं
। क्या करते है
? रोकड़ जोड़ते
है । अब रोकड़ क्यों
जोड़ते हो ? तो कहता है--व्यापार
किसलिये किया
था ? जिसके लिये
किया था उसीमें
वृत्ति लगती है
। इसी प्रकार गृहस्थका
काम किसलिये किया
? प्रभु-प्राप्तिके
लिये । तो जहाँ
काम छूटा कि मन
प्रभुमें लग जायगा, चट लग जायगा ।
व्यापार-कार्य
आरम्भ करो तो रुपये
कैसे पैदा हों‒यह
ध्यान रहेगा, चाहे रुपयोंकी
याद रहे या न रहे, पर रुपयोंके लिये
काम है । अत: रुपयोंकी
अखण्ड स्मृति, रुपयोंका ध्येय
अखण्ड रहेगा ।
वैसे ही यदि प्रभुके लिये
ही भजन-ध्यान है
और प्रभुके लिये
ही गृहस्थाश्रमका
काम है तो सब कार्योंमें
अखण्डपना है ।
जो यह अखण्डपना
पकड़नेवाला है
वह ‘साधक’ होता है, अखण्डपना
रखना ‘साधन’ होता है और
उससे जो अखण्डकी
प्राप्ति है वह ‘साध्य’ होती है । फिर
आपसे-आप ये सब हो
जायँगे ।
इस प्रकार
‘हम भगवान्के
है’ यह कैसे समझें
और ‘अखण्ड भजन कैसे
हो’‒इन दोनों
प्रश्रोंका उत्तर
हो गया !
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
‒
‘एकै साधे
सब सधै’
पुस्तकसे
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