Apr
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समतापूर्वक कर्तव्यकर्मोंका आचरण करना ही कर्मयोग कहलाता है । कर्मयोगमें खास निष्कामभावकी मुख्यता है । निष्कामभाव न रहनेपर कर्म केवल ‘कर्म’ होते हैं; कर्मयोग नहीं होता । शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म करनेपर भी यदि निष्कामभाव नहीं है तो उन्हें कर्म ही कहा जाता है, ऐसी क्रियाओंसे मुक्ति सम्भव नहीं; क्योंकि मुक्तिमें भावकी ही प्रधानता है । निष्कामभाव सिद्ध होनेमें राग-द्वेष ही बाधक हैं‒‘तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ’ (गीता ३ । ३४), वे इसके मार्गमें लुटेरे हैं । अतः राग-द्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये । तो फिर क्या करना चाहिये ?‒
श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
(गीता ३ । ३५)
‒इस श्लोकमें बहुत विलक्षण बातें बतायी गयी हैं । इस एक श्लोकमें चार चरण हैं । भगवान्ने इस श्लोककी रचना कैसी सुन्दर की है ! थोड़े-से शब्दोंमें कितने गम्भीर भाव भर दिये हैं । कर्मोंके विषयमें कहा है‒
‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः’
यहाँ ‘श्रेयान्’ क्यों कहा ? इसलिये कि अर्जुनने दूसरे अध्यायमें गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भीख माँगना ‘श्रेय’ कहा था‒‘श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके’ (२ । ५), किंतु ‘यच्छेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे’ (२ । ७) में अपने लिये निश्चित ‘श्रेय’ भी पूछा और तीसरे अध्यायमें भी पुनः निश्चित ‘श्रेय’ ही पूछा‒‘तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्’ (३ । २) यहाँ भी ‘निश्चित’ कहा और दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी ‘निश्चितम्’ कहा है । भाव यह है कि मेरे लिये कल्याणकारक अचूक रामबाण उपाय होना चाहिये । वहाँ अर्जुनने प्रश्न करते हुए कहा‒‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन’ (३ । १), यहाँ ‘ज्यायसी’ पद है । इस ज्यायसीका भगवान्ने ‘कर्मज्यायो ह्यकर्मणः’ (३ । ८) में ‘ज्यायः’ कहकर उत्तर दिया कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है । यहाँ भगवान्ने भीख माँगनेकी बात काट दी । तो फिर कर्म कौन-सा करे ? इसपर बतलाया कि जो स्वधर्म है, वही कर्तव्य है; उसीका आचरण करो ।अर्जुनके लिये स्वधर्म क्या है ? युद्ध करना । १८वें अध्यायके ४३वें श्लोकमें भगवान्ने क्षत्रियके जो स्वाभाविक कर्म बतलाये हैं, क्षत्रिय होनेके नाते अर्जुनके लिये वे ही कर्तव्यकर्म हैं । वहाँ भी भगवान्ने ‘श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः’‒(१८ । ४७) कहा है । स्वधर्मका नाम स्वकर्म है । यहाँ स्वकर्म है‒युद्ध करना । ‘स्वधर्मः’ के साथ ‘विगुणः’ विशेषण क्यों दिया ? अर्जुनने तीसरे अध्यायके पहले श्लोकमें युद्धरूपी कर्मको ‘घोर कर्म’ बतलाया है । इसीलिये भगवान्ने उसके उत्तरमें उसे ‘विगुणः’ बतलाकर यह व्यक्त किया कि स्वधर्म विगुण होनेपर भी कर्तव्यकर्म होनेसे श्रेष्ठ है । अतः अर्जुनके लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है; तथा दूसरे अध्यायके बत्तीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने बतलाया कि धर्मयुद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक श्रेष्ठ साधन है ही नहीं‒‘परधर्मात् स्वनुष्ठितात्’ ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘जीवनका कर्तव्य’ पुस्तकसे
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