Apr
30
।। श्रीहरिः ।।

आजकी शुभ तिथि–
वैशाख शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं.–२०७१, बुधवार
सभी कर्तव्य कर्मोंका नाम यज्ञ है



गीताजीके श्लोकोंसे तो यही बात सिद्ध होती है किसब कर्मोंका नाम यज्ञ है । कैसे सिद्ध होती है इसपर विचार किया जाता है । यज्ञोंका विशेष वर्णन आता है गीताके चौथे अध्यायमें २४वें श्लोकसे ३२वें श्लोकतक । इनका प्रकरण आरम्भ होता है चौथे अध्यायके २३वें श्लोकसे । उसमें भगवान् कहते हैं‒
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।
यज्ञायाचरतः   कर्म   समग्रं   प्रविलीयते ॥

इसमें बतलाया गया है कि यज्ञके लिये आचरित सम्पूर्ण कर्म सर्वथा विलीन हो जाते हैं । अर्थात् वे शुभाशुभ फलका उत्पादन नहीं करतेफलदायक‒बन्धनकारक नहीं होतेजन्म देनेवाले नहीं होते । कर्मोंकी प्रविलीनताका यही अर्थ है ।

इसी बातको दूसरे ढंगसे भगवान् कहते हैं तीसरे अध्यायके ९वें श्लोकमें‒
यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ।

यज्ञार्थ कर्मसे भिन्न कर्ममें लगनेपर यह लोकसमुदाय कर्मोंके बन्धनमें बँधता है ।

अर्थात् यज्ञके अतिरिक्त जो भी कर्म होते हैंवे सभी बन्धनकारक होते हैं । केवल यज्ञार्थ कर्म बन्धनकारक नहीं होते । उपर्युक्त दोनों ही स्थलोंमें यज्ञ’ शब्द आया है । चौथे अध्यायके २४वें श्लोकसे भगवान् यज्ञोंका वर्णन आरम्भ करते हैं‒
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।
ब्रह्मैव तेन   गन्तव्यं   ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

इस प्रकरणमें चौदह यज्ञोंका उल्लेख किया गया है,जिनमें प्राणायाम’ का नाम भी आया है‒
अपाने जुह्वति  प्राणं   प्राणेऽपानं  तथापरे ।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥
                                                          (४ । २९)

अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति ।
                                                (४ । ३०)

ऊपर जुह्वति’ क्रिया दी गयी हैआगे और भी क्रियाएँ बतायी गयी हैं । जैसे उसी अध्यायके २८वें श्लोकमें भगवान् कहतै हैं‒
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा    योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥

दान-पुण्य आदि जितने भी कर्म पैसोंसे या पदार्थोंसे सिद्ध होते हैंउन्हींको द्रव्ययज्ञ’ कहा गया है । इसी प्रकार जिसमें इन्द्रियोंकामनकाशरीरका संयम किया जायउस तपस्याको भी यज्ञ’ कहा गया है । यमनियमआसन,प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधि‒पातञ्जलयोगके ये आठ अंग तथा हठयोगलययोगमन्त्रयोग आदि जो अन्य योग हैंउन्हें भगवान्‌ने योगयज्ञ’ कहा है ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग’ पुस्तकसे