पुस्तकोंकी पढ़ाई करनेका, शास्त्रोंकी बातें सीखनेका उद्देश्य न हो, प्रत्युत केवल तत्त्वको समझनेका उद्देश्य हो तो हम श्रुति
विप्रतिपत्तिसे तर गये ! तात्पर्य है कि हमें न तो मोहकी मुख्यता रखनी है और न शास्त्रीय
मतभेदकी मुख्यता रखनी है । किसी मत, सम्प्रदायका भी कोई आग्रह नहीं रखना
है[1] । इतना हो जाय तो हम योगके, तत्त्वज्ञानके अधिकारी हो गये ! इससे अधिक किसी अधिकार-विशेषकी जरूरत नहीं है । अब
इस बातपर विचार करना है कि तत्त्वज्ञान क्या है ?
तत्त्वज्ञान सबसे सरल है, सबसे सुगम है और सबके प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है । तात्पर्य
है कि इसको करनेमें, समझनेमें और पानेमें कोई कठिनता है
ही नहीं । इसमें करना, समझना और पाना लागू होता ही नहीं ।
कारण कि यह नित्यप्राप्त है और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें
सदा ज्यों-का-त्यों मौजूद है । तत्त्वज्ञान जितना प्रत्यक्ष है, उतना प्रत्यक्ष यह संसार कभी नहीं है । तात्पर्य है कि हमारे अनुभवमें तत्त्वज्ञान
जितना स्पष्ट आता है, उतना स्पष्ट संसार नहीं आता । इस बातको
इस प्रकार समझना चाहिये । जीव अनेक योनियोंमें जाता है । वह कभी मनुष्य बनता है, कभी पशु-पक्षी बनता है, कभी देवता बनता है, कभी राक्षस बनता है, कभी असुर बनता है, कभी भूत-प्रेत-पिशाच बनता है तो शरीर वही नहीं रहता, पर जीव स्वयं सत्तारूपसे वही रहता है । स्वभाव वही नहीं
रहा, आदत वही नहीं रही, भाषा वही नहीं रही, व्यवहार वही नहीं रहा, लोक (स्थान) वही नहीं रहा, समय वही नहीं रहा; सब कुछ बदल गया, पर स्वयंकी सत्ता नहीं बदली । अगर सत्ता
वही नहीं रहेगी तो तरह-तरहके नाम तथा रूप कौन धारण करेगा ? इसलिये गीतामें आया है‒
भूतग्राम स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते
।
(८ । ११)
‘वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर लीन होता है ।’ जो उत्पन्न
हो-होकर लीन होता है, वह शरीर है और जो वही
रहता है, वह जीवका
असली स्वरूप अर्थात् चिन्मय सत्ता (होनापन) है । यह ‘आत्मज्ञान’ का वर्णन
हुआ । अब ‘परमात्मज्ञान’ का वर्णन
किया जाता है । सृष्टिमात्रमें ‘है’ के समान
कोई सार चीज है ही नहीं ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘तत्त्वज्ञान कैसे हो ?’ पुस्तकसे
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