।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी, वि.सं.२०७१, बुधवार
तत्त्वज्ञान क्या है ?
(आत्मज्ञान तथा परमात्मज्ञान)



(गत ब्लॉगसे आगेका)

पुस्तकोंकी पढ़ाई करनेका, शास्त्रोंकी बातें सीखनेका उद्देश्य न हो, प्रत्युत केवल तत्त्वको समझनेका उद्देश्य हो तो हम श्रुति विप्रतिपत्तिसे तर गये !  तात्पर्य है कि हमें न तो मोहकी मुख्यता रखनी है और न शास्त्रीय मतभेदकी मुख्यता रखनी है । किसी मत, सम्प्रदायका भी कोई आग्रह नहीं रखना है[1] । इतना हो जाय तो हम योगके, तत्त्वज्ञानके अधिकारी हो गये !  इससे अधिक किसी अधिकार-विशेषकी जरूरत नहीं है । अब इस बातपर विचार करना है कि तत्त्वज्ञान क्या है ?

तत्त्वज्ञान सबसे सरल है, सबसे सुगम है और सबके प्रत्यक्ष अनुभवकी बात है । तात्पर्य है कि इसको करनेमें, समझनेमें और पानेमें कोई कठिनता है ही नहीं । इसमें करना, समझना और पाना लागू होता ही नहीं । कारण कि यह नित्यप्राप्त है और जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि सम्पूर्ण अवस्थाओंमें सदा ज्यों-का-त्यों मौजूद है । तत्त्वज्ञान जितना प्रत्यक्ष है, उतना प्रत्यक्ष यह संसार कभी नहीं है । तात्पर्य है कि हमारे अनुभवमें तत्त्वज्ञान जितना स्पष्ट आता है, उतना स्पष्ट संसार नहीं आता । इस बातको इस प्रकार समझना चाहिये । जीव अनेक योनियोंमें जाता है । वह कभी मनुष्य बनता है, कभी पशु-पक्षी बनता है, कभी देवता बनता है, कभी राक्षस बनता है, कभी असुर बनता है, कभी भूत-प्रेत-पिशाच बनता है तो शरीर वही नहीं रहता, पर जीव स्वयं सत्तारूपसे वही रहता है । स्वभाव वही नहीं रहा, आदत वही नहीं रही, भाषा वही नहीं रही, व्यवहार वही नहीं रहा, लोक (स्थान) वही नहीं रहा, समय वही नहीं रहा; सब कुछ बदल गया, पर स्वयंकी सत्ता नहीं बदली । अगर सत्ता वही नहीं रहेगी तो तरह-तरहके नाम तथा रूप कौन धारण करेगा ? इसलिये गीतामें आया है‒

भूतग्राम स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
                                                                            (८ । ११)

‘वही यह प्राणिसमुदाय उत्पन्न हो-होकर लीन होता है ।’ जो उत्पन्न हो-होकर लीन होता है, वह शरीर है और जो वही रहता है, वह जीवका असली स्वरूप अर्थात् चिन्मय सत्ता (होनापन) है । यह आत्मज्ञान’ का वर्णन हुआ । अब परमात्मज्ञान’ का वर्णन किया जाता है । सृष्टिमात्रमें हैके समान कोई सार चीज है ही नहीं ।


               [1]  नारायण   अरु  नगरके,     रज्जब  राह  अनेक ।
भावे  आवो  किधर  से,      आगे  अस्थल  एक ॥
पहुँचे  पहुँचे  एक  मत,     अनपहुँचे  मत  और ।
संतदास  घड़ी  अरठ  की,    ढुरे  एक  ही  ठौर ॥
जब लगि काची खीचड़ी, तब लगि खदबद होय ।
संतदास  सीज्यां  पछे,    खदबद  करै  न  कोय ॥

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘तत्त्वज्ञान कैसे हो ?’ पुस्तकसे