Jan
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संसारी लोगोंकी दृष्टिमें
जो सबसे बड़ा सुख है,
जिस सुखके बिना भोगी मनुष्य
रह नहीं सकता, जिस सुखका वह त्याग नहीं
कर सकता, उस सुखको देनेवाले गर्भकी वह (कृत्रिम
गर्भपातद्वारा) हत्या कर देता है‒इससे बढ़कर पाप और क्या होगा ? यह पापकी, कृतघ्नताकी, दुष्टताकी, अन्यायकी आखिरी हद है ।
मनुष्यशरीर सबसे दुर्लभ है, जिसको पानेकी इच्छा चर-अचर सभी प्राणी करते हैं‒
नर तन सम नहिं कवनिउ देही ।
जीव चराचर जाचत तेही
॥
(मानस, उत्तर॰ १२१ । ५)
जब मनुष्यकी हत्याको बहुत बड़ा पाप मानते
हैं और अपराधी मनुष्यको भी फाँसीकी सजा न देकर आजीवन कारावासकी सजा देते हैं, तो फिर यह गर्भपात क्या है ? क्या यह निरपराध मनुष्यकी हत्या नहीं
है ? बुद्धि कितनी मारी गयी है ! एक मारवाड़ी कहावत है‒बुद्धिमें
कुत्ता मूत गया ! अपना भला चाहनेवाला कोई भी मनुष्य ऐसा घृणित पाप नहीं कर सकता । कोई
भी धर्माचार्य इस पापका अनुमोदन नहीं करता ।
गर्भपातसे बढ़कर कोई पाप
नहीं, कोई हिंसा नहीं, कोई दुष्टता नहीं, कोई कृतघ्नता नहीं, कोई अन्याय नहीं, कोई अत्याचार नहीं, कोई राक्षसपना नहीं ! इसके समान भी
कोई घृणित पाप नहीं है,
फिर बढ़कर तो हो ही कैसे
? इससे बढ़कर कोई पाप सम्भव ही नहीं है
। जिसको हम पैदा नहीं कर सकते, उसको नष्ट कर देनेका हमें कोई अधिकार नहीं है ।
सुखकी इच्छा सम्पूर्ण पापोंका
मूल है । जैसे वृक्षके एक बीजमें मीलोंतकका जंगल भरा हुआ है, ऐसे ही सुखभोगकी इच्छामें सम्पूर्ण पाप, दुःख भरे हुए हैं । अतः जब मनुष्य केवल अपने सुखकी इच्छासे
ही स्त्रीका संग करता है, सन्तानकी इच्छासे नहीं, तो यह पहला महान् पाप हुआ । फिर जब स्त्रीमें गर्भ पैदा
होता है, तब उस गर्भको नष्ट कर देते हैं‒यह गर्भहत्यारूप दूसरा
महान् पाप हुआ । एक कहावत है कि अपने द्वारा लगाया गया विषका वृक्ष भी काटा नहीं जाता, फिर अपने ही द्वारा पैदा किये
गये बेकसूर गर्भकी आप ही हत्या कर देना कितना भयंकर पाप है ! ऐसे पापका बड़ा भयंकर फल
भोगना ही पड़ेगा,
इससे कोई बच नहीं सकता‒‘अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं
कर्म शुभाशुभम्’
।
याद रखें, दूसरेके सुखके लिये भोगा गया दुःख परिणाममें
महान् आनन्द देनेवाला होता है; परन्तु अपने सुखके लिये दूसरेको दिया गया दुःख परिणाममें भयंकर
दुःख देनेवाला होता है । अब आप ही फैसला करें कि आपको क्या चाहिये‒महान् आनन्द या महान्
दुःख ?
गर्भमें आये जीवको अनेक जन्मोंका ज्ञान
होता है[*] । इसलिये श्रीमद्भागवतमें गर्भस्थ जीवको ‘ऋषि’ (ज्ञानी) कहा गया है‒
नाथमान ऋषिर्भीतः (३ । ३१ । ११)
एवं कृतमतिर्गर्भे दशमास्यः स्तुवन्नृषिः (३ । ३१ । २२)
गर्भहत्या करनेसे एक ऋषिकी
हत्या होती है । इससे बढ़कर और क्या पाप होगा ? शास्त्रमें इसके समान भयंकर पाप हमें
कोई मिला नहीं । ऐसा भयंकर महापाप करनेवालोंकी क्या दशा होगी, भगवान् जानें !
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘आवश्यक चेतावनी’ पुस्तकसे
[*] अथ नवमे मासि सर्वलक्षणसम्पूर्णो भवति पूर्वजातीः स्मरति
कृताकृतं च कर्म भवति शुभाशुभं च कर्म विन्दति ।
(गर्भोपनिषद् ३)
अकल्पः स्वाङ्गचेष्टायां शकुन्तः इव पञ्जरे ।
तत्र
लब्धस्मृतिर्दैवात्कर्म
जन्मशतोद्भवम् ॥
(श्रीमद्भा॰ ३ । ३१ । ९)
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