Oct
28
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न
उत्तर‒जैसे कोई मनुष्य रेलमें बैठ जाता है
तो उसको परवश होकर रेलके अनुसार ही जाना पड़ता है, ऐसे ही जो प्राणी शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हो गये हैं अर्थात् जिन्होंने शरीररूपी
यन्त्रके साथ मैं-मेरापनका सम्बन्ध जोड़ लिया है, उन्हीं प्राणियोंको ईश्वर उनके स्वभाव और कर्मोंके अनुसार घुमाता है, कर्मोंका फल भुगताता है, उनसे पाप-पुण्य नहीं कराता ।
प्रश्न–भगवान्ने अर्जुनको पहले ‘तमेव शरणंगच्छ’ पदोंसे अन्तर्यामी परमात्माकी शरणमें जानेके लिये कहा (१८ ।
६२) और फिर ‘मामेकं शरणं व्रज’
पदोंसे अपनी शरणमें आनेके लिये कहा (१८ । ६६) । जब अर्जुनको
अपनी ही शरणमें लेना था, तो फिर भगवान्ने उन्हें अन्तर्यामी परमात्माकी शरणमें जानेके
लिये क्यों कहा ?
उत्तर–भगवान्ने पहले कहा कि मेरा शरणागत
भक्त मेरी कृपासे शाश्वत पदको प्राप्त हो जाता है (१८ । ५६), फिर कहा कि मेरे परायण
और मेरेमें चित्तवाला होकर तू सम्पूर्ण विघ्रोंसे तर जायगा (१८ । ५७-५८) । भगवान्के
ऐसा कहनेपर भी अर्जुन कुछ बोले नहीं, उन्होंने कुछ भी स्वीकार नहीं किया । तब भगवान्ने कहा कि अगर तू मेरी शरणमें नहीं
आना चाहता तो तू उस अन्तर्यामी परमात्माकी शरणमें चला जा । मैंने यह गोपनीयसे गोपनीय
ज्ञान कह दिया, अब तेरी जैसी मरजी हो, वैसा कर (१८ । ६३) । यह बात सुनकर अर्जुन घबरा गये कि
भगवान् तो मेरा त्याग कर रहे है ! तब भगवान् अर्जुनको सर्वगुह्यतम बात बताते हैं
कि तू केवल मेरी शरणमें आ जा ।
प्रश्न
उत्तर‒जो भगवान्के सम्मुख हो जाता है, उसके पाप समाप्त हो जाते हैं । अर्जुन (२ । ७में) भगवान्के
सम्मुख हुए थे; अतः वे पापरहित थे और भगवान्की दृष्टिमें
भी अर्जुन पापरहित थे । परन्तु अर्जुन यह मानते थे कि युद्धमें कुटुम्बियोंको मारनेसे मेरेको पाप लगेगा (१ । ३६, ३९, ४५) । अर्जुनकी इस मान्यताको लेकर
ही भगवान् कहते हैं कि ‘मैं तेरेको सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा ।’
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे
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