Dec
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
आजकलके
जमानेमें तो गुरुका पूजन, ध्यान आदि करनेमें विशेष सावधान रहना चाहिये; क्योंकि
इसमें धोखा होनेकी बहुत सम्भावना है । अपनी पूजा
करानेवाले, अपने नामका जप एवं शरीरका ध्यान करानेवाले, अपनी जूठन, चरणरज, चरणामृत
देनेवालेसे जहाँतक बने, दूर रहना चाहिये, बचना चाहिये । कारण कि इसमें ठगे जानेकी
सम्भावना है, जैसे‒कपटमुनिसे प्रतापभानु, साधुवेशधारी रावणसे सीताजी और
कालनेमिसे हनुमान्जी ठगे गये थे !
जो साधक हैं, पारमार्थिक
मार्गपर चलनेवाले हैं, उनको अपनी पूजा आदि नहीं करवानी चाहिये; क्योंकि इससे तपोबल
क्षीण होता है और पारमार्थिक उन्नतिमें बाधा लगती है । अतः साधकोंको इन बातोंसे
बचना चाहिये, सावधान रहना चाहिये । साधुओंको तो इन बातोंसे विशेष सावधान रहना चाहिये; क्योंकि जो अपनी पूजा
आदि करवाता है, उसका तप, साधन पुष्ट नहीं
होता; जैसे अधिक दूध देनेवाली गाय पुष्ट नहीं होती‒‘दुग्धा गौरिव सीदति ।’
प्रश्न‒कई साधु अपनेको भगवान् कहा करते हैं, क्या यह उचित है ?
उत्तर‒अपनेको भगवान् कहनेवाले
प्रायः पाखण्डी ही होते हैं । वे केवल अपनी पूजा, प्रतिष्ठा,
लाभके लिये; अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये ही ऐसा
स्वाँग बनाते हैं । भगवान्का यह स्वभाव नहीं है कि वे अपनेको भगवान्
नामसे प्रसिद्ध करें; अतः जो अपनेको भगवान् कहते हैं,
वे भगवान् नहीं हो सकते ।
तीन रामायण
है‒वाल्मीकिरामायण, अध्यात्म-रामायण और रामचरितमानस । इनमेंसे वाल्मीकिरामायणमें कर्मकी
प्रधानता, अध्यात्मरामायणमें ज्ञानकी प्रधानता और रामचरित-मानसमें भक्तिकी प्रधानता है । इन तीनों ही रामायणमें रामने अपनेको भगवान्
नहीं कहा । हनुमान्जीने पूछा‒
की तुम्ह अखिल भुवन पति लीन्ह
मनुज अवतार ॥
(मानस ४ ।
१)
तो रामजीने अपना परिचय दिया‒
कोसलेस दसरथ
के जाए ।
हम पितु बचन मानि बन आए ॥
(मानस ४ ।
२ । १)
भगवान् श्रीकृष्णने क्षत्रियोंके समुदायमें अपनेको सारथिरूपसे
स्वीकार किया,
सूतपनको स्वीकार किया । अतः जो असली भगवान् होते हैं, वे यह अभिमान नहीं करते कि ‘मैं भगवान् हूँ’ और जो कहते हैं कि ‘मैं भगवान्
हूँ’, वे भगवान् नहीं होते । अगर वे भगवान् होते तो अपनेको भगवान्
क्यों कहते ? भागवतमें मिथ्यावासुदेवका वर्णन आता है । वह कहता
था कि ‘असली वासुदेव मैं ही हूँ, कृष्ण तो नकली वासुदेव हैं ।’
भगवान् कृष्णने युद्धमें उसको मार दिया, पर ‘मैं ही असली वासुदेव
हूँ’‒ऐसा नहीं कहा । तात्पर्य है कि जो अपनेको भगवान् कहते
हैं, वे मिथ्यावासुदेव हैं,
पाखण्डी हैं ।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘सच्चा गुरु कौन ?’ पुस्तकसे
|