May
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न‒‘मैं
साधक हूँ’‒ऐसी अहंताके बिना साधन कैसे होगा ?
स्वामीजी‒‘मैं साधक हूँ’‒इसमें
दो भाव होते हैं‒१. मैं साधक हूँ, दूससे साधक नहीं हैं और २. मैं साधक हूँ; अतः मुझे साधनसे विरुद्ध
काम नहीं करना है ।
मैं साधक हूँ, दूसरे साधक नहीं हैं‒ऐसा भाव होनेसे अभिमान आता
है । यह अभिमान आसुरी सम्पत्ति है (गीता १६ । १४-१५), जो बन्धनका कारण है‒‘निबन्धायासुरी मता’ (गीता
१६ । ५) । परन्तु मैं साधक हूँ; अतः मैं साधनसे विरुद्ध काम
कैसे कर सकता हूँ ?‒ऐसा भाव होनसे अभिमान नहीं आता, प्रत्युत साधनमें
तत्परता आती है, जिससे साधनकी सिद्धि होती है ।
प्रश्न‒अपनापन
(ममता)-के बिना दान कैसे दिया जायगा ? कारण
कि अपनी वस्तुका ही दान होता हैं ।
स्वामीजी‒वस्तुमें अपनापन
वास्तवमें नहीं है, प्रत्युत माना हुआ है । वह माना हुआ अपनापन भी केवल कर्तव्य-पालनके
लिये ही है । अतः मनुष्य दान-पुण्य कर सकता है,
धन आदिसे निर्लिप्त रह सकता है । परन्तु ममता करनेवाला दान-पुण्य
कर ही नहीं सकता; क्योंकि वह कृपण हो जाता है । वह अन्यायपूर्वक कमाता है, पर न्यायपूर्वक
जहाँ खर्च करना चाहिये, वहाँ खर्च नहीं करता । वह दूसरोंका धन हड़पनेके लिये उद्योग
करता है और मौका लगनेपर हड़प भी लेता है । अतः ऐसा व्यक्ति क्या दान-पुण्य करेगा
? वह दान-पुण्य कर ही नहीं सकता
। एक कहावत है कि ‘दाताका धन अपना नहीं और शूरवीरका सिर अपना
नहीं’ । अपना माननेवाला न तो दाता हो सकता है और न शूरवीर ही हो सकता
है ।
प्रश्न‒‘मैं
भगवान्का हूँ’‒ऐसा माननेसे ‘मैं’-पना रह जायगा न ? और
श्रुति भी कहती है‒‘द्वितीयाद्वै भयं भवति’ (बृहदारण्यक॰ १ । ४ । २) अर्थात् दूसरेसे भय होता है । अतः इससे साधन कैसे होगा ? इससे
तो द्वैतपना ही दृढ़ होगा ।
स्वामीजी‒ऐसी बात नहीं है
। भगवान् द्वितीय (दूसरे) नहीं हैं, प्रत्युत आत्मीय हैं । आत्मीयसे
भय नहीं होता, प्रत्युत निर्भयता होती है । भय तो दूसरेसे होता है;
जैसे-बालकको कुत्ते,
कौए आदिसे भय होता है, पर माँसे भय नहीं होता । बालक माँकी गोदमें
निर्भय रहता है । माँ तो एक जन्मकी होती है,
पर भगवान् सदाकी माँ हैं । भगवान् सदासे अपने हैं,
दूसरे हैं ही नहीं । उनमें दूसरेपनकी सम्भावना ही नहीं है ।
फिर अपने प्रभुसे भय कैसे होगा ? वास्तवमें भगवान्से अलग होनेपर, अपनेको भगवान्से अलग माननेपर
ही भय होता है अर्थात् भगवान्से अलग होकर संसारको अपना माननेसे ही भय होता है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘सन्त समागम’ पुस्तकसे
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