Dec
28
(गत ब्लॉगसे आगेका)
‘परमात्मा
है’‒इतना याद रहना बहुत लाभकी बात है ! यह बहुत सुगम
तथा श्रेष्ठ ध्यान है । संसारमें
जो ‘है’-पना दीखता है, वह परमात्माका ही है,
संसारका नहीं । संसार तो एक क्षण भी नहीं टिकता । इसमें खुदमें
‘है’-पना है ही नहीं । परमात्माका ‘है’-पना ही संसारमें दीखता है । ‘है’- रूपसे सब जगह परमात्मा ही है । अगर
परमात्मा न हो तो संसार दीखे ही नहीं । जैसे आकाशमें बादल छा जाते हैं,
बिजली चमकती है, वर्षा होती है, पर आकाश ज्यों-का-त्यों अटल,
निर्विकार रहता है । उस ‘है’-रूप परमात्माका अंश ही यह जीवात्मा है । इसीलिये कहा जाता है
कि मुक्ति होती नहीं, मुक्ति है । बन्धन (भूल) -के मिटनेको मुक्ति होना कहते हैं ।
वास्तवमें बन्धन अनित्य है । एक बार बन्धन मिटनेके बाद पुनः कथन नहीं होता‒‘यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव’ (गीता
४ । ३५)
परमात्मा स्वतः-स्वाभाविक है । उसका अनुभव करनेके लिये पहले
दृढ़तासे मान लें कि ‘परमात्मा है’ । पीछे माना हुआ अनुभवमें आ जायगा । संसारकी सत्ताको लेकर ही दुःख है । संसारकी सत्ता हटते ही दुःख
हट जायगा, आनन्द रह जायगा । इसका पता कैसे लगे ?
जो सत्संग नहीं करते,
उनका धन आदि नष्ट हो जाय तो वे बड़े दुःखी हो जाते हैं । परन्तु
सत्संग करनेवालोंमें दुःख, चिन्ता, भय आदि कम होते हैं । जितने-जितने कम होते हैं,
उतना-उतना उनको चेत,
होश हुआ है । सुख स्वतः है,
दुःख बनावटी है ।
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आपके द्वारा किसीका अहित नहीं होना चाहिये । दूसरेके अहितकी बात सोचना पारमार्थिक मार्गमें बड़ी भारी बाधा है
। यह दूसरेका नुकसान नहीं है,
प्रत्युत अपना नुकसान है । दूसरेका नुकसान तो उतना ही होगा,
जितना उसके प्रारब्धमें है,
पर अपना नुकसान नया होगा । दूसरेके नुकसानमें उसके पाप नष्ट
होंगे, जिससे उसका हित होगा;
परन्तु हमारा नया कर्म (पाप) बनेगा,
जिससे हमारा अहित होगा । इसलिये वास्तवमें
अहित उसीका होता है, जो दूसरेका अहित करता है ।
अगर आप अपना जीवन शुद्ध,
निर्मल बनाना चाहते हैं तो किसीका भी बुरा न करें । बुराई न करना भलाईका बीज है । बुराई छोड़नेमात्रसे आप भले हो जाओगे
। एक गहरी बात है कि ‘करने’ में तो परिश्रम होता है,
पर ‘न करने’ में परिश्रम नहीं होता । भला करनेमें तो परिश्रम है,
पर किसीका बुरा न करनेमें कोई परिश्रम नहीं है । ‘करने’ की अपेक्षा ‘न करना’ सुगम होता है । ‘न करने’ में न तो परिश्रम होता है,
न पैसे खर्च होते हैं । किसीका बुरा करना,
किसीका बुरा चाहना और किसीको बुरा समझना‒ये तीन बातें आप बिल्कुल
न करें । केवल यह सावधानी रखनी है कि हमारेसे किसीका अहित न हो जाय । किसीका भी बिगाड़
होता है, वह अपना ही होता है । किसीका बुरा नहीं करेंगे,
किसीका बुरा नहीं चाहेंगे और किसीको बुरा नहीं समझेंगे‒इन तीन
बातोंका आप नियम ले लो तो आपका ‘कर्मयोग’ सिद्ध हो जायगा । आपका सत्संग करना सफल हो जायगा । आप सत्संग
करते हो । सत्संग करनेवालेसे सब लोग अच्छाईकी आशा रखते हैं ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे
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