Dec
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
एक मार्मिक बात है कि सांसारिक पदार्थोंकी चाहना करनेपर तो वे
आते नहीं, पर चाहना छोड़ दें तो वे गरज करेंगे । सन्त-महात्मा कुछ नहीं
चाहते तो सब उनको भोजन, वस्त्र आदि देना चाहते हैं । उनकी सेवामें रुपया लग जाय तो मानते
हैं कि हमारा रुपया सफल हो गया ! जिसके भीतर चाहना है,
उसके पास लाखों-करोड़ों-अरबों रुपये हों तो भी वह दरिद्र है‒‘को वा दरिद्रो हि विशालतृष्णः’ (प्रश्नोत्तरी
५) ।
जो सर्वोपरि परमात्मा हैं,
वे हमारे हैं, फिर अन्यकी जरूरत ही क्या है ?
दुःख इस बातका है कि भगवान्को अपना न मानकर संसारको अपना मानते
हैं ! जो संसारको अपना मानता है, वह दुःख पायेगा ही;
क्योंकि संसार रहता नहीं । भगवान्के भक्तके पास कोई अभाव आता
ही नहीं । चाहना होनेपर वस्तु बड़ी तंगीसे,
कठिनतासे मिलती है । चाहना न हो तो वस्तु खुली मिलती है । मनमें
लेनेकी इच्छा होती है तो ताला लग जाता है । चोरोंके लिये ताला लगता है,
सन्तोंके लिये नहीं । सन्तोंके लिये सभी चीजें खुली रहती हैं
। योगदर्शनमें आया है‒
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम् ।
(योगदर्शन, साधन॰ ३७)
‘अस्तेय (चोरीके अभाव)-की दृढ़ स्थिति होनेपर योगीके सामने सब प्रकारके रत्न प्रकट
हो जाते हैं ।’
जो पासमें कुछ रखता है,
उसको वस्तुएँ तंगीसे मिलती हैं । जो साधु पासमें कुछ नहीं रखता,
उसके लिये खजाना खुल जाता है ! वस्तुएँ उसके पास अपने-आप आती हैं ।
जब मनुष्य भगवान्को अपना मान लेता है,
तब उसकी दरिद्रता मिट जाती है । आप भगवान्को अपना मान लोगे
तो दरिद्रता आपके पड़ोसमें भी नहीं रहेगी ! परन्तु संसारको अपना मानोगे तो दरिद्रता
कभी मिटेगी नहीं । आप धनी आदमीको बड़ा सुखी समझते हैं,
पर वास्तवमें वह बड़ा दुःखी है ! उसपर दया आनी चाहिये ! धनी आदमी
साधुसे, ब्राह्मणसे भी डरते हैं कि ये कुछ माँग न लें ! वे राजकीय आदमियोंसे
भी डरते हैं, चोर-डाकुओंसे भी डरते हैं,
यहाँतक कि बेटे-पोतोंसे भी डरते हैं कि ये धन नष्ट कर देंगे
! अब उनको सुख, शान्ति कैसे मिलेगी ?
अगर आपका भगवान्में प्रेम होगा तो गृहस्थमें भी
मौजसे रहोगे, और संसारमें प्रेम होगा तो रोना पड़ेगा ही, रोये
बिना रह सकते नहीं !
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे
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