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(गत ब्लॉगसे आगेका)
मनुष्य जिस जातिमें पैदा हुआ है, उसके
अनुसार शास्त्रविहित कर्तव्य-कर्म करनेसे उस जातिकी रक्षा हो जाती है और विपरीत कर्म
करनेसे उस जातिमें कर्मसंकर होकर वर्णसंकर पैदा हो जाता है । भगवान्ने भी अपने लिये कहा है कि यदि मे अपने वर्णके अनुसार
कर्तव्यका पालन न करूँ तो मैं वर्णसंकर पैदा करनेवाला तथा सम्पूर्ण प्रजाका नाश (पतन)
करनेवाला बनूँ (३ । २३‒२४) । अतः जो मनुष्य अपने वर्णके अनुसार कर्तव्यका पालन नहीं
करता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला और पापमय जीवन
बितानेवाला मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है (३ । १६) ।
सभी मनुष्योंको चाहिये कि वे अपने-अपने कर्तव्य कर्मोंके द्वारा
अपनी जातिकी रक्षा करें । इसके लिये पाँच बातोंका ख्याल रखना जरूरी है‒
(१) विवाह‒कन्याकी लेना और देना अपनी जातिमें ही होना चाहिये,
क्योंकि दूसरी जातिकी कन्या लेनेसे रज-वीर्यकी विकृतिके कारण
उनकी संतानोंमें विकृति (वर्णसंकरता) आयेगी । विकृत संतानोंमें अपने पूर्वजोंके प्रति
श्रद्धा नहीं होगी । श्रद्धा न होनेसे वे उन पूर्वजोंके लिये श्राद्ध-तर्पण नहीं करेंगे,
उनको पिण्ड-पानी नहीं देंगे । कभी लोक-लज्जामें आकर दे भी देंगे,
तो भी वह श्राद्ध-तर्पण,
पिण्ड-पानी पितरोंको मिलेगा नहीं । इससे पितरलोग अपने स्थानसे
गिर जायेंगे (१ । ४२) । गीता कहती हैं कि जो शास्त्र-विधिका छोड़कर मनमाने ढंगसे कर्म
करता है, उसे न तो अन्तःकरणकी शुद्धिरूप सिद्धि मिलती है,
न सुख मिलता है और न परमगतिकी प्राप्ति ही होती है (१६ । २३)
। अतः मनुष्यको कर्तव्य-अकर्तव्यके विषयमें शास्त्रको ही सामने रखना चाहिये (१६ । २४)
।
(२) भोजन‒भोजन भी अपनी जातिके अनुसार ही होना चाहिये । जैसे ब्राह्मणके लिये लहसुन,
प्याज खाना दोष है;
परंतु शूद्रके लिये लहसुन,
प्याज खाना दोष नहीं है । यदि हम दूसरी जातिवालेके साथ भोजन
करेंगे तो अपनी शुद्धि तो उनमें जायगी नहीं,
पर उनकी अशुद्धि अपनेमें जरूर आ जायगी । अतः मनुष्यको अपनी जातिके
अनुसार ही भोजन करना चाहिये ।
(३) वेशभूषा‒पाश्चात्य देशका अनुकरण करनेसे आज अपनी जातिकी वेशभूषा प्रायः भ्रष्ट हो गयी है
। प्रायः सभी जातियोंकी वेशभूषामें दोष आ गया है,
जिससे ‘कौन किस जातिका है’‒इसका पता ही नहीं लगता । अतः मनुष्यको अपनी जातिके अनुसार ही
वेशभूषा रखनी चाहिये ।
(४) भाषा‒अन्य भाषाओंको, लिपियोंको सीखना दोष नहीं है,
पर उनके अनुसार स्वयं भी वैसे बन जाना बड़ा भारी दोष है । जैसे
अंग्रेजी सीखकर अपनी वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन अंग्रेजोंका ही बना लेना उस भाषाको
लेना नहीं है प्रत्युत अपने-आपकों खो देना है । अपनी वेशभूषा,
खान-पान, रहन-सहन वैसे-का-वैसा रखते हुए ही अंग्रेजी सीखना अंग्रेजी भाषा
एवं लिपिको लेना है । अतः अन्य भाषाओंका ज्ञान होनेपर भी बोलचाल अपनी भाषामें ही होनी
चाहिये ।
(५) व्यवसाय‒व्यवसाय (काम-धंधा) भी अपनी जातिके अनुसार ही होना चाहिये । गीताने ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रके लिये अलग-अलग कर्मोंका विधान किया है (१८ ।
४२‒४४) ।
नारायण ! नारायण
!! नारायण !!!
‒ ‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे
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