Jul
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
जो आदि और
अन्तमें नहीं होता, वह मध्यमें भी नहीं होता, यह सिद्धान्त है–‘आदावन्तो च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा’ (माण्डूक्यकारिका ४/३१) । जैसे दर्पणमें मुख पहले भी नहीं था, पीछे भी नहीं रहेगा
और वर्तमानमें प्रत्यक्ष दीखनेपर भी वह वास्तवमें है नहीं । ऐसे ही अपनेमें दोष पहले भी नहीं था, पीछे भी नहीं रहेगा और
वर्तमानमें दीखते हुए भी वह अपनेमें नहीं है । जैसे दर्पणमें मुखकी प्रतीति है,
ऐसे ही अपनेमें दोषोंकी प्रतीति है, वास्तवमें दोष है नहीं ।
जैसे अपनेमें दोष नहीं है, ऐसे ही
दूसरेमें भी दोष नहीं हैं । सबका स्वरूप स्वतः निर्दोष
है । अतः कभी किसीको दोषी नहीं मानना चाहिये । ऐसा समझना चाहिये कि दूसरेने
आगन्तुक दोषके वशीभूत होकर क्रिया कर दी, पर न तो वह क्रिया स्थायी रहेगी तथा न
उसका फल स्थायी रहेगा । क्रिया और फल तो नहीं रहेंगे, पर स्वरूप रहेगा । अगर हम दूसरेमें दोष मानेंगे तो उसमें वे दोष आ जायँगे;
क्योंकि उसमें दोष देखनेसे हमारा त्याग, तप, बल आदि भी उस दोषको पैदा करनेमें
स्वाभाविक सहायक बन जायगा, जिससे वह व्यक्ति दोषी हो जायगा । अतः (सिद्धान्तकी दृष्टिसे)
पुत्र, शिष्य आदिको स्वरुपसे निर्दोष मानकर और उनमें दिखनेवाले दोषको आगन्तुक मानकर ही उनको (व्यवहारकी दृष्टिसे) शिक्षा देना
चाहिये । उनमें निर्दोषता मानकर ही उनके आगन्तुक दोषको दूर करनेका प्रयत्न
करना चाहिये ।
अगर मन-बुद्धिमें
कोई दोष पैदा हो जाय तो उसके वशमें नहीं होना चाहिये–‘तयोर्न
वशमागच्छेत्’ (गीता ३/३४) अर्थात् उसके अनुसार
कोई क्रिया नहीं करनी चाहिये । उसके वशीभूत होकर क्रिया करनेसे वह दोष दृढ़
हो जायगा । परन्तु उसके वशीभूत होकर क्रिया न करनेसे एक उत्साह पैदा होगा । जैसे, किसीने हमें कड़वी बात कह दी, पर हमें क्रोध नहीं
आया तो हमारे भीतर एक उत्साह, प्रसन्नता होगी कि आज तो हम बच गये ! परन्तु इसमें अपना उद्योग न मानकर भगवान्की कृपा माननी चाहिये कि
भगवान्की कृपासे आज हम बच गये, नहीं तो इसके वशीभूत हो जाते ! इस तरह साधकको कभी
भी कोई दोष दीखे तो वह उसके वशीभूत न हो और उसको अपनेमें भी न माने ।
मूल दोष है–मिली हुई स्वतन्त्रताका
दुरुपयोग । हम असत्की
सत्ता मान भी सकते हैं और नहीं भी मान सकते; छल, कपट, हिंसा आदि कर भी सकते हैं और
नहीं भी कर सकते–यह मिली हुई स्वतन्त्रता है । जबसे हमने
इस स्वतन्त्रताका दुरुपयोग किया, तभीसे जन्म-मरण आरम्भ हुआ । इसलिये साधकको चाहिये
कि वह मिली हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग न करे । दुरुपयोग न करनेसे निर्दोषता
सुरक्षित रहेगी ।
जब मिली हुई
स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके असत्का संग करता है, तब वह असत्के संगसे होनेवाले
संयोगजन्य सुखमें आसक्त हो जाता है । संयोगजन्य सुखकी
आसक्तिसे ही सम्पूर्ण दोष पैदा होते हैं ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
–‘सहज
साधना’ पुस्तकसे
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