Sep
29
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्नᅳगुरु बनानेसे वे
शक्तिपात करेंगे; अतः गुरु बनाना जरुरी हुआ ?
उत्तरᅳशक्तिपात
कोई तमाशा नहीं है । वर्तमानमें शक्तिपातकी बात देखनेको तो दूर रही, पढ़नेको भी प्रायः
मिलती नहीं ! एक सन्त थे ।
उनके पीछे एक आदमी पड़ा कि शक्तिपात कर दो । वे सन्त बोले कि शक्तिपात कोई मामूली
चीज नहीं है; उसको तुम सह नहीं सकोगे, मर जाओगे । वह पीछे पड़ा रहा कि महाराज किसी
तरह कर दो । सन्तने शक्तिपातका थोड़ा-सा असर डाला तो वह आदमी घबरा गया और चिल्लाने
लगा कि मेरे स्त्री-पुत्र, माँ-बाप सब मिट गये ! संसार सब मिट गया ! मैं कहाँ
जाऊँगा ? मेरेको बचाओ ! तात्पर्य है कि शक्तिपात
करनेवाला भी मामूली नहीं होता और उसको सहनेवाला भी मामूली नहीं होता ।
प्रश्नᅳचेला
इसलिये बनाते हैं कि कोई ईसाई या मुसलमान न बने; अतः चेला बनानेमें क्या दोष है ?
उत्तरᅳयह बिलकुल
झूठी बात है ! जो ईसाई या मुसलमान बनना चाहते हैं वे गुरुके पास आयेंगे ही नहीं ! अगर चेला न बनानेके कारण कोई ईसाई या मुसलमान बन जाय तो गुरुको
दोष नहीं लगेगा । परन्तु उसने चेला बनाकर उसको दूसरी जगह जानेसे रोक दिया और खुद
उसका कल्याण नहीं कर सकाᅳयह दोष तो उसको लगेगा ही । चेला बनानेसे वह भगवान्के शरण न होकर गुरुके शरण हो गया, भगवान्के साथ
सम्बन्ध न जोड़कर गुरुके साथ सम्बन्ध जोड़ लियाᅳयह बड़ा भारी दोष है ।
प्रश्नᅳ‘गुरु
कीजै जान के, पानी पीजै छान के’ तो गुरुको
जाननेका उपाय क्या है ? गुरुकी परीक्षा
कैसे करें ?
उत्तरᅳगुरुकी
परीक्षा आप नहीं कर सकते । अगर आप गुरुकी
परीक्षा कर सकें तो आप गुरुके भी गुरु हो गये ! जो गुरुकी परीक्षा कर सके, वह क्या गुरुसे छोटा होगा ?
परीक्षा करनेवाला तो बड़ा होता है । ऐसी स्थितिमें आपको
चाहिये कि किसीको गुरु न बनाकर सत्संग-स्वाध्याय करो और उसमें जो अच्छी बातें मिलें, उनको धारण करो
। जिनका संग करनेसे परमात्मप्राप्तिकी लगन बढ़ती हो, दुर्गुण-दुराचार स्वतः दूर
होते हों और सद्गुण-सदाचार स्वतः आते हों,
भगवान्की विशेष याद आती हो, भगवान्पर श्रद्धा-विश्वास बढ़ते हों, बिना पूछे ही
शंकाओंका समाधान हो जाता हो और जो हमसे कुछ भी लेनेकी इच्छा न रखते हों, उन
सन्तोंका संग करो । उनसे गुरु-शिष्यका सम्बन्ध जोड़े बिना उनसे लाभ लो । अगर वहाँ
कोई दोष दिखे, कोई गड़बड़ी मालूम दे तो वहाँसे चल दो ।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे
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