Oct
30
परमात्मप्राप्ति बहुत सुगम है । इतना सुगम दूसरा
कोई काम नहीं है । परन्तु केवल परमात्माकी ही
चाहना रहे, साथमें दूसरी कोई चाहना न रहे । कारण कि परमात्माके समान दूसरा कोई है ही नहीं । जैसे परमात्मा अनन्य हैं, ऐसे ही
उनकी चाहना भी अनन्य होनी चाहिये । सांसारिक भोगोंके प्राप्त होनेमें तीन बातें होनी जरुरी हैं—इच्छा, उद्योग और प्रारब्ध । पहले तो सांसारिक वस्तुको प्राप्त
करनेकी इच्छा होनी चाहिये, फिर उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करना चाहिये । कर्म करनेपर
भी उसकी प्राप्ति तब होगी, जब उसके मिलनेका प्रारब्ध होगा । अगर प्रारब्ध नहीं होगा तो
इच्छा रखते हुए और उद्योग करते हुए भी वस्तु नहीं मिलेगी । इसलिये उद्योग तो करते
हैं नफेके लिये, पर लग जाता है घाटा ! परन्तु परमात्माकी प्राप्ति इच्छामात्रसे होती है । इसमें उद्योग और
प्रारब्धकी जरूंरत नहीं है । परमात्माके मार्गमें घाटा कभी होता ही नहीं, नफा-ही-नफा
होता है ।
एक परमात्माके सिवाय कोई भी चीज इच्छामात्रसे नहीं मिलती ।
कारण यह है कि मनुष्यशरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है । अपनी
प्राप्तिका उद्देश्य रखकर ही भगवान्ने हमारेको मनुष्यशरीर दिया है । दूसरी बात,
परमात्मा सब जगह हैं । सुईकी तीखी नोक टिक जाय,
इतनी जगह भी भगवान्से खाली नहीं है । अतः उनकी प्राप्तिमें
उद्योग और प्रारब्धका काम नहीं है । कर्मोंसे वह चीज
मिलती है, जो नाशवान् होती है । अविनाशी परमात्मा कर्मोंसे
नहीं मिलते । उनकी प्राप्ति उत्कट इच्छामात्रसे होती है ।
पुरुष हो या स्त्री हो, साधु हो या गृहस्थ हो,
पढ़ा-लिखा हो या अपढ़ हो, बालक हो या
जवान हो, कैसा ही क्यों न हो,
वह इच्छामात्रसे परमात्माको प्राप्त कर सकता है ।
परमात्माके सिवाय न जीनेकी चाहना हो, न मरनेकी चाहना हो, न भोगोंकी चाहना हो, न संग्रहकी चाहना हो । वस्तुओंकी चाहना न होनेसे
वस्तुओंका अभाव नहीं हो जायगा । जो हमारे प्रारब्धमें लिखा है, वह
हमारेको मिलेगा ही । जो चीज हमारे भाग्यमें
लिखी है, उसको दूसरा नहीं ले सकता—‘यदस्मदीयं न ही तत्परेषाम्’ । हमारेको आनेवाला बुखार दूसरेको कैसे आयेगा ?
ऐसे ही हमारे प्रारब्धमें धन लिखा है तो जरुर आयेगा ।
परन्तु परमात्माकी प्राप्तिमें प्रारब्ध नहीं है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
—‘मानवमात्रके कल्याणके लिये’
पुस्तकसे
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