Nov
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भगवत्प्राप्तिके विविध सुगम उपाय
१. भगवत्प्राप्तिकी सच्ची लगन होना
(गत ब्लॉगसे आगेका)
(१२)
आप पापी हैं या पुण्यात्मा हैं,
पढ़े-लिखे हैं या अपढ़ हैं,
इस बातको भगवान् नहीं देखते । वे तो केवल आपके हृदयका भाव देखते
हैं‒
रहति न प्रभु चित चूक किए की ।
करत सुरति सय बार हिए
की ॥
(मानस, बाल॰ २९ । ३)
वे हृदयकी बातको याद रखते हैं, पहले
किये पापोंको याद रखते ही नहीं ! भगवान्का अन्तःकरण ऐसा है, जिसमें आपके पाप छपते ही नहीं ! केवल आपकी अनन्य लालसा छपती
है । भगवान् कैसे मिलें ? कैसे मिलें ? ऐसी अनन्य लालसा हो जायगी तो भगवान् जरूर मिलेंगे,
इसमें सन्देह नहीं है । आप और कोई इच्छा न करके,
केवल भगवान्की इच्छा करके देखो कि वे मिलते हैं कि नहीं मिलते
हैं ! आप करके देखो तो मेरी भी परीक्षा हो जायगी कि मैं ठीक कहता हूँ कि नहीं !
(१३)
‘मेरा भगवान्में ही प्रेम हो जाय’
इस एक इच्छाको बढ़ायें । रात-दिन एक ही लगन लग जाय कि मेरा प्रभुमें
प्रेम कैसे हो ? एक प्रेमके सिवाय और कोई इच्छा न रहे,
दर्शनकी इच्छा भी नहीं ! इस भगवत्प्रेमकी इच्छामें बड़ी शक्ति
है । इस इच्छाको बढ़ायें तो बहुत जल्दी सिद्धि हो जायगी । इस इच्छाको इतना बढ़ाये कि
अन्य सब इच्छाएँ गल जायँ । केवल एक ही लालसा रह जाय कि ‘मेरा
भगवान्में प्रेम हो जाय’ तो इसकी सिद्धि होनेमें आठ पहर भी नहीं लगेंगे !
(१४)
परमात्माकी प्राप्ति कठिन नहीं है;
क्योंकि परमात्मा कहाँ नहीं हैं
? कब नहीं हैं
? किसमें नहीं हैं ?.......केवल उनकी इच्छाकी कमी है, और कुछ कमी नहीं है । केवल एक इच्छा
हो जाय कि परमात्मा कैसे मिलें
? वे कैसे हैं‒यह
देखनेकी जरूरत नहीं है । केवल उनकी आवश्यकताकी कभी विस्मृति न हो । उनकी एक इच्छा, एक लालसा करनेमें तो समय लगेगा,
पर परमात्माकी प्राप्ति होनेमें समय नहीं लगेगा ।
(१५)
जैसे हम प्यासे मर रहे हैं और गंगाजी भी पासमें है,
पर हम गंगाजीतक जायँ ही नहीं,
उसका जल पीयें ही नहीं तो गंगाजी क्या करे
? ऐसे ही अनेक विलक्षण महात्मा
हुए हैं, भगवान्के अनेक अवतार हुए हैं,
पर हमारी मुक्ति नहीं हुई तो इसका कारण यह था कि हमने चेत नहीं
किया । इसलिये अपना उद्धार करनेके लिये आपको चेत करनेकी आवश्यकता
है । संसारके पदार्थ प्रारब्धसे मिलते हैं,
पर परमात्माकी प्राप्ति नया काम है,
जिसको आप कर सकते हैं । यह काम अपने-आप
होनेवाला नहीं है, प्रत्युत लगनसे होनेवाला है । लगन नहीं होगी तो अच्छे
महात्मा मिलनेपर भी आप लाभ नहीं ले सकोगे ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘लक्ष्य अब दूर नहीं !’ पुस्तकसे
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