Jan
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता‒मुझे भोग प्यारे लगते हैं, भगवान् प्यारे नहीं लगते ! क्या करूँ ?
स्वामीजी‒यह प्रार्थना करो कि ‘हे प्रभो, आप हमें प्यारे लगो’
। मेरी एक ही माँग है, और कोई माँग नहीं ।
अरथ न धरम न काम रुचि गति
न चहउँ निरबान ।
जनम जनम रति राम
पद यह बरदानु न आन ॥
(मानस,
अयोध्या॰ २०४)
‘(भरतजी बोले‒)
मुझे न धनकी, न धर्मकी तथा न कामकी ही रुचि
(इच्छा) है, और न मैं मोक्ष
ही चाहता हूँ । मैं तो बस यही वरदान माँगता हूँ कि जन्म-जन्ममें
मेरा श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम हो । इसके सिवाय और कुछ नहीं चाहता ।’
आप रात और दिन कहते रहो कि ‘हे नाथ, आप मुझे प्यारे लगो’
। आपकी इच्छा जितनी तेज होगी, उतना जल्दी काम होगा । हम भूलसे
संसारी हैं । वास्तवमें तो हम भगवान्के ही अंश हैं ।
श्रोता‒भगवान्की कृपा कैसे प्राप्त हो ?
स्वामीजी‒भगवान्की कृपा सबपर है । यह
मनुष्यशरीर उस कृपाकी पहचान है !
कबहुँक करि करुना नर देही
।
देत ईस बिनु हेतु
सनेही ॥
(मानस,
उत्तर॰ ४४ । ३)
चौरासी लाख योनियाँ पूरी नहीं हुईं, पर भगवान्ने कृपा करके बीचमें ही मनुष्यशरीर दे दिया कि यह अपना कल्याण कर ले । मनुष्यशरीरकी
बारी आनेसे पहले ही भगवान्ने मनुष्यशरीर दे दिया, अपने उद्धारका मौका दे दिया ! फिर मनमें अपने उद्धारकी
जागृति पैदा की । फिर यहाँ उत्तराखण्डमें गंगाजीके किनारे लाये और यहाँ सत्संगमें बैठाया
। यह कोरी कृपा-ही-कृपा है ! हमारा कल्याण तो होगा ही !! सेठजीने साफ कहा था कि तीन
आदमियोंको यहाँ सत्संगमें लाकर बैठा दो, तुम्हारी मुक्ति हो जायगी
! यह कमीशन है ! कमीशनसे ही मुक्ति हो जाय
!!
हृदयसे यह मान लो कि भगवान्के सिवाय
अपना कोई नहीं है, कोई नहीं है, कोई नहीं
है ! अपने केवल भगवान् हैं, केवल भगवान्
हैं, केवल भगवान् हैं ! यह बात दृढ़तासे हृदयमें
धारण कर लो । जब मेरा कोई नहीं है, तो फिर मेरेको कुछ भी नहीं
चाहिये । शरीर अपना हो तो रोटी चाहिये, पानी चाहिये, कपड़ा चाहिये, मकान चाहिये । पर शरीर भी अपना नहीं है
। यह निरन्तर छूट रहा है, और छूट जायगा । जितने वर्ष बीत गये,
उतना तो छूट ही गया ! मीराबाईका खास वेदवाणीकी
तरह यह वाक्य है‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहीं, मेरा नहीं’ पुस्तकसे
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