Mar
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(गत ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता‒ममता छूटनेका उपाय क्या है
?
स्वामीजी‒एक ज्ञानमार्ग है और एक विश्वासमार्ग
है । विश्वासमार्गकी दृष्टिसे देखें तो एक भगवान्के सिवाय दूसरा कोई मेरा है ही नहीं‒‘मेरे
तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई’ । विश्वास, प्रेम, अपनापन सब एक भगवान्में ही हो । फिर ममता छूट
जायगी । भगवान् ही साथमें थे, भगवान् ही साथमें हैं और भगवान्
ही साथमें रहेंगे, और कोई साथमें रहनेवाला है ही नहीं,
फिर किसमें ममता करें ? अतः ममता एक जगह
(भगवान्में) ही होनी चाहिये, दो जगह नहीं । यह विश्वासमार्ग सबसे श्रेष्ठ, सबसे ऊँचा है ।
माता, पिता, स्त्री,
भाई आदि जो अभी संसारमें नहीं हैं, उनमें अगर ममताके
कारण मन जाता है तो उनके निमित्त नामजप करो, कीर्तन करो,
गीता-रामायणका पाठ करो, विष्णुसहस्रनामका
पाठ करो, हनुमानचालीसाका पाठ करो । जिनमें
ममता दीखे, उनकी सेवा कर दो
और बदलेमें कुछ मत चाहो । उनको दो, लो मत । इससे ममता मिट जाती
है । जैसे, पचीस वर्षका जवान सहसा
मर जाय तो दुःख होता है । परन्तु सत्रह वर्षकी अवस्थासे आठ वर्षतक वह बीमार रहा और
उसकी सेवा कर दी, रुपये भी लगा दिये, रातों
जगे, वह मर जाय तो दुःख नहीं होगा । तात्पर्य है कि सेवा करनेसे
ममता टूटती है ।
सुखकी आशा और सुखका भोग‒ये दोनों
ममताको दृढ़ करते हैं । इसलिये इन दोनोंको छोड़कर दूसरेको सुख पहुँचाओ । पहले
जिनसे सुख लिया है, उनका हमारे ऊपर कर्जा है । वह कर्जा जबतक रहेगा, तबतक ममता छूटनी कठिन है । इसलिये सुख लेना नहीं है, देना है । सुख लेते रहोगे तो ममता छूटेगी नहीं । सत्तर-अस्सी वर्षका बूढ़ा मर जाय तो दुःख नहीं होता; क्योंकि
अब उससे सुख लेनेकी आशा नहीं रही । वे हमारा कुछ काम करेंगे, यह आशा नहीं रही ।
जो मर गये हैं, उनकी ममता,
चिन्ता-शोक मिटानेके लिये मैं तीन बातें कहता हूँ‒
१) उनकी याद आये तो उनको भगवान्के धाममें,
भगवान्के चरणोंमें देखो, २) छोटे-छोटे बालकोंको खिलौने अथवा मिठाई दो, जिससे वे राजी हों और ३) गीता, रामायण आदिका पाठ, नामजप, दान-पुण्य करो और उनके अर्पण कर दो ।
श्रोता‒भगवान्के अनेक नाम बताये हैं, उनमें हमलोगोंके लिये कौन-सा नाम श्रेष्ठ
है ? इस कलियुगमें कौन-से नामसे जल्दी कल्याण होता है
?
स्वामीजी‒ऐसे तो ‘राम’‒नामको सबसे श्रेष्ठ
बताया गया है‒‘राम सकल नामन्ह ते अधिका’ (मानस, अरण्य॰ ४२ । ४) । परन्तु आपको जो नाम हृदयसे प्यारा
लगे, वही नाम आपके लिये
सर्वश्रेष्ठ है । आप जो नाम जपते हो, जिसपर आपकी श्रद्धा है, जिसमें
आपका प्रेम है, जिसपर आपका विश्वास है, वह नाम आपके लिये श्रेष्ठ है । उसीका जप करनेसे
आपकी निष्ठा बनेगी । मेरी तो यही प्रार्थना है कि उस नामको आप छोड़ना मत । कोई सन्त-महात्मा कुछ भी कह दें, उसको छोड़ना नहीं । उसमें तत्परतासे
लगे रहो । उससे आपकी निष्ठा बनेगी ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहीं, मेरा नहीं’ पुस्तकसे
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