May
28
यहाँ यह शंका होती है कि भगवान्में विषमता है क्या ? जो वे सर्वस्व समर्पण करनेवालेका
ही उद्धार करते हैं, अन्यका नहीं ? इसका समाधान स्वयं भगवान् ही करते हैं–
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
(९/२९)
अर्थात् ‘मैं सब भूतोंमें
समभावासे व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है । परन्तु जो भक्त मुझको प्रेमसे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें
प्रत्यक्ष प्रकट हूँ ।’
इस श्लोकमें
भगवान् प्राणिमात्रमें अपनी समताका निर्देश किया है । ‘मैं प्राणिमात्रमें सम हूँ
।’ अर्थात् समानरूपसे व्यापक, सबका परम सुहृद् और पक्षपातरहित हूँ । कोई भी प्राणी
मेरा प्रिय अथवा अप्रिय नहीं है । इस भूतसमुदायमेंसे जो कोई भी जीव प्रेमपूर्वक
मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ । अर्थात् वे मेरे प्रियतम
हैं, मैं उनका प्रियतम हूँ । वे मुझे सर्वस्व समर्पण कर
देते हैं और मैं भी अपना सर्वस्व तथा अपने-आपको भी उनपर निछावर कर देता हूँ ।
मेरी-उनकी इतनी घनिष्ठता है कि मैं और वे दोनों ही एक हो जाते हैं ।
‘तस्मिस्तज्जने भेदाभावात’; ‘यतस्तदीयाः’
(नारदभक्तिसूत्र
४१।७३)
‘वे मुझे स्वामी समझते हैं, उन्हें
मैं सेवक समझता हूँ । वे मुझे
पिता समझते हैं तो मैं उन्हें पुत्र समझता हूँ । पुत्र माननेवालोंको पिता, मित्र
समझनेवालोंको मित्र और प्रियतम समझनेवालोंको प्रियतम समझता हूँ । जो मेरे लिये व्याकुल होते हैं, उनके लिये मैं भी अधीर हो
उठता हूँ । जो मेरे बिना नहीं रह सकते, उनके बिना मैं भी नहीं रह सकता । जो
जिस भावसे मुझे भजते हैं, मैं भी उसी भावसे उनको भजता हूँ ।’
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।
(४/११)
भाव ही नहीं,
क्रियामें भी जो मेरी ओर तेजीसे दौड़ते हैं, मैं भी उनकी ओर तीव्र गतिसे दौड़ता हूँ
। यहाँ यह बात ध्यान देनेयोग्य है कि अल्पशक्तिमान् जीवकी क्रिया अपनी शक्तिके
अनुसार होगी और अनन्त शक्तिसम्पन्न परमात्माकी उनकी शक्तिके अनुसार । अर्थात्
अल्पशक्ति रखनेवाला जीव यदि अपनी पूरी शक्ति लगाकर कुछ भी आगे बढ़ा तो भगवान् भी
अपनी पूरी शक्ति लगा शीघ्र ही उससे आ मिलेंगे । भगवान्को
पूरी शक्तिसे अपनी ओर आकर्षित करनेका सरल उपाय है–उनकी ओर अपनी पूरी शक्तिसे
अग्रसर होना । भक्तोंका ऐसा विलक्षण भाव है कि वे चेष्टारहित परमात्मासे भी
चेष्टा करवा देते हैं । सर्वदेशी व्यापक और निराकार परमेश्वरको एक देशमें प्रकट
करके देख लेते हैं । निर्गुणको सगुणरूपमें प्रकट होनेके लिये बाध्य कर देते हैं ।
जो सर्वथा उदासीन हैं, उन परमात्माको भी वे अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं । वे
प्रभुके प्यारे भक्त जिस समय जैसे रूपमें उन्हें देखना चाहते हैं, उस समय भगवान्को
उसी रूपमें दर्शन देना पड़ता है ।
|