Jul
29
मनकी हलचलका कारण क्या है ?
जब मनमें हलचल होने लगे तभी यह विचार करना
चाहिये कि इसका कारण क्या है ? गहराईसे विचार करनेपर पता लगेगा कि अपनी मनचाहीका न
होना और अनचाहीका हो जाना‒यही मनकी हलचलका कारण है ।
भक्तियोगकी
दृष्टिसे शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि तथा मैंपन अपना नहीं है; अपितु सब
कुछ भगवान्का है । इनको अपना और अपनेको भगवान्से अलग मानना, इस विपरीत मान्यतासे
ही मनमें दुःख और हलचल होती है । हलचल होनेका
और कोई कारण नहीं है । जो कुछ होता है वह हमारे
परमसुहृद् प्रभुका मंगलमय विधान है, यह सोचकर प्रसन्न होना चाहिये; उलटे मनको मैला
करना सर्वथा नासमझी ही है ।
ज्ञानयोगकी दृष्टिसे शरीर, प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि
तथा मैंपन सब कुछ प्रकृतिका है । मैंका आधार परमात्मतत्त्व है, वह अपना स्वरूप ही
है । प्रकृति ही प्रकृतिके गुणोंमें बर्त रही है (गीता
१३/२९), स्वरूप तो अपने आपमें स्थित है ही । उसमें क्रिया करना-कराना सम्भव ही
नहीं है । तब फिर हलचल कैसी ?
कर्मयोगकी दृष्टिसे शरीर, प्राण, मन और बुद्धि तथा मैंपन‒यह
सब कुछ अपना नहीं, संसारका है और इनको संसारकी सेवामें ही लगाना है । अपने लिये इनकी
आवश्यकता नहीं है । इनको अपना तथा अपने लिये माननेसे ही
दुःख आता है और हलचल होती है । यह मान्यता‒यह भूल मिट गयी, फिर दुःख और
हलचल कैसे रह सकती है ?
ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, पुरुषार्थवाद और
प्रारब्धवाद इन सबका तात्पर्य मनकी चिन्ताको मिटानेमें ही है, कर्तव्यकर्मको छुड़ा
देनेमें बिलकुल नहीं है ।
उपर्युक्त दृष्टियोंसे यह बात सिद्ध होती है कि शरीर आदिको चाहे तो भगवान्का,
चाहे प्रकृतिका और चाहे संसारका मान लो । ‘ये अपने नहीं
है’‒इस नित्य-सिद्ध बातको न मानकर अपना मानना भूल और बेसमझी है । यही दुःखोंका और
हलचलका कारण है । भूल मिटनेके बाद हलचलके लिये किंचिन्मात्र भी स्थान नहीं है ।
फिर तो केवल आनन्द-ही-आनन्द है ।
नारायण ! नारायण
!! नारायण !!!
‒
‘जीवनोपयोगी कल्याण-मार्ग’ पुस्तकसे
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