Apr
27
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि–
वैशाख शुक्ल चतुर्थी, वि.सं.२०७७ सोमवार
उद्देश्यकी महत्ता



हमें केवल परमात्माको प्राप्त करना है–यह उद्देश्य ऐसा है, जो अकेला पन्द्रह आना कीमत रखता है । भाव तो बदलता रहता है । कभी अच्छा भाव होता है, कभी खराव भाव होता है । कभी सात्त्विक भाव होता है, कभी राजस अथवा तामस भाव होता है । परन्तु उद्देश्य कभी नहीं बदलता । अगर बदलता है तो अभी उद्देश्य बना ही नहीं है अथवा अपने वास्तविक उद्देश्यको पहचाना ही नहीं है ।

उद्देश्य मनुष्यकी प्रतिष्ठा है । जिसका कोई उद्देश्य नहीं है, वह वास्तवमें मनुष्य ही नहीं है । वर्तमानमें अनेक बड़े-बड़े स्कूल और कालेज हैं, जिनमें लाखों विद्यार्थी पढ़ते हैं; परन्तु विद्यार्थीको क्यों पढ़ाया जाता है ? पढ़ाई क्यों करनी चाहिये ?–इसका अभीतक कोई एक उद्देश्य नहीं बना है । यह कितने आश्चर्यकी बात है कि पढ़ाई करते हैं, पर अपने उद्देश्यको जानते ही नहीं !


वास्तवमें उद्देश्य बनानेकी अपेक्षा उद्देश्यको पहचानना श्रेष्ठ है । यह मनुष्यशरीर हमने अपनी इच्छासे नहीं लिया है । भगवान्‌ने अपनी प्राप्तिके उद्देश्यसे ही यह मनुष्यशरीर दिया है । इस उद्देश्यके कारण ही मनुष्यशरीरकी महिमा है, अन्यथा पञ्चमहाभूतोंसे बने हुए इस शरीरकी कोई महिमा नहीं है । शरीर तो मल-मूत्र बनानेकी एक फैक्ट्री है । भगवान्‌के भोग लगी हुई बढ़िया-से-बढ़िया मिठाई इस मशीनमें दे दो तो वह विष्ठा बन जायगी ! गंगाजी, यमुनाजीका महान् पवित्र जल इस फैक्टीमें दे दो तो वह मूत्र बन जायगा । जो ऐसी गन्दी-से-गन्दी चीज पैदा करनेकी मशीन है, उस शरीरकी कोई महिमा नहीं है । महिमा वास्तवमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके उद्देश्यकी है । यह उद्देश्य ही वास्तवमें मनुष्यता है । अतः भगवान्‌ने जिस उद्देश्यसे जीवको मनुष्यशरीर दिया है, उस उद्देश्यको पहचानना है । तात्पर्य यह हुआ कि उद्देश्य पहले बना है, शरीर पीछे मिला है । जैसे, बद्रीनारायण जानेका उद्देश्य पहले बनता है, यात्रा पीछे होती है । अतः उद्देश्यको पहचानना है, बनाना नहीं है । उस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये भगवान्‌ने मनुष्यमात्रको योग्यता दी है, अधिकार दिया है, विवेक दिया है । अतः मनुष्यमात्र परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका अधिकारी है । धनके सब अधिकारी नहीं हैं, मान-बड़ाईके सब बराबर अधिकारी नहीं हैं, निरोगताके सब बराबर अधिकारी नहीं हैं, सौ वर्षतक जीनेके सब बराबर अधिकारी नहीं हैं; परन्तु परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके सब-के-सब बराबर अधिकारी हैं ! जो बिलकुल अपढ़ है, जिसमें न विवेक-वैराग्य है, न षट्‌सम्पत्ति है, न मुमुक्षुता है, न श्रवण-मनन-निदिध्यासन है, पर परमात्मतत्त्वको जाननेकी तीव्र जिज्ञासा है अथवा जो संसारसे ऊब गया है, जिसको संसार दुःखरूप दिखता है, वह भी परमात्मतत्त्वको जान सकता है ! इसीलिये भगवान्‌ने कहा है–‘श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्’ (गीता २/२९) ‘इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता ।’  तात्पर्य है कि पढ़ाई करके, उद्योग करके, परिश्रम करके कोई इस तत्त्वको जान जाय–यह असम्भव बात है । जैसे, करोड़पति आदमीके पास कस्तूरी नहीं मिलती; क्योंकि उसने खरीदी ही नहीं । परन्तु जंगली आदमीके पास कस्तूरी मिल जाती है; क्योंकि उसने कस्तूरीमृगसे कस्तूरी निकाल ली । ऐसे ही तत्त्वकी प्राप्ति साधारण-से-साधारण आदमीको भी (तीव्र जिज्ञासा होनेपर) बहुत सुगमतासे हो सकती है ।