Listen सम्बन्ध‒पीछेके दो श्लोकोंमें पक्षान्तरकी बात कहकर
अब भगवान् आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं । सूक्ष्म विषय‒शरीरोंकी अनित्यताका वर्णन । अव्यक्तादीनि
भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना
॥ २८ ॥ अर्थ‒हे भारत ! सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट
हो जायँगे, केवल बीचमें ही प्रकट दीखते हैं । अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है ?
व्याख्या‒‘अव्यक्तादीनि भूतानि’‒देखने, सुनने और समझनेमें आनेवाले जितने भी प्राणी (शरीर आदि) हैं,
वे सब-के-सब जन्मसे पहले अप्रकट थे अर्थात् दीखते नहीं थे । ‘अव्यक्तनिधनान्येव’‒ये सभी प्राणी मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे अर्थात् इनका नाश
होनेपर ये सभी ‘नहीं’ में चले जायँगे, दीखेंगे नहीं । ‘व्यक्तमध्यानि’‒ये सभी प्राणी बीचमें अर्थात् जन्मके बाद और मृत्युके पहले प्रकट
दिखायी देते हैं । जैसे सोनेसे पहले भी स्वप्न नहीं था और जगनेपर भी स्वप्न नहीं
रहा,
ऐसे ही इन प्राणियोंके शरीरोंका पहले भी अभाव था और पीछे भी
अभाव रहेगा । परन्तु बीचमें भावरूपसे दीखते हुए भी वास्तवमें इनका प्रतिक्षण अभाव हो
रहा है । ‘तत्र का परिदेवना’‒जो आदि और अन्तमें नहीं होता, वह बीचमें भी नहीं होता‒यह सिद्धान्त है१ । १.आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । (माण्डूक्यकारिका ४ । ३१) सभी प्राणियोंके शरीर पहले नहीं थे और पीछे नहीं रहेंगे;
अतः वास्तवमें वे बीचमें भी नहीं हैं । परन्तु यह शरीरी पहले
भी था और पीछे भी रहेगा; अतः वह बीचमें भी रहेगा ही । निष्कर्ष यह निकला कि शरीरोंका
सदा अभाव है और शरीरीका कभी भी अभाव नहीं है । इसलिये इन दोनोंके लिये शोक नहीं हो
सकता । परिशिष्ट भाव‒जो आदि और अन्तमें नहीं है, उसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है तथा जो आदि और अन्तमें है,
उसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है२ । जिसका ‘नहीं’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘असत्’
(शरीर) है और जिसका ‘है’-पना नित्य-निरन्तर है, वह ‘सत्’
(शरीरी) है । असत्के साथ हमारा
नित्यवियोग है और सत्के साथ हमारा नित्ययोग है । २ .(क) यस्तु यस्यादिरन्तश्च स वै मध्यं च
तस्य सन् । (श्रीमद्भा॰ ११ । २४ । १७) ‘जिसके आदि और अन्तमें जो है, वही बीचमें भी है और वही सत्य है ।’ (ख) आद्यन्तयोरस्य यदेव केवलं कालश्च हेतुश्च
तदेव मध्ये ॥ (श्रीमद्भा॰ ११ । २८ । १८) ‘इस संसारके आदिमें जो था तथा अन्तमें
जो रहेगा, जो इसका मूल कारण और प्रकाशक है, वही परमात्मा बीचमें भी है ।’ (ग) न यत् पुरस्तादुत यन्न पश्चान्मध्ये
च तन्न व्यपदेशमात्रम् । (श्रीमद्भा॰ ११ । २८ । २१) ‘जो उत्पत्तिसे पहले नहीं था और प्रलयके
बाद भी नहीं रहेगा, ऐसा समझना चाहिये कि बीचमें भी वह है नहीं, केवल कल्पनामात्र, नाममात्र ही है ।’
गीता-प्रबोधनी व्याख्या‒शरीरी स्वयं अविनाशी है, शरीर विनाशी है । स्थूलदृष्टिसे केवल
शरीरोंको ही देखें तो वे जन्मसे पहले भी हमारे साथ नहीं थे और मरनेके बाद भी वे हमारे
साथ नहीं रहेंगे । वर्तमानमें वे हमारे साथ मिले हुए-से दीखते हैं, पर वास्तवमें हमारा उनसे प्रतिक्षण
वियोग हो रहा है । इस तरह मिले हुए और बिछुड़नेवाले प्राणियोंके लिये शोक करनेसे क्या
लाभ ? രരരരരരരരരര |
May
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