Dec
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(शेष आगेके ब्लॉगमें)
बुद्धिके हम नहीं हैं, हमारी बुद्धि है । हमारी बुद्धि है;अत: इसको हम काममें लें या न लें । परन्तु हम बुद्धिके होते तो मुश्किल हो जाती । वृत्तिकी उपेक्षा करो तो आपकी स्वरूपमें स्थिति स्वतःसिद्ध है । परन्तु वृत्तिका निरोध करनेमें बहुत अभ्यास करना पड़ेगा । वृत्तिकी उपेक्षामें कोई अभ्यास नहीं है । गीताका योग क्या है ? ‘समत्वं योग उच्यते’ (२ । ४१) । ‘सम’ नाम परमात्माका है । परमात्मामें स्थित होना गीताका योग है और चित्तवृत्तियोंका निरोध करना योगदर्शनका योग है । आप कहते हैं कि मन नहीं रुकता ! पर मन रोकनेकी आवश्यकता नहीं है । आवश्यकता है परमात्मामें स्थित होनेकी । जहाँ आप चुप होते हैं, वहाँ आप परमात्मामें ही हैं और परमात्मामें ही रहोगे; क्योंकि कोई भी क्रिया, वृत्ति, पदार्थ, घटना,परिस्थिति परमात्माको छोड़कर हो सकती है क्या ? वस्तु,व्यक्ति, पदार्थ, घटना आदिकी उपेक्षा कर दो तो परमात्मामें ही स्थिति होगी । हाँ, इसमें नींद-आलस्य नहीं होना चाहिये । नींदमें तो अज्ञान (अविद्या) में डूब जाओगे । नींद खुलनेपर कहते हैं कि ‘मेरेको कुछ पता नहीं था’, पर आप तो उस समय थे ही । अत: नींद-आलस्य तो हो नहीं और चलते-फिरते भी आप चुप हो जायँ, कुछ भी चिन्तन न करें । यह गीताका योग है । इससे बहुत जल्दी सिद्धि होगी । योगदर्शनके योगमें बहुत समय लगेगा । आप परमात्मामें वृत्ति लगाओगे तो वृत्ति आपका पिण्ड नहीं छोड़ेगी, वृत्ति साथ रहेगी । इसलिये मन-बुद्धिकी उपेक्षा करो, उनसे उदासीन हो जाओ । अभी लाभ मत देखो कि हुआ तो कुछ नहीं ! आप इसकी उपेक्षा कर दो । दवाईका सेवन करो तो वह गुण करेगी ही ।
आप खयाल करें । बुद्धि करण है और मैं कर्ता हूँ; बुद्धि मेरी है, मैं बुद्धिका नहीं हूँ‒यह सम्बन्ध-विच्छेद बहुत कामकी चीज है । आप बुद्धि हो ही नहीं । कुत्ता चिन्तन करता है तो आपपर क्या असर पड़ता है ? कुत्तेकी बुद्धिके साथ अपना जैसा सम्बन्ध है, वैसा ही अपनी बुद्धिके साथ सम्बन्ध है । आपकी आत्मा सर्वव्यापी है तो कुत्तेमें भी आपकी आत्मा है । फिर आप कुत्तेके मन-बुद्धिकी चिन्ता क्यों नहीं करते ? कि कुत्तेके मन-बुद्धिको आपने अपना नहीं माना । तात्पर्य यह हुआ कि मन-बुद्धिको अपना मानना ही गलती है ।
जो अलग होता है, वह पहलेसे ही अलग होता है ।सूर्यसे प्रकाशको कोई अलग कर सकता है क्या ? आप शरीरसे अलग होते हैं तो पहलेसे ही आप शरीरसे अलग हैं । आप मुफ्तमें ही अपनेको शरीरके साथ मानते हैं । शरीरमें आप नहीं हो और आपमें शरीर नहीं है । खुद जड़तामें बैठ गये तो अहंता हो गयी और जड़ताको अपनेमें बैठा लिया तो ममता हो गयी । अहंता-ममतासे रहित हुए तो शान्ति स्वतःसिद्ध है‒‘निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति’(गीता २ । ७१) ।
नारायण ! नारायण !! नारायण !!!
‒ ‘सत्संगका प्रसाद’ पुस्तकसे
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