Sep
27
प्रवचन- २
भगवान् शंकरने ‘राम’ नामके प्रभावसे काशीमें मुक्तिका क्षेत्र खोल दिया और इसी महामन्त्रके
जपसे ईशसे ‘महेश’ हो गये । अब आगे गोस्वामीजी महाराज कहते हैं‒
महिमा जासु जान गनराऊ ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥
(मानस, बालकाण्ड,
दोहा १९ । ४)
सम्पूर्ण त्रिलोकीकी प्रदक्षिणा करके जो सबसे पहले आ जाय,
वही सबसे पहले पूजनीय हो‒देवताओंमें ऐसी शर्त होनेसे गणेशजी
निराश हो गये, पर नारदजीके कहनेसे गणेशजीने
‘राम’
नाम पृथ्वीपर लिखकर उसकी परिक्रमा कर ली । इस कारण उनकी सबसे
पहले परिक्रमा मानी गयी । नामकी ऐसी महिमा जाननेसे गणेशजी सर्वप्रथम पूजनीय हो गये
। आगे गोस्वामीजी कहते हैं‒
जान आदिकबि नाम प्रतापू ।
भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥
(मानस, बालकाण्ड,
दोहा १९ । ५)
सबसे पहले श्रीवाल्मीकिजीने ‘रामायण’ लिखी है, इसलिये वे ‘आदिकवि’ माने जाते हैं । उलटा नाम ( मरा-मरा) जप करके वाल्मीकिजी एकदम
शुद्ध हो गये । उनके विषयमें ऐसी बात सुनी है कि वे लुटेरे थे । रास्तेमें जो कोई मिलता,
उसको लूट लेते और मार भी देते । एक बार संयोगवश देवर्षि नारद
उधर आ गये । उनको भी लूटना चाहा तो देवर्षिने कहा‒‘तुम क्यों लूट-मार करते हो ? यह
तो बड़ा पाप है ।’ वह बोला‒‘मैं अकेला थोड़े ही हूँ,
घरवाले सभी मेरी कमाई खाते हैं । सभी पापके भागीदार बनेंगे ।’
देवर्षिने कहा‒‘भाई,
पाप करनेवालेको ही पाप लगता है । सुखके,
पुण्यके, धनके भागी बननेको तो सभी तैयार हो जाते हैं;
परंतु बदलेमें कोई भी पापका भागी बननेके लिये तैयार नहीं होगा
। तू अपने माँ-बाप, स्त्री-बच्चोंसे पूछ तो आ ।’
वह अपने घर गया । उसके पूछनेपर माँ बोली‒‘तेरेको पाल-पोसकर बड़ा
किया, अब भी तू हमें पाप ही देगा क्या ?’
उसने कहा‒‘माँ ! मैं आप लोंगोंके लिये ही तो पाप करता हूँ ।’
सब घरवाले बोले‒‘हम तो पापके भागीदार नहीं बनेंगे ।’
तब वह जाकर देवर्षिके चरणोंमें गिर गया और बोला‒‘महाराज ! मेरे
पापका कोई भी भागीदार बननेको तैयार नहीं हैं ।’ देवर्षिने कहा‒‘भाई ! तुम भजन करो,
भगवान्का नाम लो’,
परंतु भयंकर पापी होनेके कारण मुँहसे प्रयास करनेपर भी
‘राम’
नाम उच्चारण नहीं कर सका । उसने कहा‒‘यह मरा, मरा, मरा । ऐसा मेरा अभ्यास है,
इसलिये ‘मरा’ तो मैं कह सकता हूँ ।’ देवर्षिने कहा कि ‘अच्छा,
ऐसा ही तुम कहो ।’ तो ‘मरा-मरा’ करने लगा । इस प्रकार उलटा नाम जपनेसे भी वे सिद्ध हो गये,
महात्मा बन गये, आदिकवि बन गये । ‘राम’ नाम महामन्त्र है, उसे ठीक सुलटा जपनेसे तो पुण्य होता ही है, पर उलटे जपसे भी
पुण्य होता है ।
उलटा नामु जपत जगु जाना ।
बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥
(मानस, अयोध्याकाण्ड,
दोहा १९४ । ८)
सहस नाम सम सुनि सिव बानी ।
जपि जेई पिय संग भवानी
॥
(मानस, बालकाण्ड, दोहा १९ । ६)
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे |