Sep
28
‘राम’ नाम सहस्रनामके समान है,
भगवान् शंकरके इस वचनको सुनकर पार्वतीजी सदा उनके साथ ‘राम’ नाम जपती रहती हैं । पद्मपुराणमें एक कथा आती है । पार्वतीजी
सदा ही विष्णुसहस्रनामका पाठ करके ही भोजन किया करतीं । एक दिन भगवान् शंकर बोले‒‘पार्वती ! आओ भोजन करें ।’
तब पार्वतीजी बोलीं‒‘महाराज ! मेरा अभी सहस्रनामका पाठ बाकी है ।’
भगवान् शंकर बोले‒
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥
पद्मपुराणके उस विष्णुसहस्रनाममें यह श्लोक आया है । राम,
राम, राम‒ऐसे तीन बार कहनेसे पूर्णता हो जाती है । ऐसा जो ‘राम’ नाम है, हे वरानने ! हे रमे ! रामे मनोरमे,
मैं सहस्रनामके तुल्य इस ‘राम’ नाममें ही रमण कर रहा हूँ । तुम भी उस
‘राम’
नामका उच्चारण करके भोजन कर लो । हर समय भगवान् शंकर राम,
राम, राम जप करते रहते हैं । पार्वतीजीने भी फिर ‘राम’ नाम ले लिया और भोजन कर लिया ।
नारद-राम-संवाद
अरण्यकाण्डमें ऐसा वर्णन आया है‒श्रीरामजी लक्ष्मणजीके सहित,
सीताजीके वियोगमें घूम रहे थे । वे घूमते-घूमते पम्पा सरोवर
पहुँच गये । तो नारदजीके मनमें बात आयी कि मेरे शापको स्वीकार करके भगवान् स्त्री-वियोगमें
घूम रहे हैं । उन्होंने देखा कि अभी बड़ा सुन्दर मौका है,
एकान्त है । इस समय जाकर पूछें,
बात करें । नारदजीने भगवान्को ऐसा शाप दिया कि आपने मेरा विवाह
नहीं होने दिया तो आप भी स्त्रीके लिये रोते फिरोगे । भगवान्ने शाप स्वीकार कर लिया,
परंतु नारदजीका अहित नहीं होने दिया ।
यहाँ नारदजीने पूछा‒‘महाराज ! उस समय आपने मेरा विवाह क्यों नहीं होने दिया ?’
तो भगवान्ने कहा‒‘भैया ! एक मेरे ज्ञानी भक्त होते हैं और दूसरे छोटे ‘दास’ भक्त होते हैं; परंतु उन दासोंकी, प्यारे भक्तोंकी मैं रखवाली करता हूँ ।’
करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी ।
जिमि बालक राखइ महतारी ॥
मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी ।
बालक सुत सम दास अमानी ॥
(मानस, अरण्यकाण्ड,
दोहा ४३ । ५, ८)
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे |