।। श्रीहरिः ।।




आजकी शुभ तिथि
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, वि.सं.२०७१, शनिवार
तत्त्वज्ञान क्या है ?
(आत्मज्ञान तथा परमात्मज्ञान)



(गत ब्लॉगसे आगेका)

आत्मज्ञान और परमात्मज्ञान एक ही है । कारण कि चिन्मय सत्ता एक ही है, पर जीवकी उपाधिसे अलग-अलग दीखती है । भगवान् कहते हैं‒

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
                                                                   (गीता १५ । ७)

इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा सदासे मेरा ही अंश है ।’

प्रकृतिके अंश अहम्’ को पकडनेके कारण ही यह जीव अंश कहलाता है । अगर यह अहम्‌को न पकड़े तो एक सत्ता-ही-सत्ता है । सत्ता (होनेपन) के सिवाय सब कल्पना है । वह चिन्मय सत्ता सब कल्पनाओंका आधार है, अधिष्ठान है, प्रकाशक है, आश्रय है, जीवनदाता है । उस सत्तामें एकदेशीयपना नहीं है । वह चिन्मय सत्ता सर्वव्यापक है । सम्पूर्ण सृष्टि (क्रियाएँ और पदार्थ) उस सत्ताके अन्तर्गत है । सृष्टि तो उत्पन्न और नष्ट होती रहती है, पर सत्ता ज्यों-की-त्यों रहती है । गीतामें आया है‒

यथा सर्वगतं सौक्ष्मादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥
                                                                          (१३ । ३२)

जैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता ।’

तात्पर्य है कि चिन्मय सत्ता केवल शरीर आदिमें स्थित नहीं है, प्रत्युत आकाशकी तरह सम्पूर्ण शरीरोंके, सृष्टिमात्रके बाहर-भीतर सर्वत्र परिपूर्ण है । वह सर्वव्यापी सत्ता ही हमारा स्वरूप है और वही परमात्मतत्त्व है । तात्पर्य है कि सर्वदेशीय सत्ता एक ही है । साधकका लक्ष्य निरन्तर उस सत्ताकी ओर ही रहना चाहिये ।

प्रश्न‒सत्तामें एकदेशीयता दीखनेमें क्या कारण है ?

उत्तर‒सत्ताको बुद्धिका विषय बनानेसे अथवा मन, बुद्धि और अहम्‌के संस्कार रहनेसे ही सत्तामें एकदेशीयता दीखती है । वास्तविक सत्ता मन-बुद्धि-अहम्‌‌के अधीन नहीं है, प्रत्युत उनको प्रकाशित करनेवाला तथा उनसे अतीत है । सत्तामात्रमें न मन है, न बुद्धि है, न अहम् है ।

   (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘तत्त्वज्ञान कैसे हो ?’ पुस्तकसे