प्रश्न‒यह एकदेशीयता कैसे मिटे ?
उत्तर‒एकदेशीयता मिट जाय‒यह आग्रह भी छोड़कर
सत्तामात्रमें स्थित (चुप) हो जाय । चुप होनेसे मन-बुद्धि-अहम्के संस्कार स्वतः मिट
जायेंगे । जैसे समुद्रमें बर्फके ढेले तैर रहे हों तो उनको गलानेके लिये कुछ करनेकी
जरूरत ही नहीं है, वे तो स्वतः गल जायेंगे । ऐसे ही सत्तामात्रमें शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धि-अहम् आदिकी प्रतीति हो
रही है तो उनको न हटाना है, न रखना है । चुप अर्थात् निर्विकल्प
होनेसे वे स्वतः गल जायेंगे[1] ।
सत्तामात्रको देखें तो वह कभी बद्ध
हुआ ही नहीं, प्रत्युत सदा ही मुक्त है । अगर वह बद्ध होगा तो कभी मुक्त नहीं हो सकता और मुक्त है तो कभी
बद्ध नहीं हो सकता । बन्धनका भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और मुक्तिका अभाव विद्यमान
नहीं है । बन्धनकी केवल मान्यता है । वह मान्यता छोड़ दें तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है ।
मानवमात्र तत्त्वज्ञानका अधिकारी है; क्योंकि सत्तामें सब मनुष्य एक हो जाते हैं । क्रूर-से-क्रूर
भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस आदिमें भी वही सत्ता है और सौम्य-से-सौम्य
सन्त, महात्मा, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त, भगवत्प्रेमी आदिमें भी वही सत्ता है । वह सत्ता परमात्मसत्तासे
सदा अभिन्न है । केवल उस सत्ताके सम्मुख होना है । इसमें क्या अभ्यास है ? क्या परिश्रम है ? क्या कठिनता है ? क्या दुर्लभता है
? क्या परोक्षता है ? सत्तामें न मल है, न विक्षेप है, न आवरण है । अभ्यास तो दृढ़ और अदृढ़ दो तरहका होता है, पर सत्ता दो तरहकी होती ही नहीं । सत्ता और उसका ज्ञान
होता है तो सदा दृढ़ ही होता है, अदृढ़ होता ही नहीं ।
अनुकूल-से-अनुकूल
परिस्थितिमें भी वही सत्ता है, प्रतिकूल-से-प्रतिकूल
परिस्थितिमें भी वही सत्ता है । जीवनमें भी वही सत्ता है, मौतमें
भी वही सत्ता है । अमृतमें भी वही सत्ता है, जहरमें
भी वही सत्ता है । स्वर्गमें भी वही सत्ता है, नरकमें
भी वही सत्ता है । रोगमें भी वही सत्ता है, नीरोगमें
भी वही सत्ता है । विद्यामें भी वही सत्ता है, अविद्यामें
भी वही सत्ता है । ज्ञानीमें भी वही सत्ता है, मूढ़में
भी वही सत्ता है । मित्रमें भी वही सत्ता है, शत्रुमें
भी वही सत्ता है । धनीमें भी वही सत्ता है, निर्धनमें
भी वही सत्ता है । बलवान्में भी वही सत्ता है, निर्बलमें
भी वही सत्ता है ।
[1] ‘एक निर्विकल्प अवस्था होती है और एक
निर्विकल्प बोध होता है । निर्विकल्प अवस्था करण-सापेक्ष होती है और निर्विकल्प बोध
करण-निरपेक्ष होता है । तात्पर्य है कि निर्विकल्प अवस्था मन-बुद्धिकी होती है और निर्विकल्प
बोध मन-बुद्धिसे सम्बन्ध-विच्छेद होनेपर स्वयंसे होता है । निर्विकल्प अवस्थामें निर्विकल्पता
अखण्डरूपसे नहीं रहती, प्रत्युत उससे व्युत्थान होता है ।
परन्तु निर्विकल्प बोधमें निर्विकल्पता अखण्डरूपसे रहती है और उससे कभी व्युत्थान नहीं
होता । निर्विकल्प अवस्थासे भी असंग होनेपर स्वतःसिद्ध निर्विकल्प बोधका अनुभव हो जाता
है ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘तत्त्वज्ञान कैसे हो ?’ पुस्तकसे
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