May
29
(गत ब्लॉगसे आगेका)
जो सत्त्वगुणमें स्थित होते हैं,
वे ऊर्ध्वगतिमें जाते हैं । जो रजोगुणमें स्थित होते हैं,
वे मध्यलोकमें जाते हैं । जो तमोगुणमें स्थित होते हैं,
वे अधोगतिमें जाते हैं‒
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥
(गीता १४ । १८)
इस प्रकार जड़-चेतनके विभागको ठीक तरहसे समझना चाहिये । जड़-अंश
(शरीर) छूट जाता है, हम रह जाते हैं । जबतक मुक्ति नहीं होती,
तबतक जड़ता साथमें रहती है । इसलिये एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें
जानेपर स्थूलशरीर तो छूट जाता है, पर सूक्ष्म और कारणशरीर साथमें रहते हैं । मुक्ति होनेपर केवल
चेतनता रहती है, जड़ता साथमें नहीं रहती अर्थात् स्थूल,
सूक्ष्म और कारण-शरीर साथमें नहीं रहते । परन्तु इसमें एक बहुत
सूक्ष्म बात है कि मुक्ति होनेपर भी जड़ताका संस्कार रहता है । वह संस्कार जन्म-मरण
देनेवाला तो नहीं होता, पर मतभेद करनेवाला होता है । जैसे द्वैत,
अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत और अचिन्त्यभेदाभेद‒ये पाँच मुख्य मतभेद हैं,
जो शैव और वैष्णव आचार्योंमें रहते हैं । जबतक मतभेद है, तबतक
जड़ताका संस्कार है । परन्तु मुक्तिके बाद जब भक्ति होती है, तब
जड़ताका यह सूक्ष्म संस्कार भी मिट जाता है । भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें जड़ता सर्वथा
नहीं रहती, केवल चेतनता रहती है । जैसे, राधाजी सर्वथा चिन्मय हैं ।
मनुष्योंके कल्याणके लिये तीन योग बताये गये हैं‒कर्मयोग,
ज्ञानयोग और भक्तियोग[*] । कर्मयोग जड़को लेकर चलता है,
ज्ञानयोग चेतनको लेकर चलता है और भक्तियोग भगवान्को लेकर चलता
है । कर्मयोग तथा ज्ञानयोग तो लौकिक साधन हैं‒‘लोकेऽस्मिद्विविधा
निष्ठा’ (गीता ३ । ३), पर भक्तियोग अलौकिक निष्ठा है । कारण कि जगत् (क्षर) तथा जीव
(अक्षर)‒दोनों लौकिक हैं‒‘क्षरश्चाक्षर एव च’ (गीता
१५ । १६) । परन्तु भगवान्
क्षर और अक्षर दोनोंसे विलक्षण अर्थात् अलौकिक हैं‒‘उत्तमः
पुरुषस्त्वन्यः’ (गीता १५ । १७) । जिसकी संसारमें ही आसक्ति है,
जो संसारको मुख्य मानते हैं,
जिनका आत्माकी तरफ इतना विचार नहीं है,
पर जो अपना कल्याण चाहते हैं,
उनके लिये कर्मयोग मुख्य है । अपने-अपने
वर्ण-आश्रमके अनुसार निष्कामभावसे अर्थात् केवल दूसरोंके हितके लिये कर्तव्य-कर्म करना
कर्मयोग है । सकामभावमें जड़ता आती है पर निष्कामभावमें चेतनता रहती है । निष्कामभाव
होनेके कारण कर्मयोगी जड़- अंशसे ऊँचा उठ जाता है । अगर निष्कामभाव नहीं हो कर्म होंगे,
कर्मयोग नहीं होगा । कर्मोंसे मनुष्य बंधता है‒‘कर्मणा
बध्यते जन्तुः’ ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे
ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योऽस्ति कुत्रचित्
॥
(श्रीमद्भा॰ ११ । २०। ६)
|