May
28
(गत ब्लॉगसे आगेका)
मन-बुद्धि चेतनमें दीखते हैं,
पर हैं ये जड़ ही । ये चेतनके प्रकाशसे प्रकाशित होते हैं । हम
(स्वयं) शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्धिको जाननेवाले हैं । इन्द्रियोंके दो विभाग
हैं‒कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ । कर्मेन्द्रियाँ तो सर्वथा जड़ हैं और ज्ञानेन्द्रियोंमें
चेतनका आभास है । उस आभासको लेकर ही श्रोत्र,
त्वचा, चक्षु, रसना और प्राण‒ये पाँचों इन्द्रियाँ ‘ज्ञानेन्द्रियाँ’ कहलाती हैं । ज्ञानेन्द्रियोंको लेकर जीवात्मा विषयोंका सेवन
करता है‒
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं
विषयानुपसेवते ॥
(गीता
१५ । ९)
ज्ञानेन्द्रियोंमें और अन्तःकरणमें जो ज्ञान दीखता है,
वह उनका खुदका नहीं है,
प्रत्युत चेतनके द्वारा आया हुआ है । खुद तो वे जड़ ही हैं ।
जैसे दर्पणको सूर्यके सामने कर दिया जाय तो सूर्यका प्रकाश दर्पणमें आ जाता है । उस
प्रकाशको अँधेरी कोठरीमें डाला जाय तो वहाँ प्रकाश हो जाता है । वह प्रकाश मूलमें सूर्यका
है, दर्पणका नहीं । ऐसे ही इन्द्रियोंमें और अन्तःकरणमें चेतनसे प्रकाश आता है । चेतनके
प्रकाशसे प्रकाशित होनेपर भी इन्द्रियाँ और अन्तःकरण जड़ हैं । हम स्वयं चेतन हैं और
परमात्माके अंश हैं । गीतामें भगवान् कहते हैं‒‘ममैवांशो
जीवलोके’ (१५ । ७) । जैसे शरीर माँ और बाप दोनोंसे बना हुआ है,
ऐसे स्वयं प्रकृति और परमात्मा दोनोंसे बना हुआ नहीं है । यह
केवल परमात्माका ही अंश है । भगवान्ने कहा है‒
मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
(गीता
१४ । ३)
तासौ ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
(गीता
१४ । ४)
अर्थात् प्रकृति माता है और मैं उसमें बीज-स्थापन करनेवाला पिता
हूँ, जिससे सम्पूर्ण प्राणी पैदा होते हैं । अतः प्राणियोंमें प्रकृतिका अंश भी है
और परमात्माका भी । परन्तु जो जीवात्मा है, उसमें केवल परमात्माका ही अंश है‒‘ममैवांशः’ (मम एव
अंशः) । देवता,
भूत-प्रेत, पिशाच आदि जितने भी शरीर हैं,
उन सबमें जड़ और चेतन‒दोनों रहते हैं । देवताओंके शरीरमें तैजस-तत्त्वकी
प्रधानता है, भूत-प्रेतोंके शरीरमें वायु-तत्त्वकी प्रधानता है मनुष्योंके
शरीरमें पृथ्वी-तत्त्वकी प्रधानता है, आदि । भिन्न-भिन्न शरीरोंमें भिन्न-भिन्न तत्त्वकी प्रधानता
रहती है । यद्यपि सभी शरीरोंमें मुख्यता चेतनकी ही है,
पर वह शरीरमें मैं-मेरापन करके उसीको मुख्य मान लेता है । जड़ शरीरकी मुख्यता मानना ही जन्म-मरणका कारण है‒‘कारणं
गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु’(गीता १३ ।२१) ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ पुस्तकसे
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