Dec
27
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न‒गुरु कौन हो सकता है ?
उत्तर‒तत्त्वज्ञ जीवन्तुक्त महापुरुष ही गुरु
हो सकता है । अतः जबतक तत्त्वज्ञान न हो, भगवत्प्राप्ति न हो, तबतक अपनेमें गुरुभाव नहीं लाना चाहिये । हाँ, कोई कल्याणकी बात पूछे तो अपनेमें
जितनी जानकारी है, उसको सरलतासे बता देना चाहिये ।
जो जिस विषयमें ज्ञान देता है, अज्ञता दूर करता है,
उस विषयमें वह गुरु हो गया, चाहे नेगचार करें या
न करें । परन्तु असली गुरु वही है, जिसके उपदेशसे बोध हो जाय,
तत्त्वज्ञान हो जाय, फिर कभी किंचिन्मात्र भी गुरुकी
आवश्यकता न रहे । गुरु वही होता है, जो किसीको अपना चेला नहीं बनाता, अपना मातहत नहीं बनाता । जो सबको गुरु बनाता है, वही
वास्तवमें सबका गुरु होता है ।
शास्त्रोंमें जहाँ गुरुका वर्णन आता है, वहाँ कहा गया
है कि गुरुको श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिये । वेदोंको, शास्त्रोंको,
पुराणोंको जाननेवाला ‘श्रोत्रिय’ और ब्रह्मको जाननेवाला ‘ब्रह्मनिष्ठ’
कहलाता है । जो केवल श्रोत्रिय है, ब्रह्मनिष्ठ नहीं है,
वह शास्त्रोंको तो पढ़ा सकता है, पर परमात्मतत्त्वका
बोध नहीं करा सकता । जो केवल ब्रह्मनिष्ठ है, श्रोत्रिय नहीं
है, वह परमात्मतत्त्वका बोध तो करा सकता है, पर अनेक तरहकी शंकाओंका
समाधान करनेमें प्रायः असमर्थ होता है । हाँ, शंकाओंका समाधान न कर सकनेपर भी उसमें
कोई कमी नहीं रहती; कोई शंका, सन्देह नहीं
रहता । अतः कोई शिष्य तर्क-वितर्क न करके तत्त्वको जानना चाहे
तो वह ब्रह्मनिष्ठ उसको परमात्मतत्त्वका बोध करा सकता है ।
प्रश्न‒शिष्य कौन बन सकता है ?
उत्तर‒जिसके भीतर आराम आदिकी इच्छा
बिलकुल नहीं है, जीनेकी इच्छा भी नहीं है, प्रत्युत जिसके
भीतर केवल मुक्तिकी इच्छा है, वही शिष्य बन सकता है । अपनी कामना
रखकर कोई भी शिष्य नहीं बन सकता । जो कामनाका गुलाम है, वह किसीका शिष्य बन ही कैसे सकता है ?
वास्तवमें गुरु भी मौजूद है, भगवान् भी मौजूद हैं, जिज्ञासा भी मौजूद
है, योग्यता भी मौजूद है, पर नाशवान्की आसक्तिके कारण उनके प्रकट होनेमें बाधा लग रही
है । नाशवान्की आसक्तिको मिटाना साधकका काम है; क्योंकि उसीने आसक्ति की है । इसीलिये कहा है कि अपने द्वारा अपना उद्धार करे‒‘उद्धरेदात्मनात्मानम्’
(गीता ६ । ५) ।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘सच्चा गुरु कौन ?’ पुस्तकसे
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