Dec
28
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न‒गुरु बनानेकी जो प्रथा है, वह क्या है ?
उत्तर‒गुरु बनानेकी प्रथा एक साम्प्रदायिक
चीज है । जहाँ साम्प्रदायिकता होती है, वहाँ बोध
होनेकी गुंजाइश नहीं होती, तत्त्वप्राप्तिकी सम्भावना नहीं होती
। कारण कि सम्प्रदायका आग्रह होनेसे बोध नहीं होता और जहाँ बोध होता है, वहाँ किसी सम्प्रदायका
आग्रह नहीं रहता ।
यदि भीतरमें जोरदार लालसा हो तो भीतरका आग्रह जल जाता
है और बोध हो जाता है । परन्तु वह बोध किस तरीकेसे होगा, इसको कोई
बता नहीं सकता; क्योंकि भगवान्के सिखानेके अनेक तरीके हैं, जिसको भगवान् ही जानते हैं ।
प्रश्न‒जब साम्प्रदायिकतासे बोध नहीं होता, तो फिर सम्प्रदाय क्यों बने हैं ?
उत्तर‒जो आदमी लोगोंकी दृष्टिमें बड़े हो गये, जिनको लोगोंने बड़ा
मान लिया और आगे उन लोगोंके अनुयायी भी वैसे ही हुए, उनके सिद्धान्तोंको
लेकर सम्प्रदाय चल पड़े ।
जो वेदोंको, शास्त्रोंको, भगवान्को, भगवान्के अवतारोंको मानते
हैं, ऐसे कई सम्प्रदाय हैं; परन्तु उन सम्प्रदायोंमें
कौन कहाँतक पहुँचा है, इसको कौन जाने ? अतः जो मनुष्य अपना उद्धार चाहता है, उसे चाहिये कि वह केवल अपने उद्धारका ही आग्रह
रखे, सम्प्रदायका आग्रह न रखे ।
कोई सम्प्रदाय वैदिक है, शास्त्रसम्मत है तो
यह अच्छी बात है, पर उस सम्प्रदायमें आनेसे कल्याण हो जाय,
यह कोई नियम नहीं है, कायदा नहीं है । तात्पर्य
है कि कल्याणकी बात व्यक्तिगत है, अपनी लगनके अधीन है, किसी
सम्प्रदायके अधीन नहीं है । अतः मनुष्यको किसी सम्प्रदायका आग्रह नहीं रखना चाहिये;
क्योंकि कल्याण जोरदार लगन होनेसे ही होता है ।
प्रश्न‒‘गुरु गोविन्द दोनों खडे, काके लागूँ
पाय । बलिहारी गुरुदेवकी, गोविन्द दियो बताय ॥‒ऐसा कहनेका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर‒गुरुके द्वारा ईश्वरका साक्षात्कार
हो जाय, तब तो गुरुकी बलिहारी
है; क्योंकि उन्होंने भगवान्के दर्शन करा
दिये । अगर उन्होंने दर्शन नहीं कराये तो ऐसा कहना एक तरहका
धोखा है ।
जैसे, पूछा जाय कि ‘बाप पहले पैदा होता है या
बेटा ?’ तो प्रायः यही उत्तर दिया जाता है कि पहले बाप पैदा होता
है, फिर बेटा । परन्तु वास्तवमें देखा जाय तो बेटा पैदा होनेसे ही उसकी बाप संज्ञा
होती है । अगर बेटा न हो तो उसकी बाप संज्ञा सिद्ध नहीं होती । ऐसे ही शिष्यको बोध,
ईश्वर-साक्षात्कार होनेसे ही उसकी गुरु संज्ञा
सिद्ध होती है ।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘सच्चा गुरु कौन ?’ पुस्तकसे
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