Jul
29
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न‒भौजाई और
देवरका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये ?
उत्तर‒भौजाई सीताजीकी
तरह और देवर भरतकी तरह व्यवहार करे । सीताजी भरतको पुत्रकी तरह समझती थीं । कैकयीने
बिना कारण रामजीको वनमें भेज दिया, पर सीताजीने कभी भी भरतपर दोषारोपण
नहीं किया, भरतका निरादर
नहीं किया, प्रत्युत चित्रकूटमें
जब भरतजीने सीताजीकी चरण-रजको अपने सिरपर चढ़ाया, तब सीताजीने उन्हें आशीर्वाद दिया !
ऐसे ही भौजाईको चाहिये कि देवर कितना ही निरादर, अपमान करे, पर वह अपना मातृभाव, हितैषीभाव कभी
न छोड़े और देवरको चाहिये कि भौजाईका माँकी तरह आदर करे । यद्यपि सीताजी अवस्थामें उतनी
बड़ी नहीं थीं, फिर भी भरत, लक्ष्मण आदिका
सीताजीमें मातृभाव था ।
प्रश्न‒बहनोई और
सालेका आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये ?
उत्तर‒बहनोईका यह भाव
होना चाहिये कि जैसे मेरेको मेरी स्त्री प्यारी लगती है, ऐसे ही मेरी स्त्रीका
प्यारा भाई होनेसे साला प्यारका पात्र है । इनके घरसे समय-समयपर कुछ-न-कुछ मिलता ही
रहता है; अतः लौकिक दृष्टिसे
देखा जाय तो भी फायदा-ही-फायदा है । पारमार्थिक भावमें तो त्यागकी मुख्यता है ही ।
सालेका यह भाव
होना चाहिये कि ये मेरी बहनके ही आदरणीय हैं; अतः ये मेरे भी आदरके पात्र हैं । जैसे
बहन और बेटीको देनेका माहात्म्य है, ऐसे ही बहनका अंग होनेसे बहनोईको भी
देनेका माहात्म्य है । ये प्यारके, दानके पात्र हैं; अतः हृदयसे आदर
करते हुए इनको देते रहना चाहिये ।
प्रश्न‒भाई और बहनका
आपसमें कैसा व्यवहार होना चाहिये ?
उत्तर‒प्रायः भाईकी
तरफसे ही गलती होती है । बहनकी तरफसे कम गलती होती है । अतः भाईका यह भाव रहना चाहिये कि यह सुआसिनी है, दयाकी मूर्ति है, इसका
ज्यादा आदर, प्यार करना है । ब्राह्मणको भोजन करानेका
जैसा पुण्य होता है, वैसा ही पुण्य
बहन-बेटीको देनेका होता है ।
सरकारने पिताकी
सम्पत्तिमें बहनके हिस्सेका जो कानून बनाया है, उससे भाई-बहनमें लड़ाई हो सकती है, मनमुटाव
होना तो बहुत मामूली बात है । वह जब अपना हिस्सा माँगेगी, तब बहन-भाईमें
प्रेम नहीं रहेगा । हिस्सा पानेके लिये जब भाई-भाईमें भी खटपट हो जाती है, तो फिर भाई-बहनमें
खटपट हो जाय, इसमें कहना ही
क्या है ! अतः इसमें बहनोंको हमारी पुरानी रिवाज (पिताकी
सम्पत्तिका हिस्सा न लेना) ही पकड़नी चाहिये, जो
कि धार्मिक और शुद्ध है । धन आदि पदार्थ कोई महत्त्वकी वस्तुएँ नहीं हैं । ये तो केवल
व्यवहारके लिये ही हैं । व्यवहार भी प्रेमको महत्त्व देनेसे ही अच्छा होगा, धनको
महत्त्व देनेसे नहीं । धन आदि पदार्थोंका महत्त्व वर्तमानमें कलह करानेवाला और परिणाममें
नरकोंमें ले जानेवाला है । इसमें मनुष्यता नहीं है । जैसे, कुत्ते आपसमें
बड़े प्रेमसे खेलते हैं, पर उनका खेल तभीतक है जबतक उनके सामने रोटी नहीं आती ।
रोटी सामने आते ही उनके बीच लड़ाई शुरू हो जाती है ! अगर मनुष्य भी ऐसा ही करे तो फिर
उसमें मनुष्यता क्या रही ?
धर्मको, अपने
कर्तव्यको, भगवान् और ऋषियोंकी आज्ञाको और त्यागको
महत्त्व देनेसे लोक-परलोक स्वतःसिद्ध हो जाते हैं । परन्तु मान, बड़ाई, स्वार्थ
आदिको महत्त्व देनेसे लोक-परलोक दोनों बिगड़ जाते हैं ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गृहस्थमें कैसे रहें ?’ पुस्तकसे
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