Jul
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न‒गृहस्थको
अतिथिके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये ?
उत्तर‒अतिथिका अर्थ
हैं‒जिसके आनेकी कोई तिथि, निश्चित समय न हो । अतिथि-सेवाकी मुख्यता गृहस्थ-आश्रममें
ही है । दो नम्बरमें इसकी मुख्यता वानप्रस्थ-आश्रममें है । ब्रह्मचारी और संन्यासीके
लिये इसकी मुख्यता नहीं है ।
जब ब्रह्मचारी
स्नातक बनता है अर्थात् ब्रह्मचर्य-आश्रमके नियमोंका पालन करके दूसरे आश्रममें जानेकी
तैयारी करता है तब उसको यह दीक्षान्त उपदेश दिया जाता है‒‘मातृदेवो
भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव ।’ (तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षा॰ ११
। २) अर्थात् माता, पिता, आचार्य और अतिथिको
ईश्वर समझकर उनकी सेवा करो । गृहस्थ-आश्रममें जानेवालोंके लिये ये खास नियम हैं । अतः
गृहस्थको अतिथिका यथायोग्य आदर-सत्कार करना चाहिये ।
अतिथि-सेवामें
आसन देना, भोजन कराना, जल पिलाना आदि
बहुत-सी बातें हैं, पर मुख्य बात अन्न देना ही है । जब रसोई बन जाय, तब पहले विधिसहित
बलिवैश्वदेव करे । बलिवैश्वदेव करनेका अर्थ है‒विश्वमात्रको भोजन अर्पित करना । फिर
भगवान्को भोग लगाये । फिर कोई अतिथि, भिक्षुक आ जाय तो उसको भोजन कराये ।
भिक्षुक छः प्रकारके कहे गये हैं‒
ब्रह्मचारी यतिश्चैव विद्यार्थी गुरुपोषकः ।
अध्वगः
क्षीणवृत्तिश्च षडेते भिक्षुकाः स्मृताः ॥
‘ब्रह्मचारी, साधु-संन्यासी, विद्याध्ययन करनेवाला, गुरुकी सेवा करनेवाला, मार्गमें चलनेवाला और क्षीणवृत्ति-वाला (जिसके घरमें आग लगी हो; चोर-डाकू सब कुछ ले गये हों, कोई जीविका न
रही हो आदि)‒ये छः भिक्षुक कहे जाते हैं’; अतः इन छहोंको
अन्न देना चाहिये ।
यदि बलिवैश्वदेव
करनेसे पहले ही अतिथि, भिक्षुक आ जाय तो ? समय हो तो बलिवैश्वदेव कर ले, नहीं तो पहले
ही भिक्षुकको अन्न दे देना चाहिये । ब्रह्मचारी और संन्यासी तो बनी हुई रसोईके मालिक
हैं । इनको अन्न न देकर पहले भोजन कर ले तो पाप लगता है, जिसकी शुद्धि
चान्द्रायणव्रत[*] करनेसे होती है
। अतिथि घरपर आकर खाली हाथ लौट जाय तो वह घरके मालिकका पुण्य
ले जाता है और अपने पाप दे जाता है । अतः अतिथिको अन्न जरूर देना चाहिये ।
गृहस्थको भीतरसे
तो अतिथिको परमात्माका स्वरूप मानना चाहिये और उसका आदर करना चाहिये, उसको अन्न-जल
देना चाहिये, पर बाहरसे सावधान
रहना चाहिये अर्थात् उसको घरका भेद नहीं देना चाहिये, घरको दिखाना नहीं
चाहिये आदि । तात्पर्य है कि भीतरसे आदर करते हुए भी उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि आजकल
अतिथिके वेशमें न जाने कौन आ जाय !
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गृहस्थमें कैसे रहें ?’ पुस्तकसे
[*] चान्द्रायणव्रतकी
विधि इस प्रकार है‒अमावस्याके बाद प्रतिपदाको एक ग्रास, द्वितीयाको दो
ग्रास‒इस क्रमसे एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पूर्णिमाको पन्द्रह ग्रास अन्न ग्रहण करे ।
फिर पूर्णिमाके बाद प्रतिपदासे एक-एक ग्रास कम करे अर्थात् प्रतिपदाको चौदह, द्वितीयाको तेरह
आदि । तात्पर्य है कि चन्द्रमाकी कला बढ़ते समय ग्रास बढ़ाना और कला घटते समय ग्रास घटाना
‘चान्द्रायणव्रत’ है । ग्रासके सिवाय और कुछ भी नहीं लेना चाहिये ।
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