Sep
30
।। श्रीहरिः ।।


आजकी शुभ तिथि
आश्विन अमावस्या, वि.सं.२०७३, शुक्रवार
अमावस्या श्राद्ध, पितृविसर्जन
गीतामें भगवन्नाम


(गत ब्लॉगसे आगेका)

अगर भगवन्नाममें अनन्यभाव हो और नामजप निरन्तर चलता रहे तो उससे वास्तविक लाभ हो ही जाता है; क्योंकि भगवान्‌का नाम सांसारिक नामोंकी तरह नहीं है । भगवान् चिन्मय है; अतः उनका नाम भी चिन्मय (चेतन) है । राजस्थानमें बुधारामजी नामक एक सन्त हुए हैं । वे जब नामजपमें लगे, तब उनकी नामजपके बिना थोड़ा भी समय खाली जाना सुहाता नहीं था । जब भोजन तैयार हो जाता, तब माँ उनको भोजनके लिये बुलाती और वे भोजन करके पुनः नामजपमें लग जाते । एक दिन उन्होंने माँसे कहा कि माँ ! रोटी खानेमें बहुत समय लगता है; अतः केवल दलिया बनाकर थालीमें परोस दिया कर और जब वह थोड़ा ठण्डा हो जाया करे, तब मेरेको बुलाया कर माँने वैसा ही किया । एक दिन फिर उन्होंने कहा कि माँ ! दलिया खानेमें भी समय लगता है; अतः केवल राबड़ी बना दिया कर और जब वह ठण्डी हो जाया करे, तब बुलाया कर । इस तरह लगनसे नाम-जप किया जाय तो उससे वास्तविक लाभ होता ही है ।

शंका‒अगर श्रद्धा-विश्वासपूर्वक किये हुए नामजपसे ही लाभ होता है, तो फिर नामकी महिमा क्या हुई ? महिमा तो श्रद्धा-विश्वासकी ही हुई ?

 समाधान‒जैसे, राजाको राजा न माननेसे राजासे होनेवाला लाभ नहीं होता; पण्डितको पण्डित न माननेसे पण्डितसे होनेवाला लाभ नहीं होता; सन्त-महात्माओंको सन्त-महात्मा न माननेसे उनसे होनेवाला लाभ नहीं होता; भगवान् अवतार लेते हैं तो उनको भगवान् न माननेसे उनसे होनेवाला लाभ नहीं होता; परंतु राजा आदिसे लाभ न होनेसे राजा आदिमें कमी थोड़े ही आ गयी ? कमी तो न माननेवालेकी ही हुई । ऐसे ही जो नाममें श्रद्धा-विश्वास नहीं करता उसको नामसे होनेवाला लाभ नहीं होता, पर इससे नामकी महिमामें कोई कमी नहीं आती । कमी तो नाममें श्रद्धा-विश्वास न करनेवालेकी ही है ।

नाममें अनन्त शक्ति है । वह शक्ति नाममें श्रद्धा-विश्वास करनेसे तो बढ़ेगी और श्रद्धा-विश्वास न करनेसे घटेगी‒यह बात है ही नहीं । हाँ, जो नाममें श्रद्धा-विश्वास करेगा, वह तो नामसे लाभ ले लेगा, पर जो श्रद्धा-विश्वास नहीं करेगा, वह नामसे लाभ नहीं ले सकेगा । दूसरी बात, जो नाममें श्रद्धा-विश्वास नहीं करता, उसके द्वारा नामका अपराध होता है । उस अपराधके कारण वह नामसे होनेवाले लाभको नहीं ले सकता ।

  (शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे