Sep
29
(गत ब्लॉगसे आगेका)
शंका‒नाम
तो केवल शब्दमात्र है, उससे
क्या कार्य सिद्ध होगा ?
समाधान‒ऐसे तो शब्दमात्रमे अचिन्त्य शक्ति है,
पर नाममें भगवान्के साथ सम्बन्ध जोड़नेकी ही एक विशेष सामर्थ्य
है । अतः नाम किसी भी तरहसे लिया जाय, वह मंगल ही करता है । नाम जपनेवालेका भाव विशेष हो तो बहुत जल्दी
लाभ होता है‒
सादर सुमिरन जे नर
करही ।
भव बारिधि गोपद इव तरहीं ॥
(मानस १ । १११ । २)
नामजपमें भाव कम भी रहे तो भी नाम जपनेसे लाभ तो होगा ही,
पर कब होगा-‒इसका पता नहीं । नामजपकी संख्या ज्यादा बढ़नेसे भी
भाव बन जाता है, क्योंकि नामजप करनेवालेके भीतर सूक्ष्म भाव रहता ही है,
वह भाव नामकी संख्या बढ़नेसे प्रकट हो जाता है ।
नाम-जप क्रिया (कर्म) नहीं है, प्रत्युत
उपासना है;
क्योंकि नामजपमें जापकका लक्ष्य,
सम्बन्ध भगवान्से रहता है । जैसे कर्मोंसे कल्याण
नहीं होता । कर्म अपना फल देकर नष्ट हो जाते है;
परन्तु कर्मोंके साथ निष्कामभावकी मुख्यता रहनेसे वे कर्म कल्याण
करनेवाले हो जाते है । ऐसे ही नामजपके साथ भगवान्के लक्ष्यकी मुख्यता रहनेसे नामजप
भगवत्साक्षात्कार करानेवाला हो जाता है । भगवान्का लक्ष्य मुख्य रहनेसे नाम चिन्मय
हो जाता है, फिर उसमें क्रिया नहीं रहती । इतना ही नही,
वह चिन्मयता जापकमें भी उतर आती है अर्थात् नाम जपनेवालेका शरीर भी चिन्मय हो जाता है । उसके शरीरकी जड़ता मिट
जाती है । जैसे, तुकारामजी महाराज सशरीर वैकुण्ठ चले गये । मीराबाईका शरीर भगवान्के
विग्रहमें समा गया । कबीरजीका शरीर अदृश्य हो गया और उसके स्थानपर लोगोंको पुष्प मिले
। चोखामेलाकी हड्डियोंसे ‘विट्ठल’ नामकी ध्वनि सुनाई पड़ती थी ।
प्रश्न‒शास्त्रों, सन्तोंने
भगवन्नामकी जो महिमा गायी है, वह
कहाँतक सच्ची है ?
उत्तर‒शास्त्रों और सन्तोंने नामकी जो महिमा गायी है, वह
पूरी सच्ची है । इतना ही नहीं, आजतक जितनी नाम-महिमा गायी गयी है, उससे
नाम-महिमा पूरी नहीं हुई है, प्रत्युत अभी बहुत नाम-महिमा बाकी है । कारण कि भगवान्
अनन्त हैं; अतः उनके नामकी महिमा भी अनन्त है‒‘हरि
अनंत हरि कथा अनंता’ (मानस १ । १४० । ३) । नामकी पूरी महिमा स्वयं भगवान् भी नहीं कह सकते‒‘रामु न सकहिं नाम गुन गाई’ ( १ ।
२६ । ४) ।
प्रश्न‒नामकी
जो महिमा गायी गयी है, वह
नामजप करनेवाले व्यक्तियोंमें देखनेमें नहीं आती, इसमें
क्या कारण है ?
उत्तर‒नामके महात्म्यको स्वीकार न करनेसे नामका तिरस्कार,
अपमान होता है; अतः वह नाम उतना असर नहीं करता । नामजपमें मन न लगानेसे,
इष्टके ध्यानसहित नामजप न करनेसे,
हृदयसे नामको महत्त्व न देनेसे,
आदि-आदि दोषोंके कारण नामका माहात्म्य शीघ्र देखनेमें नहीं आता
। हाँ, किसी प्रकारसे नामजप मुखसे चलता रहे तो उससे भी लाभ
होता ही है, पर इसमें समय लगता है । मन लगे चाहे न लगे, पर
नामजप निरन्तर चलता रहे, कभी छूटे नहीं तो नाम-महाराजकी कृपासे सब काम हो
जायगा अर्थात् मन लगने लग जायगा, नामपर श्रद्धा-विश्वास भी हो जायँगे, आदि-आदि
।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘गीता-दर्पण’ पुस्तकसे
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