Sep
26
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्न–कई
लोगोंको गुरुके द्वारा कुण्डलिनी-जागरण
आदिकी अलौकिक अनुभूतियाँ होती है, वह क्या है ?
उत्तर-वह चमत्कार तो होता है, पर उससे कल्याण नहीं होता । कल्याण
तो जड़ता (शरीर- संसार) से ऊँचा उठने पर ही होता है ।
प्रश्न–हमने
गुरुसे कंठी तो ले ली, पर अब उनमें
श्रद्धा नहीं रही तो क्या कंठी उनको वापस कर दें ?
उत्तर–कंठी वापस करनेके लिये मैं कभी नहीं कहता । मैं यही सम्मति देता
हूँ कि रोजाना एक माला गुरु-मन्त्रकी फेर लो
और बाकी समय जिसमें श्रद्धा हो, उस मन्त्रका जप करो और सत्संग-स्वाध्याय करो ।
प्रश्न–पहले
गुरु बना लिया, अब उनमें श्रद्धा
नहीं रही तो उनका त्याग करनेसे पाप तो नहीं लगेगा ?
उत्तर– अब आपके मनमें गुरुको छोड़नेकी इच्छा हो गयी है,
उनसे श्रद्धा हट गयी तो गुरुका त्याग हो ही गया । इसलिये उस गुरुकी निन्दा भी मत करो और उसके साथ सम्बन्ध भी मत रखो ।
जिसमें रुपयोंका लोभ हो, स्त्रियोंमें
मोह हो, कर्त्तव्य-अकर्तव्यका ज्ञान न हो, खराब
रास्तेपर चलता हो, ऐसे गुरुका त्याग करनेमें कोई पाप, दोष
नहीं लगता । शास्त्रोंमें ऐसे गुरुका त्याग करनेकी बात आती है–
गुरोरप्यवलिप्तस्य
कार्याकार्यमजानतः ।
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥
(महाभारत, उद्योग॰
१७८/४८)
‘यदि गुरु भी घमण्डमें आकर कर्त्तव्य और अकर्तव्यका ज्ञान खो बैठे और कुमार्ग पर
चलने लगे तो उसका भी त्याग कर देनेका विधान है ।’
ज्ञानहीनो गुरुस्त्याज्यो
मिथ्यावादी विकल्पकः ।
स्वविश्रान्तिं न जानाति परशान्तिं करोति किम् ॥
(सिद्धसिद्धान्तसंग्रह, गुरुगीता)
‘ज्ञानरहित, मिथ्यावादी और भ्रम पैदा करनेवाले गुरुका त्याग
कर देना चहिये; क्योंकि जो खुद शान्ति नहीं प्राप्त कर सका, वह दूसरोंको शान्ति कैसे देगा ?’
पतिता गुरवस्त्याज्या माता च न कथञ्चन ।
गर्भधारणपोषाभ्यां तेन माता गरीयसी
॥
(स्कन्दपुराण, मा॰ कौ॰ ६/७; मत्स्यपुराण
२२७/१५०)
‘पतित गुरु भी त्याज्य है, पर माता किसी प्रकार ही त्याज्य नहीं है । गर्भकालमें धारण-पोषण करनेके कारण माताका
गौरव गुरुजनोंसे भी अधिक है ।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं?’ पुस्तकसे
|