Sep
27
(गत ब्लॉगसे आगेका)
प्रश्नᅳक्या
स्त्री किसीको गुरु बना सकती है ?
उत्तरᅳस्त्रीको कोई गुरु नहीं बनाना चहिये । अगर बनाया
हो तो छोड़ देना चहिये । स्त्रीको पति ही उसका गुरु
है । शास्त्रोंमें
आया हैᅳ
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेव गुरुः स्त्रीणां
सर्वस्याऽभ्यागतो गुरुः ॥
(पद्मपुराण
स्वर्ग॰ ५१/५१, ब्रह्मपुराण ८०/४७)
‘अग्नि द्विजातियोंका गुरु है, ब्राह्मण चारों वर्णोंका
गुरु है, एकमात्र पति ही स्त्रियोंका गुरु है और अतिथि सबका गुरु है ।’
वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः ।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ॥
(मनुस्मृति
२/६७)
‘स्त्रियोंके वैवाहिक विधिका पालन ही वैदिक-संस्कार (यज्ञोपवीत),
पतिकी सेवा ही गुरुकुलवास और गृह-कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है ।’
स्त्रीको पतिके सिवाय किसी भी पुरुषसे किसी भी
प्रकारका भी सम्बन्ध नहीं जोड़ना चाहिये । स्त्रियोंसे प्रार्थना है कि वे कभी किसी
साधुके फेरमें न पड़ें । आजकल बहुत ठगी, दम्भ, पाखण्ड हो रहा है । मेरे पास ऐसे पत्र भी आते हैं और भुक्तभोगी स्त्रियाँ भी
आकर अपनी बात सुनाती हैं, जिससे ऐसा लगता है की वर्तमान
समयमें स्त्रीके लिये गुरु बनाना अनर्थका मूल है ।
साधुको भी चाहिये कि वह किसी स्त्रीको चेली न बनाये ।
दीक्षा देते समय गुरुको शिष्यके हृदय आदिका स्पर्श करना पड़ता है, जबकि संन्यासीके लिये स्त्रीके स्पर्शका कड़ा निषेध है ।
श्रीमद्भागवतमें आया है कि हाड़-मांसमय शरीरवाली स्त्रीका तो कहना ही क्या है,
लकड़ीकी बनी हुई स्त्रीका भी स्पर्श न करे और हाथसे स्पर्श करना तो दूर रहा, पैरसे
भी स्पर्श न करेᅳ
पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि ।
(श्रीमद्भागवत
११/८/१३)
शास्त्रोंमें
यहाँतक कहा गया हैᅳ
मात्रा स्वस्त्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिद्रियग्रामो
विद्वांसमपि कर्षति ॥
(मनु॰ २/२१५)
‘मनुष्योंको चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा
पुत्रीके साथ भी कभी एकान्तमें न रहें; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं, वे
विद्वान मनुष्यको भी अपनी तरफ खींच लेती हैं ।’
संग न कुर्यात्प्रमदासु जातु योगस्य
पारं परमारुरुक्षुः ।
मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो वदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥
(श्रीमद्भागवत ३/३१/३९)
‘जो पुरुष योगके परम पदपर आरूढ़ होना चाहता हो
अथवा जिसे मेरी सेवाके प्रभावसे आत्मा-अनात्माका विवेक हो गया हो, वह स्त्रियोंका
संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुषके लिये नरकका खुला द्वार बताया गया है ।’
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘क्या गुरु बिना मुक्ति नहीं ?’ पुस्तकसे
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