Dec
30
(गत ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता‒भगवान्की प्राप्तिके लिये कौन-सी साधना करनी चाहिये ?
स्वामीजी‒तरह-तरहकी साधनाओंसे
भगवान् नहीं आते हैं । भगवान् आते हैं भीतरकी असली चाहनासे । भगवान्की प्राप्तिके लिये
केवल उत्कण्ठा चाहिये । जैसे भगवान् एक ही हैं, ऐसे ही उनकी प्राप्तिकी
इच्छा भी एक ही हो ।
श्रोता‒ आप कहते हैं कि मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिये,
पर शरीरको तो रोटी-कपड़ा चाहिये ही ?
स्वामीजी‒मैंने ‘मेरेको नहीं चाहिये’‒यह कहा है,
‘शरीरको नहीं चाहिये’‒यह नहीं कहा है । शरीर और
रोटी-कपड़ा एक ही है । जिस जातिका रोटी-कपड़ा
है, उसी जातिका शरीर है । परन्तु मैं भगवान्का अंश हूँ इसलिये मेरे भगवान् हैं और मेरेको केवल भगवान् चाहिये । मेरे लिये
भगवान्के सिवाय अन्य कोई आवश्यकता है नहीं, हुई नहीं, होगी नहीं, हो सकती नहीं
। आप अपने-आपको केवल भगवान्का ही समझें;
क्योंकि जीवमात्र ईश्वरका अंश है । ईश्वरके
सिवाय जीवको किसी चीजकी जरूरत नहीं है । आप कहेंगे कि हमने सन्तोंको देखा है,
अच्छे-अच्छे महात्मा भी रोटी माँगते हैं । परन्तु
अगर वे शरीरको अपना मानते हैं तो वे महात्मा नहीं हैं । शरीर
अपना नहीं है, संसारका है ।
श्रोता‒जब संसारमें जीवका
कुछ भी नहीं है तो भगवान्ने जीवको पैदा ही क्यों किया ?
स्वामीजी‒भगवान्ने भूल की तो उनको माफ
कर दो !! आप बतायें कि जो घरका मालिक होता है, वह बालकोंके लिये सच्चा (असली) घोड़ा लाता है कि मिट्टी (प्लास्टिक)-का घोड़ा लाता है ? बालक मिट्टीके घोड़ेमें राजी होते हैं,
इसलिये वह पैसे खर्च करके भी मिट्टीका घोड़ा लाता है । इसी तरह आप संसारकी चीजोंसे राजी होते हो, इसलिये भगवान् संसार देते हैं । आप इनमें राजी
होना छोड़ दो तो भगवान् कभी मना करेंगे ही नहीं । मना करें तो मेरा कान पकड़ना !
हम सबका सम्बन्ध भगवान्के साथ है, संसारके साथ है ही नहीं ।
आप सबको सुनानेके लिये एक बात मेरे
मनमें आयी है । विचार करें, अपना किसी वस्तुपर वश चलता है क्या ?
शरीरपर, मनपर, बुद्धिपर, अहंकारपर प्राणोंपर, वस्तुओंपर, रुपयोंपर, कुटुम्बपर,
सगे-सम्बन्धियोंपर, घरपर,
जमीनपर, जायदादपर, किसीपर
भी अपना वश चलता है क्या ? सब भाई-बहन इस
बातपर विचार करें । वस्तु, व्यक्ति और क्रिया‒इन तीनोंपर किसीका
वश चलता है क्या ? इनको हम जैसा चाहें, वैसा रख सकते हैं क्या ? वस्तुको, व्यक्तिको, क्रियाको, मानको,
आदरको, सत्कारको, प्रशंसाको,
वाह-वाहको जैसा चाहें, वैसा
रख सकते हैं क्या ? इनपर हमारा वश चलता है क्या ? इनपर हमारी स्वतन्त्रता चलती है क्या ? इसपर विचार करो
। आपको साधन करना हो तो यह साधन करनेकी खास बात है ।
(शेष आगेके
ब्लॉगमें)
‒‘मैं
नहीं, मेरा
नहीं’ पुस्तकसे |