Dec
29
श्रोता‒हमें क्रोध क्यों
आता है और वह कैसे मिटे ?
स्वामीजी‒जब अपने स्वार्थमें अथवा अपने अभिमानमें
बाधा लगे, तब क्रोध आता है ।
गीतामें आया है‒‘कामात्कोधोऽभिजायते’ (गीता २ । ६२) ‘कामनासे (बाधा लगनेपर) क्रोध पैदा होता है’ । अतः क्रोध मिटाना
हो तो कामना और अभिमानका त्याग कर दो ।
श्रोता‒सारी सृष्टिमें
जितनी शक्ति है, उससे अधिक शक्ति हममें है, इसका क्या मतलब है ?
स्वामीजी‒इसका मतलब है कि आप चेतन हो, सृष्टि जड़ है । सृष्टि
निरन्तर बदलती है, आप निरन्तर एकरूप रहते हो । अग्निकी चिनगारी
हो और रुईका ढेर हो तो दोनोंमें कौन बलवान् होता है ? आप परमात्माके
साक्षात् अंश हो । परमात्माकी सब शक्ति आपके साथमें है । परन्तु आप मामूली अहंकारके
वशमें हो जाते हो, जड़ पदार्थोंको अपना मान लेते हो, तब दुर्दशा होती है !
श्रोता‒भगवान्ने हमें तीनों गुणोंसे, अपनी मायासे बाँधा है । भगवान् छुड़ुायेंगे, तभी छूटेंगे
। साधन करनेसे कुछ नहीं होता !
स्वामीजी‒अगर साधन करनेसे कुछ नहीं होता तो फिर
खाओ-पीओ मत ! खाना-पीना भी जीनेका साधन है !
आप चीजोंको अपनी समझोगे तो बन्धन रहेगा
ही, छूटेगा
नहीं । आप छोड़ दो तो छूट जायगा । साधु होते हैं तो आपलोगोंके घरोंसे जन्मे हुए ही होते
हैं । साधु होनेके बाद घरवालोंका बारह वर्ष भी पत्र न आये तो प्रतीक्षा नहीं होती ।
कभी मनमें नहीं आती कि हमारे सम्बन्धी जीवित हैं कि मर गये ! आपके घरोंकी कन्या
विवाहके बाद दूसरे घरकी हो जाती है और उसी घरको अपना मान लेती है । जब वह दादी-परदादी बन जाती है तो उसको अपने घरकी याद ही नहीं आती ।
श्रोता‒‘मेरा कुछ नहीं है तथा मुझे कुछ नहीं चाहिये’ और ‘सब कुछ वासुदेव ही है’‒इन दोनोंमें मेरे लिये कौन-सा साधन श्रेष्ठ है ?
स्वामीजी‒दोनों ही ठीक हैं । ‘मेरा कुछ नहीं
है तथा मुझे कुछ नहीं चाहिये’‒यह पहला साधन है और ‘सब कुछ वासुदेव ही है’‒यह अन्तिम साधन है । मूल बात है‒मेरा कुछ नहीं है । आप
‘मेरा कुछ नहीं है’‒इस बातका अनुभव कर लोगे तो ‘मेरेको कुछ नहीं
चाहिये’‒यह अपने-आप हो जायगा । फिर ‘सब
कुछ वासुदेव ही है’‒इसका अनुभव अपने-आप
हो जायगा ।
‘मेरा कुछ नहीं है’‒यह बड़ी
सार बात है !
श्रोता‒जिनसे हमारा जन्म
हुआ है, वे माँ-बाप भी मेरे कुछ नहीं हैं क्या ?
स्वामीजी‒बिल्कुल नहीं हैं । अगर वे आपके हैं
तो उनको रख लो,
मरने मत दो ! उनको अपना मत
मानो, पर उनकी सेवा करो । अपना मानकर जो सेवा की जाती है, वह सेवा होती ही नहीं.....होती ही नहीं.....होती ही नहीं ! अपना नहीं माननेसे ही सेवा होती है । अपना माननेसे सेवा नष्ट हो जाती है !
श्रोता‒भगवान्में हमारा प्रेम, गोपीभाव
कैसे हो ?
स्वामीजी‒केवल आपकी लगन होनी चाहिये । हरदम, आठों पहर आपकी लगन
हो तो हो ही जायगा !
‒‘मैं नहीं, मेरा नहीं’
पुस्तकसे
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