Dec
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भगवत्प्राप्तिके विविध सुगम उपाय
(गत ब्लॉगसे आगेका)
११. प्रकीर्ण
(१०)
साधकको ये चार बातें दृढ़तापूर्वक मान लेनी चाहिये‒
१)
परमात्मा यहाँ हैं ।
२)
परमात्मा अभी हैं ।
३)
परमात्मा अपनेमें हैं ।
४)
परमात्मा अपने हैं ।
परमात्मा सब जगह (सर्वव्यापी) होनेसे यहाँ भी हैं;
सब समय (तीनों कालोंमें) होनेसे अभी भी हैं;
सबमें होनेसे अपनेमें भी हैं;
और सबके होनेसे अपने भी हैं ।
इस दृष्टिसे‒परमात्मा यहाँ होनेसे उनको प्राप्त करनेके लिये
दूसरी जगह जानेकी आवश्यकता नहीं है; अभी होनेसे उनकी प्राप्तिके लिये भविष्यकी प्रतीक्षा करनेकी
आवश्यकता नहीं है; अपनेमें होनेसे उन्हें बाहर ढूँढनेकी आवश्यकता नहीं है;
और अपने होनेसे उनके सिवाय किसीको भी अपना माननेकी आवश्यकता
नहीं है । अपने होनेसे वे स्वाभाविक ही अत्यन्त प्रिय लगेंगे ।
प्रत्येक साधकके लिये उपर्युक्त चारों बातें अत्यन्त महत्वपूर्ण
और तत्काल लाभदायक हैं । साधकको ये चारों बातें दृढ़तासे मान लेनी चाहिये । समस्त साधनोंका
यह सार साधन है । इसमें किसी योग्यता, अभ्यास, गुण आदिकी भी जरूरत नहीं है । ये बातें स्वतःसिद्ध और वास्तविक
हैं, इसलिये इसको माननेके लिये सभी योग्य हैं,
सभी पात्र हैं, सभी समर्थ हैं । शर्त यही है कि वे एकमात्र परमात्माको ही चाहते
हों ।
खोया कहे सो बावरा, पाया कहे सो कूर ।
पाया खोया कुछ नहीं, ज्यों-का-त्यों
भरपूर ॥
दौड़ सके तो दौड़ ले, जब लगि तेरी दौड़ ।
दौड़ थक्या धोखा मिट्या, वस्तु
ठौड़-की-ठौड़ ॥
तेरा साहिब है घट मांही, बाहर नैना क्यों खोले ।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, साहिब
पाया तृण-ओले ॥
मोको कहाँ ढूँढ़े बंदा, मैं तो तेरे पास में ।
ना तीरथ में ना मूरत में, ना एकान्त
निवास में ।
ना मन्दिर में ना मस्जिद में, ना काबे
कैलास में ॥ १ ॥
ना मैं जप में ना मैं तप में, ना मैं
वरत उपास में ।
ना मैं क्रिया कर्म में रहता, नहीं
जोग संन्यास में ॥ २ ॥
नहीं प्रान में नहीं पिंड में, ना ब्रह्माण्ड
अकास में ।
ना मैं त्रिकुटी भँवर गुफा में, सब साँसों
की साँस में ॥ ३ ॥
खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, पलभर
की तलास में ।
कहत कबीर
सुनो भाई साधो, मैं तो हूँ बिस्वास में ॥ ४ ॥
नारायण ! नारायण
!! नारायण !!!
‒‘लक्ष्य अब दूर नहीं !’ पुस्तकसे
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