Apr
27
भक्ति भक्त भगवंत
गुरु चतुर नाम बपु एक ।
इनके पद बंदन किएँ
नासत बिघ्न अनेक ॥
(१) भक्तिका मार्ग बतानेवाले संत ‘गुरु’, (२) भजनीय ‘भगवान्’,
(३) भजन करनेवाले ‘भक्त’ तथा (४) संतोंके उपदेशके अनुसार भक्तकी भगवदाकार वृत्ति
‘भक्ति’ है । नामसे चार हैं, किन्तु तत्त्वतः एक ही हैं ।
जो साधक दृढ़ता और तत्परताके साथ भगवान्के नामका
जप और स्वरूपका ध्यानरूप भक्ति करते हुए तेजीसे चलता है, वही भगवान्को शीघ्र प्राप्त
कर लेता है ।
जो जिव चाहे मुक्तिको तो सुमरीजे राम ।
हरिया
गैलै चालताँ जैसे आवे गाम
॥
(१) इस भगवद्भक्तिकी प्राप्तिके अनेक साधन बताये गये हैं । उन साधनोंमें मुख्य
है–संत-महात्माओंकी कृपा और उनका संग । रामचरितमानसमें कहा है–
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी ।
बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥
× × ×
भक्ति तात अनुपम सुख मूला ।
मिलइ जो संत होइ अनुकूला ॥
उन संतोंका मिलन भगवत्कृपासे ही होता है । श्रीगोस्वामीजी कहते हैं–
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥
.......................... । बिनु हरि कृपा मिलहिं नहिं
संता ॥
.................................. । सतसंगति
संसृति कर अंता ॥
असली
भगवत्प्रेमका नाम ही भक्ति है । कहा भी है–
पन्नगारि सुनु प्रेम
सम भजन न दूसर आन ।
असि बिचारि पुनि पुनि मुनि करत राम गुन गान ॥
इस प्रकारके प्रेमकी प्राप्ति संतोंके संगसे अनायास ही हो जाती है; क्योंकि
संत-महात्माओंके यहाँ परम प्रभु परमेश्वरके गुण, प्रभाव, तत्त्व, रहस्यकी कथाएँ
होती रहती हैं । उनके यहाँ यही प्रसंग चलता रहता है । भगवान्की कथा जीवोंके अनेक
जन्मोंसे किये हुए अनन्त पापोंकी राशिका नाश करनेवाली एवं हृदय और कानोंको अतीव
आनन्द देनेवाली होती है । जीवको यज्ञ, दान, तप, व्रत, तीर्थ आदि बहुत परिश्रम-साध्य
पुण्य-साधनोंके द्वारा भी वह लाभ नहीं होता, जो सत्संगसे अनायास ही हो जाता है;
क्योंकि प्रेमी संत-महात्माओंके द्वारा कथित भगवत्कथाके श्रवणसे जीवोंके पापोंका
नाश हो जाता है । इससे अन्तःकरण अत्यंत निर्मल होकर भगवान्के चरणकमलोंमें सहज ही श्रद्धा और प्रीति उत्पन्न हो
जाती है । भक्तिका मार्ग बतानेवाले
संत-महात्मा ही भक्तिमार्गके गुरु हैं ।
इनके लक्षणोंका वर्णन करते हुए श्रीमद्भागवतमें कहा है–
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम् ।
सत्यसारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः
शुचिरकिञ्चन ।
अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः
कारुणिकः कविः ॥
(११/११/२९-३१)
‘भगवान्का भक्त कृपालु, सम्पूर्ण
प्राणियोंमें वैरभावसे रहित, कष्टोंको प्रसन्नतापूर्वक सहन करनेवाला, सत्यजीवन, पापशून्य,
समभाववाला, समस्त जीवोंका सुहृद्, कामनाओंसे कभी आक्रान्त न होनेवाली शुद्ध
बुद्धिसे सम्पन्न, संयमी, कोमलस्वभाव, पवित्र, पदार्थोंमें आसक्ति और ममतासे रहित,
व्यर्थ और निषिद्ध चेष्टाओंसे शून्य, हित-मित-मेध्य-भोजी, शान्त, स्थिर,
भगवत्परायण, मननशील, प्रमादरहित, गंभीर स्वभाव, धैर्यवान्,
काम-क्रोध-लोभ-मोह-मत्सररूप छः विकारोंको जीता हुआ, मानरहित, सबको मान देनेवाला, भगवान्के
ज्ञान-विज्ञानमें निपुण, सबके साथ मैत्रीभाव रखनेवाला, करुणाशील और तत्त्वज्ञ होता
है ।’
ऐसे भगवद्भक्त ही वास्तवमें भक्तिमार्गके प्रदर्शक हो सकते
हैं ।
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