Listen यावज्जीवो
न गृह्णीयाद्धरेश्च चरणाश्रयम् । तावन्न च तरेत् कश्चिन्मृत्युसंसारसागरात् ॥ जीवमात्रका यह स्वभाव है कि वह किसी-न-किसीका आश्रय लेना चाहता
है और लेता भी है । मनुष्य, पशु, पक्षी, वृक्ष, लता आदि सभी किसी-न-किसीका आश्रय लेते
ही हैं;
क्योंकि जीवमात्र साक्षात् परमात्माका अंश है । अतः जबतक यह जीव अपने अंशी परमात्माका आश्रय नहीं लेगा, तबतक
यह दूसरोंका आश्रय लेता ही रहेगा, पराधीन होता ही रहेगा, दुःख
पाता ही रहेगा । मनुष्य तो विवेकप्रधान प्राणी है पर अपने विवेकको
महत्त्व न देकर यह स्वयं साक्षात् अविनाशी परमात्माका चेतन अंश होता हुआ भी नाशवान्
जड़का आश्रय ले लेता है अर्थात् शरीर, बल, बुद्धि, योग्यता, कुटुम्ब-परिवार,
धन-सम्पत्ति आदिका आश्रय ले लेता है‒यह इसकी बड़ी
भारी गलती है । गीतामें अर्जुनने भगवान्का आश्रय लेकर ही अपने कल्याणकी बात
पूछी है (२ । ७) । अर्जुनने जबतक भगवान्का आश्रय नहीं लिया,
तबतक गीताके उपदेशका आरम्भ ही नहीं हुआ । उपदेशके अन्तमें भी
भगवान्ने अपना आश्रय लेनेकी ही बात कही है (१८ । ६६) । इस प्रकार गीताके उपदेशका आरम्भ
और उपसंहार भगवदाश्रयमें ही हुआ है । भगवान्से मिली हुई स्वतन्त्रताके कारण मनुष्य किसीका भी आश्रय
ले सकता है । अतः कई मनुष्य अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिये देवताओंका आश्रय लेते हैं
(७ । २०), पर परिणाममें उनको नाशवान् फल ही मिलता है (७ । २३) । कई मनुष्य भोगोंकी
कामनासे वेदोंमें कहे हुए सकाम अनुष्ठानोंका आश्रय लेते हैं,
पर परिणाममें वे आवागमनको प्राप्त होते हैं (९ । २१) ।
कई मनुष्य न तो भगवान्का आश्रय लेते हैं और न भगवान्को भगवान्रूपसे
ही जानते हैं । अतः ऐसे मनुष्योंमेंसे कई तो आसुरभावका आश्रय लेते हैं (७ । १५);
कई आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृतिका आश्रय लेते हैं (९ । १२);
कई कभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेते हैं (१६ । १०);
कई मृत्युपर्यन्त रहनेवाली अपार चिन्ताओंका आश्रय लेते हैं
(१६ । ११); कई अहंकार, दुराग्रह, घमंड,
कामना और क्रोधका आश्रय लेते हैं ( १६ । १८) । इन आश्रयोंके
फलस्वरूप उनको बार-बार चौरासी लाख योनियों और नरकोंमें जाना पड़ता है (१६ । १९-२०) । |
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