Nov
29
(गत ब्लॉगसे आगेका)
कलिसंतरणोपनिषद्में नाम-महिमा आयी है । एक बार नारदजी ब्रह्माजीके
पास गये । ब्रह्माजीने पूछा‒‘कैसे आये हो ?’ नारदजीने कहा‒‘पृथ्वीमण्डलपर अभी कलियुग आया हुआ है । इस कलियुगमें जीवोका
उद्धार सुगमतापूर्वक कैसे हो ?’ ब्रह्माजीने कहा‒‘कलियुगके
पापोंको दूर करनेके लिये यह महामन्त्र है‒‘हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण
कृष्ण हरे हरे ॥’ इति षोडशकं कल्मषनाशनम्’ भगवन्नाम ही इस कलियुगमें सुगम
साधन है ।
फिर नारदजीने पूछा‒‘कोऽस्ति विधिरिति सहोवाच प्रजापतिः’ भगवन्नाम लेनेकी विधि क्या है ? तो ब्रह्माजीने उत्तर दिया‒‘नास्ति विधिः ।’ कोई कैसा
ही हो । पापी हो या पुण्यात्मा वह नाम जपता हुआ सायुज्य, सालोक्य आदि मुक्तियोंको प्राप्त कर लेता है । इसलिये नाम लिये जाओ बस । कलियुगी
जीवोंके लिये कितनी सुगम बात बता दी ! अगर विधियाँ बता देते तो मुश्किल हो जाती । नाम-जपमें
निषेध कुछ है ही नहीं । ‘सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू’ सबके लिये सुलभ है । ‘सुलभं भगवन्नाम वागस्ति वशवर्तिनी’ । भगवान्का नाम सुलभ है, इसपर कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया है । वर्तमान सरकारने भी कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया
है, आगे खतरा हो सकता है, परंतु अभी कोई प्रतिबन्ध नहीं है । खुला नाम लो भले ही, कोई मना नहीं है ।
राम दड़ी चौड़े पड़ी, सब कोई खेलो आय ।
दावा नाहीं सन्तदास, जीते सो ले जाय ॥
किसीका दावा नहीं है । सब कोई भगवान्का नाम ले सकते हैं । जैसे बापकी जगहपर बेटेका हक लगता है, वैसे भगवन्नामपर हमारा पूरा-का-पूरा हक लगता है; क्योंकि यह हमारे बापका नाम है । ऐसा अपनेको अधिकार मिला हुआ
है । कितनी मौजकी बात है, कितने आनन्दकी बात है यह ! मनुष्य-शरीर मिल गया और फिर इसमें
भगवान्का नाम मिल गया ।
हाथ काम मुख राम है, हिरदे साँची
प्रीत ।
दरिया गृहस्थी साध की, याही उत्तम रीत ॥
हाथोंसे अपना काम करते हुए मुँहसे ‘राम’ नाम जप करते रहें । बहनें-माताएँ
घरका काम करें । भाई लोग खेतोंमें या दूकानोंमें काम करें । वे जहाँ हो, वहाँ ही रहकर काम करते रहे । हृदयमें भगवान्से स्नेह बना रहे ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मानसमें नाम-वन्दना’ पुस्तकसे
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