Feb
26
(गत ब्लॉगसे आगेका)
वानप्रस्थ-आश्रमके बाद संन्यास-आश्रममें प्रवेश करे । इसमें
परिग्रह एवं कंचन-कामिनीका सर्वथा त्याग कर दे । भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे । समयपर
अपने-आप जो कुछ भिक्षा मिल जाय, उसीमें सन्तोष कर ले और रात-दिन
परमात्माके चिन्तनमें, भजन-स्मरणमें, सद्ग्रन्थोंके स्वाध्यायमें
लगा रहे ।
इन चारों आश्रमोंमें एक-एक बातकी मुख्यता है । ब्रह्मचर्य-आश्रममें
‘गुरु-आज्ञापालन’, गृहस्थ-आश्रममें ‘अतिथि-सत्कार’, वानप्रस्थ-आश्रममें ‘तपस्या’ और संन्यास-आश्रममें ‘ब्रह्म-चिन्तन’ मुख्य है । इन
चारों आश्रमोंमें मुख्य दो ही आश्रम हैं‒गृहस्थ और संन्यास । ब्रह्मचर्य-आश्रम ‘गृहस्थ’
की तैयारीके लिये है और वानप्रस्थ-आश्रम ‘संन्यास’ की तैयारीके लिये है ।
प्रश्न‒आजकल
मनुष्य प्रायः सौ वर्षतक जीवित नहीं रहता;
अतः चारों आश्रमोंका पालन कैसे किया जाय
?
उत्तर‒वर्तमानमें मनुष्य अठारह वर्षकी आयुतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए विद्याध्ययन
करे । उसके बाद शास्त्र-मर्यादाके अनुसार, अपनी जाति, गोत्र आदिको देखकर विवाह करे अर्थात् गृहस्थ-आश्रममें प्रवेश
करे । पैंतीस-चालीस वर्षकी अवस्थामें किसीकी स्त्री मर जाय
तो वह दूसरा विवाह न करे; क्योंकि दूसरी स्त्री पहली स्त्रीके बच्चोंका पालन करेगी या
नहीं, इसका क्या पता ? पैंतीस-चालीस वर्षकी उम्रमें
वानप्रस्थ-आश्रममें चला जाय । वानप्रस्थमें स्त्री-पुरुष दोनों संयमसे रहें । फिर अलिंग-संन्यास
ग्रहण करे अर्थात् काम-धंधा छोड़कर संयमपूर्वक संन्यासीकी तरह ही जीवन बिताये ।
प्रश्न‒इन
चारों आश्रमोंकी मर्यादामें चलनेसे क्या लाभ है और न चलनेसे क्या हानि है ?
उत्तर‒चारों आश्रमोंकी मर्यादामें चलनेसे स्वाभाविक संयम होता है ।
संयमसे तेज बढ़ता है, शक्ति बढ़ती है, लोक-परलोकका सुधार होता है । परन्तु मर्यादामें न चलनेसे संयम
नहीं रहता, जिससे उच्छृंखलता बढ़ती है और मनुष्य-जीवन पशु-पक्षियोंकी
तरह ही हो जाता है । अतः चारों आश्रमोंका पालन जरूर करना चाहिये; क्योंकि चारों आश्रमोंका उद्देश्य कल्याणमें है ।
नारायण ! नारायण
!! नारायण !!!
‒‘सन्त-समागम’ पुस्तकसे
|