Apr
29
(गत ब्लॉगसे आगेका)
अपनी गलतियोंको सहनेसे परमात्मप्राप्तिमें बाधा लगती है । संसारमें
विघ्न देनेवाले तो बहुत मिल जायँगे, पर साथ देनेवाला कोई नहीं मिलेगा । इसलिये हरदम सावधान रहनेकी
बहुत आवश्यकता है । जिस चीजसे परमात्माकी प्राप्तिमें बाधा
लगती है, विलम्ब होता है, उसको
सहना नहीं चाहिये । उसका बिल्कुल, बिना विलम्ब किये त्याग कर देना चाहिये । उसमें चाहे लाखों,
करोड़ों रुपये लगते हों,
परवाह मत करो । परमात्माकी प्राप्ति रुपयोंसे आँकी नहीं जा सकती
। परमात्मप्राप्तिके समान संसारमें कुछ है ही नहीं ।
जो भोग और संग्रहमें लगे हुए हैं,
वे परमात्माकी प्राप्ति नहीं कर सकते । अतः भोग तथा संग्रहके
विषयमें कोई बात करना चाहे तो उससे हाथ जोड़ लो । उसकी बात मत सुनो । उसमें अपना समय
बर्बाद मत करो । अपने सच्चे हृदयसे भगवान्में लगे रहो । अन्तमें सब काम ठीक हो जायगा
। आपको दीखता है कि भगवान् सुनते नहीं, पर भगवान्
आपकी एक-एक बात सुनते हैं । उनको ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !’ कहकर
पुकारो । वे आपके हृदयकी पुकारको सुनते हैं । उनके सिवाय आपकी पुकारको सुननेवाला कोई नहीं है । आजतक जिसने
सँभाला है, वही आगे भी संभालेगा । इसलिये निश्चिन्त रहो ।
ऐसे कलियुगके समयमें भगवान्की तरफ वृत्ति हो जाय,
उनका चिन्तन हो जाय,
उनको प्राप्त करनेकी मनमें आ जाय तो समझो कि भगवान्की कृपामें
भी विशेष कृपा हो गयी !
☀☀☀☀☀
श्रोता‒पहले
तो भगवान्का भजन करनेका समय मिल जाता था, पर
आजकल समय नहीं मिलता !
स्वामीजी‒पहले समय मिलता था, अब नहीं मिलता, ऐसी बात बिकुल नहीं है । वास्तवमें भजन करनेकी इच्छा नहीं है,
नीयत नहीं है । वास्तवमें भगवत्प्राप्तिके लिये नया काम कुछ
करना ही नहीं है ! भगवत्प्राप्तिके लिये समयकी जरूरत नहीं है । हम भगवान्के हैं और
भगवान्का काम करते हैं‒यह मान लो । मैं ‘पंचामृत’ बताया करता हूँ‒
१.
हम भगवान्के ही हैं ।
२.
हम जहाँ भी रहते हैं, भगवान्के
ही दरबारमें रहते हैं ।
३.
हम जो भी शुभ काम करते हैं, भगवान्का
ही काम करते हैं ।
४.
शुद्ध-सात्त्विक जो भी पाते हैं, भगवान्का
ही प्रसाद पाते हैं ।
५.
भगवान्के दिये प्रसादसे भगवान्के ही जनोंकी सेवा करते हैं
।
‒ये पाँच बातें मान लो तो आप बिल्कुल भगवान्का नाम
मत लो, कल्याण हो जायगा !
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे |