Apr
28
(गत ब्लॉगसे आगेका)
तत्त्वका अनुभव बताया नहीं जा सकता । जैसे,
कोई मिस्री खाये तो वह यह नहीं बता सकता कि मिस्री कैसी मीठी
होती है; बताशे जैसी मीठी होती है या पिण्डखजूर अथवा गुड जैसी ?
वह कोई भी उपमा देकर मिस्रीका स्वाद नहीं बता सकता । मिस्रीका
स्वाद मिस्री लेनेसे ही पता लगता है । अगर हम अनुभवकी व्याख्या करें तो यह कहेंगे कि
तत्त्वका अनुभव होनेपर हमारे मनमें किसी भी वस्तुका खिंचाव नहीं रहता । बढ़िया-से-बढ़िया
पदार्थमें भी मन खिंचता नहीं । रसबुद्धि निवृत्त हो जाती है । जैसे भोजन करनेपर तृप्ति
हो जाती है, अन्न-जलकी आवश्यकता नहीं रहती,
ऐसे ही परमात्माका अनुभव होनेपर सर्वथा तृप्ति हो जाती है ।
भोजन करनेके कुछ समय बाद फिर भूख लग जाती है,
पर तत्त्वका अनुभव होनेपर सदाके लिये तृप्ति हो जाती है । कुछ
करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहता । उस अनुभवको वाणीसे कैसे बतायें
?
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श्रोता‒कारणशरीर
क्या होता है ?
स्वामीजी‒तीन शरीर हैं‒स्थूलशरीर, सूक्ष्मशरीर और कारणशरीर । स्थूलशरीरमें ‘क्रिया’ होती है, सूक्ष्मशरीरमें ‘चिन्तन’ होता है और कारणशरीरमें ‘स्थिरता’ होती है । सूक्ष्मशरीर सत्रह तत्त्वोंका होता है‒पाँच ज्ञानेन्द्रिय,
पाँच कर्मेन्द्रियाँ,
पाँच प्राण, मन और बुद्धि । मनुष्यका स्वभाव (आदत) और अज्ञान (अनजानपना)
कारणशरीरमें रहते हैं । परमात्मप्राप्ति स्थिरतासे भी अलग है । चंचलता और स्थिरताका
जो ज्ञान (बोध) है, वह स्वयंमें रहता है । तात्पर्य है कि परमात्माकी प्राप्ति होनेपर स्थूल, सूक्ष्म
अथवा कारण‒किसी भी शरीरके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता ।
समाधि कारणशरीरमें होती है,
जिसमें व्युत्थान होता है । जबतक समाधि और व्युत्थान दोनों होते
हैं, तबतक वह साधक है, सिद्ध नहीं है । परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर व्युत्थान
नहीं होता । वह सहजावस्था होती है, जिसमें कारणशरीरसे भी सम्बन्ध-विच्छेद हो जाता है ।
श्रोता‒झूठ
बोलना पाप है, पर बिना झूठ बोले
व्यापार होता नहीं ?
स्वामीजी‒ऐसी बात नहीं है । बिना झूठ बोले भी व्यापार हो सकता है ।
श्रोता‒व्यापारमें
झूठसे कमाया हुआ धन काममें लेनेसे पूरे परिवारको दोष लगेगा या केवल कमानेवालेको दोष
लगेगा ?
स्वामीजी‒मुख्य दोष कमानेवालेको लगेगा । परिवारको कुछ अंशमें दोष लगेगा । अगर परिवारवाले
कहते हैं कि तुम पाप करो, तो पापमें सहमत होनेके कारण वे भी पापके भागीदार हो जायँगे ।
श्रोता‒लोभ
कैसे मिटे ?
स्वामीजी‒लोभ दानसे मिटता है । अपनी बढ़िया-से-बढ़िया चीज दूसरेके काम आ जाय तो उसमें प्रसन्नता
हो । दूसरा कोई चीज ले ले तो मनमें प्रसन्नता होनी चाहिये । यह प्रसन्नता बढ़ जानेसे
लोभ मिट जायगा ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒ ‘बिन्दुमें सिन्धु’ पुस्तकसे |