Feb
26
(गत ब्लॉगसे आगेका)
श्रोता‒गरुड़जीके लिये कहा गया है‒‘तबहिं होइ सब संसय भंगा ।
जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥’ (मानस, उत्तर॰ ६१ । २) । हम तो साधारण आदमी हैं ।
जब गरुड़जीको लम्बे समयतक सत्संग करनेके लिये कहा
गया है तो हमारी क्या दशा होगी !
स्वामीजी‒अगर आपकी जिज्ञासा जोरदार है तो आप
गरुड़जीसे भी तेज हो सकते हो ! आप गरुड़जीके प्रभावसे, उनकी शक्तिसे तो तेज नहीं हो सकते, पर आपकी पारमार्थिक
रुचि अधिक है तो आप गरुड़जीसे भी तेज हो सकते हो ।
श्रोता‒आपने कहा कि अपनेपनसे भगवान्की प्राप्ति जल्दी होती है, तो भगवान्को देखे बिना अपनापन कैसे हो ?
स्वामीजी‒मैं आपसे पूछूँ कि एक ऐसा पारस होता
है, जिसका स्पर्श होनेपर
लोहा भी सोना बन जाता है, तो उस पारसको आपने कभी देखा है ?
नहीं देखा है तो पारस अच्छा लगता है कि बुरा ? भगवान् सबसे कीमती हैं । वैसा कीमती कोई है नहीं, हुआ
नहीं, होगा नहीं, हो सकता नहीं । अपनापन
होनेमें देखना कारण नहीं है । देखनेसे अपनापन नहीं होता, प्रत्युत भीतरसे माननेसे होता है । भगवान्को जितना ऊँचा मानोगे, उतना
उनमें चित्त खिंचेगा । अगर भीतरसे जँच जाय कि भगवान् सबसे श्रेष्ठ हैं तो भगवान्में लग ही जाओगे, चाहे वे दीखें या न दीखें । केवल भगवान्
ही अच्छे लगने चाहिये । सांसारिक भोग जितने अच्छे लगते हैं, उतना
ही भगवान्में अच्छापन कम है !
भक्तोंके चरित्र पढ़ो, नामजप करो और हरदम चलते-फिरते, उठते-बैठते प्रार्थना करो
कि ‘हे नाथ ! आप अच्छे लगो’ ।
श्रोता‒पहले आप शरणागतिको श्रेष्ठ मानते थे, आजकल आप ‘वासुदेवः सर्वम्’ पर जोर दे रहे हैं, दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है ?
स्वामीजी‒वास्तवमें दोनों एक हैं । अभी जो ‘वासुदेवः सर्वम्’ की बात कह रहे हैं, यह शरणागतिको ही पुष्ट
करनेवाली है ।
श्रोता‒परिवार-नियोजनके लिये ऑपरेशन करवाना और गर्भपात करवाना‒इन दोनोंमें ज्यादा खराब कौन-सा है ?
स्वामीजी‒ज्यादा पाप गर्भपातमें है, और ज्यादा नुकसान ऑपरेशनमें
है ।
श्रोता‒मैं भगवान्का भजन करने बैठती हूँ तो
मुझे आप याद आते हो,
भगवान् याद नहीं आते ! मैं क्या करूँ
?
स्वामीजी‒मैं याद आ जाऊँ तो कोई बात नहीं, पर याद करना नहीं ।
संसार याद आ जाय तो क्या करे ? भेड़-बकरी
याद आ जाय, गाय याद आ जाय तो कोई पाप नहीं है । याद करना नहीं
चाहिये । याद भगवान्को करना चाहिये ।
श्रोता‒मैंने एक पुस्तकमें पढ़ा है
कि भगवत्प्राप्तिका पात्र बन जाओ, तो पात्र बनना क्या है
?
स्वामीजी‒केवल भगवान्की उत्कण्ठा हो और दूसरी
सब इच्छाएँ मिट जायँ । खाने-पीनेकी, रहनेकी,
जीनेकी भी इच्छा न रहे तो पात्र हो जाओगे ।
(शेष आगेके ब्लॉगमें)
‒‘मैं नहीं, मेरा नहीं’ पुस्तकसे
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